पुरानी स्याही   

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कस्बे की पुरानी मुंसिफ अदालत के बरामदे के कोने में रखी काठ की एक काली मेज पर काँच की चौकोर दवात पिछले बीस सालों से इस तरह विराजमान थी जैसे किसी भ्रष्ट विभाग में ईमानदारी का कोई पुराना सर्कुलर धूल फांक रहा हो। उस दवात के भीतर नीली स्याही सूखकर पपड़ी बन चुकी थी मानो किसी नेता का चुनाव पूर्व किया गया वादा हो जो सत्ता मिलते ही सूखकर पपड़ी बन जाता है। उसके मुँह पर काँच का ढक्कन गर्द की मोटी परत के नीचे दबा हुआ था क्योंकि हमारे देश में फाइलों और सिद्धांतों पर धूल जमना ही उनकी सुरक्षा की एकमात्र गारंटी है। सुबह के ठीक दस बजते ही जब कोर्ट की घंटी बजती और मुंशियों के बस्तों से कागजों की ऐसी गड़गड़ाहट शुरू होती जैसे किसी सरकारी दफ्तर में रिश्वत के लेन-देन की सुगबुगाहट हो रही हो तब नथूराम काका अपनी टूटी लाठी के सहारे आकर उसी मेज के पास बिछी टाट की पट्टी पर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का झोला कंधे पर टांगे और आँखों पर पीतल के फ्रेम वाला गोल चश्मा चढ़ाए काका दिन भर उस सूखी दवात को वैसे ही निहारते थे जैसे एक आम आदमी बजट के बाद अपनी खाली जेब को देखता है। अदालत में रोज मुकदमों की पेशी होती और न्याय की देवी अपनी आँखों पर पट्टी इसलिए बाँधे रहती ताकि उसे वकीलों की फीस और मुवक्किलों की बेबसी न देखनी पड़े।
जब भी कोई नया टाइपिस्ट उधर से गुजरता तो वह इस बूढ़े को खाली शीशी सहलाते देखकर अचरज में पड़ जाता क्योंकि आधुनिक युग में खाली शीशी का महत्व केवल कबाड़ी ही समझता है या फिर वह दार्शनिक जो व्यवस्था के खालीपन को जानता हो। अदालत का पुराना चपरासी मंगरू जब भी पानी की सुराही भरकर लौटता तो काका पूछते कि क्या आज दवात में नई स्याही डालने का हुक्म हुआ है। मंगरू नजरें झुका लेता क्योंकि सत्य का सामना करने के लिए जिस रीढ़ की हड्डी की जरूरत होती है वह अक्सर सरकारी नौकरी की पहली किस्त के साथ ही जमा कर दी जाती है।read more:https://pahaltoday.com/demand-to-remove-government-country-liquor-shop-villagers-stage-protest-at-the-collectorate/#google_vignetteहाल ही में शहर से आए युवा मुंसिफ मजिस्ट्रेट विनीत शर्मा कायदे-कानून के उतने ही पक्के थे जितना कि एक नया-नया बना हुआ ईमानदार आदमी होता है जिसे अभी तक बड़े प्रलोभन का अवसर न मिला हो। विनीत साहब को काका का इस तरह दवात पूजना न्यायिक गरिमा के खिलाफ लगता था क्योंकि उनकी नजर में न्याय केवल फाइलों के वजन और तारीखों के चक्रव्यूह का नाम था।एक दिन विनीत साहब ने रौबदार आवाज में पूछा कि काका आप यहाँ समय क्यों बर्बाद करते हैं। दरअसल सत्ता को हमेशा उस आदमी से चिढ़ होती है जो चुपचाप बैठकर व्यवस्था की विसंगतियों को ताकता रहता है। काका ने शालीनता से जवाब दिया कि यह साधारण शीशी नहीं बल्कि इलाके के सबसे बड़े ईमान का सूखा हुआ रंग है। विनीत साहब को यह दार्शनिक जवाब अटपटा लगा क्योंकि कानून की भाषा में ‘ईमान’ जैसा शब्द आउट ऑफ सिलेबस होता है। पास खड़े वकील पंडित राधेश्याम ने बताया कि काका के बेटे सत्यप्रकाश ने इसी अदालत में एक मिसाल कायम की थी। सत्यप्रकाश ने किसानों की जमीन बचाने के लिए ताकतवर भू-माफिया के खिलाफ मोर्चा खोला था और कसम खाई थी कि जब तक फैसला नहीं आएगा वह इस दवात से कोई दूसरा निजी मुकदमा नहीं लिखेगा। यह सुनकर विनीत साहब को लगा कि शायद वे किसी पौराणिक कथा के नायक से मिल रहे हैं जबकि असल में वे एक ऐसी त्रासदी के गवाह बन रहे थे जहाँ आदर्शवाद खुद अपनी अर्थी कंधे पर उठाए घूम रहा था।काका बोले कि मेरे बेटे ने कहा था कि जिस दिन बड़ी अदालत से असली फैसला आएगा उस दिन वह खुद आकर इस स्याही से आदेश पर अमल करेगा। विनीत साहब ने हैरान होकर सोचा कि क्या बीस सालों में व्यवस्था की कछुआ चाल भी गंतव्य तक नहीं पहुँची। उन्होंने तय किया कि वे खुद रिकॉर्ड रूम में जाकर सत्य का पता लगाएंगे। रिकॉर्ड रूम वह जगह है जहाँ सत्य को चूहों और दीमक के भरोसे छोड़ दिया जाता है ताकि वह धीरे-धीरे इतिहास बन जाए। घंटों की मशक्कत के बाद जब वह लाल कपड़े में बंधी केस डायरी मिली तो विनीत साहब के पैरों तले जमीन खिसक गई। फाइल में लिखा था कि सत्यप्रकाश बीस साल पहले ही मुकदमा जीत चुका था और किसानों को हक मिल चुका था। विनीत साहब को पसीना आ गया क्योंकि उन्हें लगा कि शायद न्याय हो चुका है पर वे भूल गए थे कि इस देश में न्याय होना और न्याय का अनुभव होना दो अलग-अलग विभाग हैं।विनीत साहब दौड़ते हुए बाहर आए और काका से बोले कि आपके बेटे ने तो कब का केस जीत लिया था फिर आप यहाँ किसका मातम मना रहे हैं। काका के चेहरे पर एक ऐसी कड़वी मुस्कान तैर गई जो किसी भी सरकारी आयोग की रिपोर्ट से ज्यादा भयावह थी। काका ने बताया कि जिस दिन फैसला आया उसी रात उस माफिया ने सत्यप्रकाश को करोड़ों का लालच देकर अपना गुलाम बना लिया। उनका बेटा मरा नहीं था बल्कि उसने अपने जमीर का विधिवत अंतिम संस्कार करके एक आलीशान बंगला बनवा लिया था। काका बीस सालों से किसी बेटे का नहीं बल्कि उस मरे हुए ईमान का श्राद्ध कर रहे थे जो कभी सच की खातिर लड़ता था। उन्होंने कहा कि मैं तो बस यह देखने आता हूँ कि क्या आज भी अदालत में कोई ऐसा जज है जो बिक चुकी कलमों के इस दौर में सच की सूखी दवात का दर्द पहचान सके। विनीत साहब सुन्न होकर रह गए क्योंकि उन्होंने जान लिया था कि जिस तंत्र में कलम बिकने के लिए ही तैयार की जाती हो वहाँ सूखी दवात ही सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन है। पूरी मुंसिफ अदालत उस बेबस पिता के आंसुओं के सामने इस तरह शर्मसार थी जैसे किसी चोर को रंगे हाथों पकड़ने के बाद उसे नैतिकता का भाषण देने को कह दिया गया हो।

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