श्रावस्ती। प्रदेश के कई हिस्सों में टीबी आज भी सामाजिक झिझक और कलंक से जुड़ा है। लोग भेदभाव के डर से बीमारी छिपाते हैं। जिससे संक्रमण फैलता है। लेकिन नेपाल सीमा से सटे श्रावस्ती जिले का थारू बाहुल्य भचकाही गाँव एक नजीर पेश कर रहा है। 24 मार्च को विश्व टीबी दिवस के मौके पर इस गाँव की गलियों से एक ही सशक्त संदेश गूंज रहा है “बीमारी से लड़ो, बीमार से नहीं।” इस सशक्त संदेश को असल जिंदगी में चरितार्थ किया है इस गाँव के उन मरीजों ने, जिन्होंने अपनों के सहयोग और समय से जांच व इलाज से टीबी को मात दी। रोजगार के लिए बाहर जाने वाले ग्रामीण कई बार संक्रमण की चपेट में आ जाते हैं। थारू समुदाय के 35 वर्षीय विनोद (बदला हुआ नाम) भी मजदूरी से लौटने के बाद टीबी से ग्रसित पाए गए थे। इलाज के दौरान उनकी पत्नी ने पूरी सतर्कता बरतते हुए कपड़े अलग धोए, अस्पताल साथ गईं और घर की जिम्मेदारी संभाली, जबकि बेटी ने भी परिवार का सहयोग किया। नियमित दवा और सावधानी के साथ वे छह महीने 11 दिन में पूरी तरह स्वस्थ हो गए। इसी तरह 50 वर्षीय लज्जावती (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि बीमारी की जानकारी मिलते ही बेटों ने तुरंत इलाज शुरू कराया और घर व खेती की जिम्मेदारी बहुओं ने संभाल ली। इलाज के दौरान वे भी मास्क का उपयोग करते हुए हल्के कृषि कार्यों में सक्रिय रहीं और समय पर पूर्ण उपचार से टीबी मुक्त हो गईं।