भारतीय तकनीकी शिक्षा के प्रतिष्ठित संस्थान, जिन्हें कभी “सपनों की फैक्ट्री” कहा जाता था, आज कई युवाओं के लिए मानसिक दबाव के कारखाने बनते जा रहे हैं। हरियाणा के राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान कुरुक्षेत्र में महज़ दो महीनों के भीतर चार छात्रों की आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह केवल चार जिंदगियों का अंत नहीं, बल्कि एक ऐसे तंत्र की विफलता है जो प्रतिभा को तराशने के बजाय उसे तोड़ रहा है। फरवरी से अप्रैल 2026 के बीच हुई ये घटनाएँ अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक खतरनाक सिलसिले का संकेत देती हैं—जहाँ एक घटना के बाद दूसरी घटना घटती चली जाती है, जैसे निराशा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैल रही हो। दीक्षा दूबे का सुसाइड नोट—“मैं कुछ करके नहीं दिखा पाई”—सिर्फ एक छात्रा की पीड़ा नहीं, बल्कि उस मानसिकता का आईना है, जिसमें ‘कुछ करके दिखाना’ ही जीवन का अंतिम लक्ष्य बना दिया गया है। read more:https://pahaltoday.com/in-tamil-nadu-the-elections-have-become-a-battle-for-personal-image-along-with-the-politics-of-hero-versus-villain/
भारत में जे ई ई मैंस और जे ई ई अडवांस जैसी परीक्षाएँ लंबे समय से सफलता की कुंजी मानी जाती रही हैं। लाखों छात्र वर्षों तक दिन-रात मेहनत करते हैं ताकि वे इन परीक्षाओं में सफल होकर राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान कुरुक्षेत्र जैसे संस्थानों में प्रवेश पा सकें। लेकिन विडंबना यह है कि जिस संस्थान में प्रवेश को जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है, वही कई छात्रों के लिए मानसिक संघर्ष का मैदान बन जाता है। यहाँ पहुँचने के बाद छात्रों को न केवल पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन करना होता है, बल्कि उन्हें हर मोर्चे पर खुद को साबित करने का दबाव झेलना पड़ता है। 75 प्रतिशत उपस्थिति का नियम, लगातार असाइनमेंट और प्रोजेक्ट, सेमेस्टर परीक्षाओं का तनाव और प्लेसमेंट की अनिश्चितता—ये सब मिलकर छात्रों के मन पर एक अदृश्य लेकिन भारी बोझ डालते हैं। यह दबाव केवल शैक्षणिक नहीं होता, बल्कि मनोवैज्ञानिक और सामाजिक भी होता है। जब एक छात्र, जो अपने स्कूल या कोचिंग में सबसे आगे रहा हो, अचानक खुद को सैकड़ों प्रतिभाशाली छात्रों के बीच पाता है, तो उसकी आत्म-छवि प्रभावित होती है। पहले जहाँ वह खुद को “सबसे बेहतर” मानता था, वहीं अब वह खुद को “सामान्य” या कई बार “कमज़ोर” महसूस करने लगता है। यह बदलाव कई छात्रों के लिए मानसिक रूप से बहुत कठिन होता है। वे अपनी असफलताओं को स्वीकार नहीं कर पाते और धीरे-धीरे आत्म-संदेह और हीनभावना का शिकार हो जाते हैं।
इस पूरे संकट में परिवार की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। भारतीय समाज में शिक्षा को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है। माता-पिता अपने बच्चों से बड़ी उम्मीदें रखते हैं, और यह उम्मीद कई बार अनजाने में दबाव में बदल जाती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि युवाओं में आत्महत्या के मामलों में पारिवारिक दबाव एक प्रमुख कारण होता है। विशेष रूप से उन छात्रों के लिए, जो आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं, यह दबाव और भी अधिक होता है। उनके माता-पिता अपनी सीमित आय का बड़ा हिस्सा उनकी पढ़ाई पर खर्च करते हैं, और बदले में उनसे सफलता की अपेक्षा करते हैं। ऐसे में यदि छात्र किसी भी कारण से अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाता, तो उसे लगता है कि उसने न केवल खुद को, बल्कि अपने पूरे परिवार को निराश कर दिया है। सोशल मीडिया ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। आज का युवा लगातार दूसरों की “सफलता” और “खुशहाल जीवन” की झलकियों से घिरा रहता है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर दिखने वाली चमक-दमक एक ऐसी दुनिया का निर्माण करती है, जो वास्तविकता से बहुत दूर होती है। लेकिन छात्र इसे वास्तविक मानकर अपनी तुलना दूसरों से करने लगते हैं। जब उन्हें लगता है कि वे इस “आदर्श जीवन” से पीछे हैं, तो उनमें असंतोष और निराशा बढ़ने लगती है। फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुरखाइम ने आत्महत्या को केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक समस्या के रूप में देखा था। उनका “अनोमिक सुसाइड” सिद्धांत बताता है कि जब समाज के नियम और अपेक्षाएँ व्यक्ति के लिए अस्पष्ट या असंतुलित हो जाती हैं, तो वह खुद को अलग-थलग महसूस करने लगता है। यही स्थिति आज कई तकनीकी संस्थानों में देखने को मिलती है। छात्र एक ऐसे वातावरण में होते हैं जहाँ उनसे बहुत अधिक अपेक्षाएँ की जाती हैं, लेकिन उन्हें उतना भावनात्मक या सामाजिक समर्थन नहीं मिलता। परिणामस्वरूप, वे भीतर ही भीतर टूटने लगते हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए यह समस्या और भी गहरी होती है। वे अचानक एक ऐसे वातावरण में पहुँच जाते हैं, जहाँ भाषा, जीवनशैली और सामाजिक व्यवहार सब कुछ अलग होता है। उन्हें अपने आसपास के लोगों से जुड़ने में कठिनाई होती है। यह अलगाव धीरे-धीरे अकेलेपन में बदल जाता है, और अकेलापन मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है। कई छात्र अपनी समस्याओं को किसी से साझा नहीं कर पाते, क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करना कमजोरी की निशानी है। महिला छात्रों के लिए यह संघर्ष कई स्तरों पर होता है। उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ सुरक्षा, सामाजिक अपेक्षाओं और आत्मनिर्भरता के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। कई बार उन्हें यह महसूस कराया जाता है कि उन्हें खुद को “साबित” करना है, न केवल एक छात्र के रूप में, बल्कि एक महिला के रूप में भी। यह दोहरा दबाव उनके मानसिक स्वास्थ्य को और अधिक प्रभावित करता है। read more:https://pahaltoday.com/the-31st-inter-district-sports-competition-of-varanasi-zone-concluded-in-ghazipur-ghazipur-topped-in-kabaddi/संस्थागत स्तर पर भी कई कमियाँ सामने आती हैं। अधिकांश तकनीकी संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ पर्याप्त नहीं हैं। एक या दो काउंसलर सैकड़ों छात्रों की समस्याओं को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं होते। कई बार छात्र काउंसलिंग लेने से हिचकिचाते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि इससे उनकी छवि पर असर पड़ेगा। इसके अलावा, मेंटरशिप सिस्टम भी कई बार प्रभावी नहीं होता। कुछ मामलों में यह छात्रों के लिए सहायक होने के बजाय अतिरिक्त दबाव का कारण बन जाता है। चार आत्महत्याओं के बाद प्रशासन द्वारा उठाए गए कदम—जैसे जांच समिति का गठन, काउंसलिंग सेवाओं में सुधार और छुट्टियों की घोषणा—महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ये पर्याप्त नहीं हैं। यह समस्या केवल तात्कालिक उपायों से हल नहीं होगी। इसके लिए दीर्घकालिक और व्यापक बदलाव की आवश्यकता है। शिक्षा व्यवस्था को यह समझना होगा कि छात्र केवल अंक और रैंक नहीं हैं, बल्कि वे भावनात्मक और सामाजिक आवश्यकताओं वाले इंसान हैं। समाधान के लिए सबसे पहले मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी। हर संस्थान में पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित काउंसलर होने चाहिए, और छात्रों को बिना किसी डर या शर्म के उनकी सेवाओं का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके अलावा, शैक्षणिक नियमों में लचीलापन लाना भी आवश्यक है। हर छात्र एक जैसा नहीं होता, और सभी से समान प्रदर्शन की अपेक्षा करना उचित नहीं है। परिवारों को भी अपनी सोच में बदलाव लाना होगा। उन्हें यह समझना होगा कि सफलता का अर्थ केवल उच्च वेतन या प्रतिष्ठित नौकरी नहीं है। बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और खुशहाली को प्राथमिकता देना उतना ही महत्वपूर्ण है। अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ खुलकर संवाद करना चाहिए और उन्हें यह भरोसा दिलाना चाहिए कि वे किसी भी परिस्थिति में उनके साथ हैं। कैंपस स्तर पर भी एक सकारात्मक और सहयोगात्मक वातावरण बनाने की आवश्यकता है। छात्रों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे एक-दूसरे की मदद करें और अपनी समस्याओं को साझा करें। पीयर सपोर्ट ग्रुप, सांस्कृतिक गतिविधियाँ और खेल-कूद जैसी पहलें छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान कुरुक्षेत्र की ये घटनाएँ केवल एक संस्थान की समस्या नहीं हैं, बल्कि पूरे भारतीय शिक्षा तंत्र के लिए एक चेतावनी हैं। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह संकट और गहरा हो सकता है। आज जरूरत है कि हम इस मुद्दे को गंभीरता से लें और मिलकर ऐसे समाधान खोजें, जो न केवल छात्रों के शैक्षणिक विकास को सुनिश्चित करें, बल्कि उनके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की भी रक्षा करें। छात्र देश का भविष्य हैं, और यदि वही भविष्य निराशा और दबाव के बोझ तले टूट रहा है, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संकट है। अब समय आ गया है कि हम सफलता की परिभाषा को पुनर्परिभाषित करें और एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करें, जो छात्रों को केवल सफल ही नहीं, बल्कि संतुलित और खुशहाल इंसान भी बनाए।