डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
सेकंड क्लास के स्लीपर कोच में प्रवेश करते ही ऐसा लगता है मानो हम भारतीय रेल के डिब्बे में नहीं, बल्कि कलयुग के उस चिड़ियाघर में आ गए हैं जहाँ पिंजरे के अंदर और बाहर, दोनों तरफ जानवर ही रहते हैं। यहाँ की हवा में पसीने, अचार और गरीबी की एक ऐसी त्रिकोणीय गंध होती है जिसे सूंघते ही नासिका छिद्रों को मोक्ष प्राप्त हो जाता है। बर्थ पर बैठे यात्री ऐसे चौकन्ने रहते हैं मानो उन्होंने अटैची में कोहिनूर हीरा छिपा रखा हो, जबकि हकीकत में उसमें सिर्फ फटी हुई बनियानें और घर से लाया गया कड़ा पराठा होता है। तभी डिब्बे के दरवाजे पर एक ऐसा प्राणी प्रकट होता है जिसकी देह पर कपड़े कम और इतिहास के घाव ज्यादा होते हैं। वह खंजरी बजाता है और आवाज लगाता है— “ए बाबू! हमार पेट नाहीं, ई तौ कुआँ होय, जेमा जेत्ता डालौ सब कम लागै। दे दऽ माई, तोहार लड़का जुग-जुग जिए!” उसकी आवाज में वह मिठास है जो केवल उन लोगों के पास होती है जिन्होंने चीनी खरीदने की औकात बहुत पहले खो दी है। वह खंजरी ऐसे बजाता है जैसे ट्रेन के पहिए उसके ताल पर ही घूम रहे हों और यात्री अपनी जेबें ऐसे दबाते हैं मानो वह भिखारी नहीं, आयकर विभाग का कोई छापा मार दस्ता हो। थोड़ी देर में एक दूसरा कलाकार अवतरित होता है, जो पूरी तरह से भगवान के नाम पर डराता है। उसने गले में भगवानों की एक पूरी कैबिनेट लटका रखी है। वह अवधी और भोजपुरी के मिश्रण में श्राप और आशीर्वाद का ऐसा कॉकटेल परोसता है कि नास्तिक भी डर के मारे जेब में हाथ डाल देता है। “अरे साहेब, हमका का देखत हौ? हम तौ तोहरे पाप काटै आए अही। जे देई ओकरो भला, जे ना देई ओकरो बिटिया का बियाह न होई!” यह सुनते ही शादी के लायक बच्चों के माात-पिताओं के माथे पर पसीना आ जाता है। वह एक अंधे भिखारी का हाथ पकड़े है, जो दरअसल इतना अंधा है कि वह सुंदर लड़कियों के सामने आते ही अपनी आँखों की पुतलियाँ कुछ ज्यादा ही तेजी से नचाने लगता है। उसकी लाठी की खटखटाहट ट्रेन के शोर को चुनौती देती है। लोग उसे पैसे नहीं देते, बल्कि अपने पापों का एक छोटा सा किश्त चुकाते हैं। यहाँ दया कोई भावना नहीं, बल्कि एक सौदा है— “पाँच रुपये लो और ऊपर वाले से मेरी प्रमोशन की सिफारिश कर दो।” जैसे-जैसे सफर आगे बढ़ता है, भिखारियों की किस्म बदलती जाती है। अब एक छोटा बच्चा आता है जिसके हाथ में झाड़ू है और चेहरे पर दुनिया भर की चालाकी। वह गंदगी साफ नहीं करता, बल्कि उसे एक जगह से दूसरी जगह विस्थापित करता है, ठीक वैसे ही जैसे सरकार गरीबी को एक पंचवर्षीय योजना से दूसरी में धकेलती है। वह गाता है— “परदेसी-परदेसी जाना नहीं…” और उसकी आवाज फटे हुए ढोल जैसी है, पर उसमें जो दर्द है वो अरिजीत सिंह के किसी भी सैड सॉन्ग को फेल कर दे। “ऐ मुसाफिर, हमरी सूरत पे ना जा, हमरी किस्मत पे जा। दू टका दे देबौ तौ तोहर रेलगाड़ी पटरी से ना उतरतौ!” उसकी मैथिली मिश्रित हिंदी सुनकर ऐसा लगता है मानो बुद्ध खुद भीख माँगने फिर से पटरी पर उतर आए हों। यात्री उसे झिड़कते हैं, ‘चलो-चलो’ कहते हैं, पर वह बच्चा जानता है कि इस देश में ‘चलो’ का मतलब ‘रुको’ होता है और ‘नहीं है’ का मतलब ‘जेब में चिल्लर बहुत है पर मन कच्चा है’ होता है। शाम ढलते ही डिब्बे में एक रहस्यमयी बुढ़िया आती है। वह कुछ माँगती नहीं, बस अपनी धुंधली आँखों से सबको निहारती है। उसकी आँखों में ऐसा दर्शन है जो प्लेटो और सुकरात की किताबों में भी नहीं मिलेगा। वह एक कोने में बैठ जाती है और फटे हुए आंचल से कुछ टटोलती है। लोग उसे हेय दृष्टि से देखते हैं, कुछ अपनी चप्पलों को अपनी गोद में रख लेते हैं ताकि चोरी न हो जाए। वह अचानक बुदबुदाती है, “सब के पास झोला है, पर झोले सबके खाली हैं।” उसकी बात किसी को समझ नहीं आती। ट्रेन की रफ्तार और रेल की पटरियों की रगड़ से पैदा होने वाला संगीत एक अजीब सी उदासी भर देता है। वह बुढ़िया एक-एक कर यात्रियों के चेहरों को ऐसे पढ़ती है जैसे वह कोई भविष्यवक्ता हो। उसकी चुप्पी में वह चीख है जिसे हम अक्सर हेडफोन लगाकर दबाने की कोशिश करते हैं। स्लीपर क्लास की वह भीड़ अचानक एक चलते-फिरते कब्रिस्तान जैसी लगने लगती है जहाँ हर कोई अपनी उम्मीदों को दफन करने के लिए अगले स्टेशन का इंतजार कर रहा है।read more:https://pahaltoday.com/vijay-yadav-roared-in-fatehpur-rajesh-chaudhary-got-the-responsibility-of-national-general-secretary-amid-the-expansion-of-the-organization/
अगला बड़ा जंक्शन आता है। बुढ़िया उतरने के लिए खड़ी होती है। भीड़ के धक्के से उसका फटा हुआ थैला नीचे गिर जाता है। लोग हंसने को तैयार हैं कि अब इसमें से भीख के सिक्के निकलेंगे और पूरे डिब्बे में खनकेंगे। लेकिन थैला खुलते ही सन्नाटा छा जाता है। वहाँ कोई सिक्का नहीं था, कोई जूठा खाना नहीं था। उस थैले में दर्जनों ‘खोया-पाया’ के विज्ञापन वाले पर्चे थे और एक मैली सी फोटो थी, जो शायद उसके सालों पहले स्टेशन पर खोए बेटे की थी। उसने उन सिक्कों से पेट नहीं भरा था, बल्कि अपने बेटे की तलाश के लिए छपवाए गए उन पर्चों को सहेज रखा था। वह बुढ़िया भिखारिन नहीं थी, वह तो इस पूरे ट्रेन की सबसे अमीर मालकिन थी जिसके पास ‘इंतजार’ की दौलत थी। वह नीचे उतरी और अंधेरे प्लेटफार्म पर ओझल हो गई। तभी कोच के सबसे अमीर दिखने वाले सेठ जी ने अपनी जेब टटोली, उनके पास हजारों के नोट थे, पर उस ममता के पर्चे को खरीदने की औकात पूरे रेल मंत्रालय की भी नहीं थी। ट्रेन आगे बढ़ गई, पर उस डिब्बे में बैठा हर यात्री अब खुद को एक भिखारी महसूस कर रहा था, जो बिना किसी झोले के, बिना किसी लक्ष्य के, बस एक पटरी पर भागा जा रहा था।