डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
टिटलागढ़ की वह धूप दरअसल धूप नहीं थी, वह कुदरत का एक ऐसा टॉर्च थी जो जीतू मुंडा के बदन पर छिपे हर अभाव को दुनिया के सामने नंगा कर रही थी। जीतू की देह किसी हाड़-मांस के इंसान की नहीं, बल्कि एक पुराने, दीमक लगे सरकारी दस्तावेज़ जैसी लग रही थी—वही पीलापन, वही जर्जरता। उसके बदन का रंग इतना गहरा और झुलसा हुआ था कि लगता था जैसे गरीबी ने उसे तवे पर उलट-पुलट कर सेंका हो। उसके नंगे बदन पर पसलियाँ महज़ हड्डियाँ नहीं थीं, वे तो उस बैंक की पासबुक की तरह उभरी हुई थीं, जहाँ डेबिट में तो पूरी ज़िंदगी लिखी थी पर क्रेडिट के नाम पर सिर्फ मौत की सड़ांध बची थी। हर पसली के बीच जो गड्ढे थे, उनमें तीन पीढ़ियों की भूख और सिसकियाँ आराम कर रही थीं।read more:https://pahaltoday.com/tribute-to-labor-leader-jayaprakash-on-labor-day-in-modinagar-garland-laid-on-the-statue/उसके कंधे… भगवान! उन कंधों को देखकर लगता था कि अगर कालरा के कंकाल का बोझ ज़रा भी और बढ़ा, तो वे कागज़ की तरह फट जाएंगे। वे धंसे हुए कंधे किसी इंसान के नहीं, बल्कि उस लाचार भारत के मंच थे जहाँ क़ानून का भारी बूट हमेशा सबसे कमज़ोर गर्दन पर ही पड़ता है। उन कंधों की त्वचा इतनी पतली थी कि भीतर का दर्द साफ़ झाँकता था। जीतू के हाथ सूखी हुई लकड़ी की उन टहनियों जैसे थे, जो शायद जलने के लिए भी पर्याप्त नहीं थीं। उन हाथों ने कभी अपनी बहन के लिए रोटी तोड़ी थी, पर आज उन्हीं उंगलियों को उस हड्डी को पकड़ना पड़ रहा था, जिसे वे तीन महीने पहले मिट्टी को सौंप आए थे। हाथ कांप रहे थे, पर पकड़ मज़बूत थी—रिश्ते की नहीं, मजबूरी की। और वह पेट? पेट कहना तो उस खालीपन की तौहीन होगी। वह तो जैसे रीढ़ की हड्डी से जाकर लिपट गया था, मानो भीतर के अंग एक-दूसरे से पूछ रहे हों कि रोटी शब्द का असली मतलब क्या होता है। जीतू का पेट उस खाली कुएं की तरह था, जिसमें उम्मीद गिरती तो थी पर आवाज़ नहीं आती थी। उसकी टांगें—दो पतली-दुबली लकड़ियाँ, जो तीन किलोमीटर तक सिर्फ इसलिए नहीं टूटीं क्योंकि उन पर कालरा की आखिरी इच्छा का बोझ था। उन कांपते पैरों ने सड़क की तपिश नहीं महसूस की, वे तो उस सिस्टम की बेशर्मी को नाप रहे थे, जिसने एक भाई को अपनी बहन की मौत का लाइव डेमो देने पर मजबूर कर दिया। जीतू का पूरा वजूद एक ऐसा दृश्य था जिसे देखकर आँखों से पानी नहीं, खून आना चाहिए। कमर पर लिपटी वह फटी हुई मैली लुंगी शायद उसके जिस्म को नहीं, बल्कि हमारे समाज की नग्नता को ढंकने की नाकाम कोशिश कर रही थी। उसकी देह कोई शरीर नहीं, वह तो एक चलता-फिरता पोस्टमॉर्टम था उस आधुनिकता का, जहाँ हम चांद पर पानी ढूँढ रहे हैं पर ज़मीन पर एक भाई को बहन की लाश खोदकर बैंक ले जानी पड़ती है। जीतू मुंडा उस दिन टिटलागढ़ की सड़क पर नहीं चल रहा था, वह दरअसल हमारी सामूहिक चेतना के शव को कंधे पर लादे श्मशान की ओर बढ़ रहा था। जब वह बैंक के चबूतरे पर पहुँचा, तो उसकी देह की वह सड़ांध बता रही थी कि मरा हुआ जीतू नहीं, हम सब हैं—जो बस अपनी सुविधाओं की खिड़कियों से इस दृश्य को देख रहे हैं। जीतू मुंडा के कंधे पर लदा वह बोरा महज़ जूट का एक थैला नहीं था, वह इस मुल्क के हर उस इंसान का बोझ था जिसे ज़िंदा रहते कागज़ों ने मार दिया और मरने के बाद क़ानून ने चैन से सोने नहीं दिया। जीतू चल रहा था और उसके साथ चल रही थी एक सड़ांध, जिसे लोग नाक पर रुमाल रखकर नज़रअंदाज़ कर रहे थे। पर यह सड़ांध उस लाश की नहीं थी, यह उस सिस्टम की थी जो बिना मुहर लगे किसी की सिसकी तक नहीं सुनता। कालरा ने मरते वक्त जीतू के कान में फूँका था—”जीतू, बैंक रे मोर पुंजी अछि (बैंक में मेरी पूँजी है)।” वह पूँजी, जो उसने पेट काटकर जोड़ी थी, अब उस बड़ी सी कंक्रीट की इमारत में कैद थी जिसे दुनिया बैंक कहती है और जहाँ पहुँचते ही इंसान एक नंबर में बदल जाता है। उसके पैर मिट्टी में नहीं, साख के दलदल में धंस रहे थे। रास्ते भर सन्नाटा पसर गया, क्योंकि सत्य जब नंगा होकर निकलता है, तो लोग अक्सर खिड़कियाँ बंद कर लेते हैं। जीतू के भीतर एक संवाद चल रहा था—बहन कालरा ने कहा था कि उस कंक्रीट की इमारत में उसकी ‘साँसें’ गिरवी रखी हैं, जिन्हें दुनिया पैसा कहती है। वह ‘उन्नीस हजार तीन सौ’ कोई संख्या नहीं थी, वह कालरा के उपवासों का संचय था। बैंक की सफेद दीवारें दूर से ऐसी लग रही थीं, जैसे कोई सफेद कफ़न ओढ़कर नैतिकता सो रही हो। भीतर एसी की ठंडी हवा चल रही थी, जो बाबू के हृदय की जमी हुई बर्फ से पूरी तरह मेल खाती थी। जीतू ने मेज पर वह बोरा धप से रख दिया। एक ऐसी गंध फैली जिसने रूम-फ्रेशनर के कृत्रिम गौरव को धूल में मिला दिया। बाबू ने घृणा से चश्मा ठीक किया।read more:https://pahaltoday.com/block-chief-inaugurated-the-interlocking-road-in-pipri-gohna-basti/
“क्या है?” बाबू बिफरा।
“सबूत लाया हूँ।” जीतू शांत था।
“कागज? वसीयत? नॉमिनी?”
“नहीं, कालरा।”
“कालरा कौन?”
“उन्नीस हजार तीन सौ वाली।”
जीतू ने बोरा खोला। मेज पर कालरा की आधी गली हुई खोपड़ी और पसलियां लुढ़क आईं। बैंक के हॉल में सन्नाटा ऐसा था कि घड़ी की टिक-टिक भी किसी अपराधी की धड़कन जैसी लग रही थी। गार्ड ने बंदूक तानी, पर जीतू की सूखी आंखों में कोई खौफ नहीं था। उसकी मुस्कुराहट में हज़ारों साल की गुलामी और दो कौड़ी की ईमानदारी का वह मिश्रण था जिसे समझना किसी मैनेजमेंट गुरु के बस की बात नहीं।पूरे बैंक में सन्नाटा ऐसा था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े जैसी लग रही थी। “पागल हो गए हो? मुर्दा लेकर बैंक आ गए?” मैनेजर के केबिन से चिल्लाने की आवाज़ आई। जीतू शांत था। उसने कालरा की एक सूखी हड्डी को छुआ। “बाबू, आपने कहा था कि बिना पहचान के पैसे नहीं मिलेंगे। गाँव के सरपंच ने लिखकर नहीं दिया, तहसीलदार के पास समय नहीं था। सोचा, जिसकी अमानत है उसे ही ले आऊं। ये बाल देखिए, कालरा के ही हैं। ये हाथ देखिए, इसी ने रोटियाँ कम खाई थीं ताकि आपके लॉकर भरे रहें। अब इससे पूछ लीजिए कि मेरा भाई कौन है? कानून तो गवाह मांगता है न? इससे बड़ा गवाह कहाँ लाऊं? यह तीन महीने पुरानी सच्चाई है, जो आपकी मुहरों से ज़्यादा साफ़ है।” बैंक के ग्राहक बाहर भाग चुके थे। कर्मचारी फाइलों के पीछे छिप गए थे। सत्य जब नंगा होकर सामने आता है, तो सभ्यता अक्सर मुँह फेर लेती है।
“बाबू, इसे देखिए।” जीतू ने एक हड्डी छुई।
“पागल हो गए हो?” मैनेजर दहाड़ा।
“कालरा आ गई, पहचानिए।”
“मुर्दा गवाही नहीं देता!”
“क़ानून तो यही चाहता था।”
“तमीज़ से बात करो।”
“दुर्गंध तमीज़ नहीं जानती।”
जीतू ने कालरा की एक सूखी हड्डी मेज पर खिसका दी। “बाबू, इस हड्डी में वही दरारें हैं जो आपके बैंक के ब्याज में होती हैं। इसकी रिक्त आंखों में झांकिए, शायद आपको वह नॉमिनी दिख जाए जिसे आपकी स्याही ढूँढ रही थी।”
मैनेजर ने कांपते हाथों से फाइल निकाली। नोटों की गड्डियाँ मेज पर रखी गईं—उन्नीस हजार तीन सौ। जीतू ने पैसे उठाए, पर गिने नहीं। उसने कालरा की खोपड़ी को देखा, जो शायद अब भी मुस्कुरा रही थी कि उसकी कीमत कम से कम एक केवाईसी फॉर्म से तो ज्यादा निकली। वह बाहर की ओर मुड़ा, पर अचानक काउंटर पर वापस आया। उसने तीन सौ रुपए वापस रख दिए। “ये क्या है?” मैनेजर ने हकलाते हुए पूछा।
“घूस?” एक क्लर्क बुदबुदाया। जीतू की आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे बुद्ध को ज्ञान नहीं, उधार मिल गया हो। “नहीं बाबू। कालरा को वापस वहीं सुलाने के लिए खुदाई करनी पड़ेगी। ये तीन सौ रुपए उस गड्ढे के लिए हैं। पिछली बार खुद खोदा था, इस बार थक गया हूँ। और सुनिए…” जीतू ने रुककर एक गहरी सांस ली, “ये पैसे बैंक में रहने दीजिए। जब मैं मरूँगा, तो मेरा भाई सबूत लेकर नहीं आएगा। वह भी शायद मेरा कंकाल लेकर आएगा। उस कंकाल से पूछ लीजिएगा कि मेरा नाम क्या था।” जीतू बाहर निकल गया। बैंक में अब भी खुशबू नहीं, उस बोरे की गंध शेष थी। सिस्टम जीत गया था—उसे सबूत मिल गया था। एक भाई को अपनी बहन की अंतिम नींद बेचने की कीमत। सूरज अब भी उतना ही गर्म था, पर जीतू को ठंड लग रही थी। वह अपनी ‘पूँजी’ को फिर से मिट्टी में मिलाने जा रहा था, जहाँ कोई बैंक बाबू हिसाब नहीं माँगता।