बिना रीढ़ की राजनीति

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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
तिलचट्टा यानी काकरोच इस ब्रह्मांड का वो इकलौता प्राणी है जो परमाणु बम फटने के बाद भी चाय की टपरी पर बिस्कुट डुबोकर खा सकता है। हमारे मोहल्ले के लल्लन बाबू आजकल राजनीति के नए खलीफा बने घूम रहे हैं, पर उनका भौकाल बिल्कुल उसी काकरोच जैसा है। जब तक चप्पल न पड़े, तब तक वो खुद को डायनासोर का फूफा ही समझते हैं। लल्लन बाबू ने करियर की शुरुआत ग्राउंड जीरो से की थी, मतलब सचमुच जमीन खोदकर। उन्होंने कब्रिस्तान में वीआईपी गड्ढे खोदने का ऐसा स्टार्टअप चालू किया कि देखते-देखते वो साइकिल से सीधे फॉर्च्यूनर पर लैंड कर गए। मोहल्ले वाले कहते हैं कि नेताजी मुर्दों की छाती पर मक्के की खेती कर लेते हैं। एक दिन जब मैंने उनसे पूछा कि नेताजी, इस तरक्की का सीक्रेट क्या है, तो उन्होंने मूंछों पर ताव देकर कहा, बाबू, जिंदा इंसान तो केवल वोट देता है, पर असली नोट तो सोया हुआ आदमी देता है। राजनीति और कब्रिस्तान में ज्यादा फर्क नहीं है, दोनों जगह लोग दूसरों को दफनाने के चक्कर में खुद की कुर्सी पक्की करते हैं।
लल्लन बाबू का पूरा खानदान इस बिजनेस में एकदम प्रो-मैक्स लेवल पर एक्टिव था। उनके बाबूजी दिन-रात बैठकर कफन सीने का नेशनल ठेका संभाले हुए थे। वो कफन में भी ऐसी बढ़िया पॉकेट सिलते थे कि मुर्दा चाहे तो यमराज को रिश्वत रास्ते में ही सेट कर ले। अम्मा का जलवा अलग ही था, वो शवों पर चढ़ाने वाले गेंदे के फूलों के हार ऐसे चालाकी से बनाती थीं कि एक ही हार को तीन अलग-अलग जनाज़ों में रीसायकल कर देती थीं। जब बाबूजी कहते, अरे भाग्यवान, थोड़ा नया फूल भी डाल दिया करो, तो अम्मा तपाक से जवाब देतीं, चुप रहिए जी, मुर्दे को कौन सा इत्र सूंघना है, वैसे भी खुशबू तो नोटों की अच्छी होती है। इधर अपनी नेताइन भी कुछ कम नहीं थीं। वह खूब पढ़ी-लिखी, एकदम इंस्टाग्राम रील टाइप मॉडर्न थीं। उन्होंने कब्रिस्तान के पत्थरों पर नाम, जन्म-मरण के साथ ऐसी पिघला देने वाली शायरियाँ लिखने का काम संभाल लिया कि रोता हुआ आदमी भी हंसकर कह उठता, वाह, क्या सुसाइड नोट जैसा फील आ रहा है। नेताइन पत्थरों पर लिखती थीं, “दुनिया के झंझटों से थककर अब मैं तो सो गया, तुम अभी तक जिंदा हो बताओ तुमको क्या मिल गया।” दूसरी शायरी में वो और तगड़ा दर्द भरती थीं, “यहाँ की चाय-पानी का खर्चा अब बच गया भाई, हम तो सीधे स्वर्ग चले करने अपनी विदाई।” नेताइन कहती थीं, जब तक दुख को लग्जरी ब्रांड न बनाओ, तब तक पब्लिक पैसा नहीं ढीली करती।एक शाम लल्लन बाबू अपने बरामदे में बैठकर चमचों को ज्ञान दे रहे थे कि देश का विकास कैसे करना है। तभी उनकी नजर दीवार पर रेंगते हुए एक मोटे तगड़े काकरोच पर पड़ी। लल्लन बाबू ने तुरंत अपनी चप्पल उठाई और चिल्लाए, इस साले को अभी सीधे टिकट दिलाता हूं ऊपर का। तभी उनके खास गुर्गे भोला ने उनका हाथ पकड़ लिया और बोला, अरे नेताजी, रुकिए, अनर्थ मत कीजिए, ये आपका सगा छोटा भाई है।read more:https://pahaltoday.com/17-year-old-girl-goes-missing-under-mysterious-circumstances/लल्लन बाबू की आंखें उबलकर बाहर आ गईं, बोले, क्या बकवास कर रहा है बे, मेरा भाई तो अमेरिका में है। भोला ने हंसकर कहा, नहीं नेताजी, ध्यान से देखिए, इसके लक्षण बिल्कुल आपसे मिलते हैं। यह भी अंधेरे का फायदा उठाकर किचन का बजट साफ करता है, गंदी जगहों पर अपना हेडक्वार्टर बनाता है और जैसे ही जनता यानी घर की मालकिन झाड़ू उठाती है, यह तुरंत सोफे के नीचे गठबंधन सरकार बना लेता है। पूरा कमरा ठहाकों से गूंज उठा और लल्लन बाबू को लगा जैसे किसी ने उनकी बायोग्राफी काकरोच के नाम से पब्लिश कर दी हो।शहर में अचानक म्युनिसिपैलिटी के इलेक्शन का ऐसा ढिंढोरा पिटा कि यमराज भी अपनी भैंस रोककर देखने लगे। लल्लन बाबू ने इस बार अपनी राजनीतिक दुकान चमकाने के लिए सीधे काकरोच को ही अपनी पार्टी का सिंबल घोषित कर दिया। रैलियों में माइक पर दहाड़ते हुए उन्होंने अपनी मूंछें हिलाईं और चिल्लाए, भइया और भौजाइयों, हमको ऐसा तगड़ा लीडर चाहिए जो कयामत के बाद भी जिंदा बच जाए, जो खुद भूखा रहकर भी सरकारी खजाने को बिना डकारे हजम करने की एक्टिंग कर सके। पब्लिक भी एकदम फुल टू क्रेजी मोड में आ गई, वह अपनी सिर पीट-पीटकर जयकारे लगा रही थी कि लल्लन भैया की जय हो, जो यमलोक के मुसाफिरों से भी जबरदस्ती हाउस टैक्स वसूल लाएं। वोटिंग के दिन लल्लन बाबू ने दरियादिली की सारी हदें पार करते हुए हर वोटर को बाबूजी के सिले कफन के बचे हुए टुकड़ों का ब्रांडेड रुमाल और अम्मा के हाथों से तीन बार रीसायकल किए हुए बासी गेंदे के फूलों का वीआईपी बुके मुफ्तिया माल समझकर बंटवा दिया। इधर अपनी हाईटेक नेताइन ने तो हर पोलिंग बूथ के बाहर सीधे कब्र के पत्थरों पर ही धुआंधार शायरी लिखकर डिजिटल होर्डिंग टांग दिए थे, जिस पर लिखा था, “वोट देने जरूर जाना मेरे प्यारे भाई, वरना हमारे यहाँ तो तुम्हारी परमानेंट सीट पहले से ही है बुक कराई।” मौत के इस खौफनाक डिस्काउंट और फ्री के कफन वाले खतरनाक ऑफर के आगे बेचारे विपक्षियों का ब्लड प्रेशर ऐसा बढ़ा कि उनकी जमानत जप्त होने से पहले ही उनकी खुद की हवा टाइट हो गई।नतीजों वाले दिन पूरे मोहल्ले में डीजे बज रहा था और लल्लन बाबू जीत का लड्डू खाने के लिए मुंह बाए खड़े थे। तभी काउंटिंग सेंटर से उनका चेला भोला रोता हुआ बाहर भागा। लल्लन बाबू ने उसकी पीठ थपथपाई और बोले, “रो मत बे, कितने हजार वोटों से जीते हम।” भोला ने अपनी नाक पोंछते हुए कहा, नेताजी, आप चुनाव जीते नहीं, बुरी तरह हार गए हैं। लल्लन बाबू का कफन जैसा सफेद चेहरा देखकर भोला आगे बोला, “दरअसल जनता ने आपको या विपक्ष को वोट ही नहीं दिया। वो जो आपके चुनाव चिह्न वाला असली काकरोच था ना, वो कुछ दिन पहले ही वोटिंग मशीन के भीतर घुसकर बैठ गया था। वोटर्स ने जब बटन दबाया तो करंट सीधा उस काकरोच को लगा और वो मशीन के सारे तार चबा गया। चुनाव आयोग ने उस काकरोच की इस ऐतिहासिक शहादत को देखते हुए उसे ही निर्विरोध वार्ड का नया प्रेसिडेंट घोषित कर दिया है। अब पूरे इलाके में आपके बजाय उस छह टांग वाले नए नेताजी का परचा बंट रहा है और आपकी पत्नी उसके स्वागत के लिए पत्थर पर एक नई शायरी लिख रही हैं कि “कुर्सी की भूख में तुम तो इंसानों को भूल गए, देखो तुमसे अच्छे तो हमारे छह टांगों वाले नेताजी निकल गए।”

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