मार्केटिंग कंपनियों ने भाई-बहन के प्रेम के त्योहार को खर्चीला बना दिया है

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वीरेंद्र बहादुर सिंह 
धार्मिक त्योहारों से जुड़े दो पर्व रक्षाबंधन और बलेव शुक्रवार को हैं। रक्षाबंधन पर्व की तैयारियां पिछले एक महीने से बाजारों के साथ-साथ ऑनलाइन मार्केट में भी दिखाई दे रही हैं। ऑनलाइन मार्केट का प्रभुत्व इतना बढ़ गया है कि इसका सीधा असर स्थानीय बाजारों पर भी देखने को मिल रहा है।भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का यह पर्व अब मार्केटिंग करने वालों की गिरफ्त में आ गया है। ज्वेलरी, मिठाई, गिफ्ट हैम्पर्स आदि से जुड़ा यह त्योहार कभी केवल एक साधारण राखी से ही जगमगा उठता था, लेकिन आज यह बड़े बजट से जुड़ा पर्व बन गया है। बचपन में मां की गोद में खेलकर बड़े हुए भाई-बहनों के बचपन की यादों को ताजा करने वाला यह दिन आज गिफ्ट की कीमत के तराजू पर तौला जाने लगा है।मार्केटिंग करने वाले अपने उत्पाद बेचने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। कुछ लोग ऐसी विज्ञापन फिल्में बनाते हैं, जो विवाद पैदा करें और फिर माफी मांगकर उस ऐड को वापस ले लेते हैं। हाल ही में एक ज्वेलरी कंपनी के मार्केटिंग अभियान में अभिनेत्री कृति सेनन की ऐड को लेकर विवाद पैदा हुआ था। यह भी कहा जा सकता है कि विवाद पैदा किया गया था।ऐसा कुछ होते ही समाज के हितों की रक्षा करने वालों और खुद को आधुनिक समाज में रहने वाला मानने वालों के बीच कोल्ड वॉर शुरू हो जाता है। कृति सेनन की ऐड की आलोचना करने के लिए कंगना रनौत मैदान में थीं, तो दूसरी ओर संस्कृति की ऐसी-तैसी करने वाले टीवी और बालीवुड के चेहरे दिखाई दे रहे थे।त्योहारों के मौसम में कुछ ऐड क्रिएटर्स आधुनिक टच देने के बहाने भारत की संस्कृति का मजाक उड़ाने का मौका तलाश लेते हैं, लेकिन विवाद होने पर सब कुछ वापस समेट लेते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि संस्कृति की मर्यादा से आगे जाकर नई संस्कृति खड़ी करने वाली ऐसी ऐड को कंपनियों को ही मंजूरी नहीं देनी चाहिए। हालांकि हर किसी की दिलचस्पी बिक्री बढ़ाने में होती है।कृति सेनन की ऐड में पहने गए कपड़ों का विरोध हुआ था। आरोप लगाया जा रहा है कि यह ड्रेस रक्षाबंधन जैसे पवित्र त्योहार की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली है। इसमें वह ऑफ-व्हाइट ब्रालेट स्टाइल ब्लाउज, केप और ट्रेप्ट स्कर्ट में दिखाई देती हैं तथा पहले अपने भाई और फिर अपने पालतू कुत्ते को राखी बांधती नजर आती हैं।read more:https://worldtrustednews.in/agricultural-productivity-and-income-of-food-providers-to-increase-in-21-districts-of-eastern-uttar-pradesh-and-7-districts-of-bundelkhand-chief-minister/ इसमें कहीं भी भाई को तिलक करने की परंपरा नहीं दिखाई गई और न ही पास में पूजा की थाली थी।ऐड बनाने वाले क्रिएटिविटी के नाम पर अजीबोगरीब चीजें समाज के सामने रख देते हैं। ऐसे लोग कभी समाज के बीच घूमते ही नहीं। ये लोग जिस सर्कल में घूमते हैं, वहां पहने जाने वाले कपड़ों को ही भारत का पारंपरिक पहनावा समझ बैठते हैं। इसलिए वे अपने मन के मुताबिक चित्रण करके अपने ही सर्कल से वाहवाही हासिल करते रहते हैं। अतीत में भी भारत की संस्कृति का मजाक उड़ाने वाली और काफी हद तक सेक्सुअल दृश्यों से जुड़ी विज्ञापन फिल्में कई बार विवाद का केंद्र बन चुकी हैं।रक्षाबंधन से जुड़े सभी क्षेत्रों, जैसे ज्वेलरी, मिठाई, चाकलेट, गिफ्ट हैम्पर्स, फूलों के बुके आदि में तेजी दिखाई दे रही है। कहा जाता है कि रक्षाबंधन पर 30,000 करोड़ रुपए बाजार में आएंगे, जिसमें सबसे बड़ा योगदान राखी का होगा। अब गोते जैसी साधारण राखियां मुश्किल से दिखाई देती हैं। चांदी के भाव बढ़ने के बाद चांदी की राखी की कीमत में लगभग 100 प्रतिशत की वृद्धि होने के बावजूद उसकी मांग में कोई फर्क नहीं पड़ा है।यहां उल्लेखनीय है कि सोशल नेटवर्क और मार्केटिंग के चलते रक्षाबंधन का पवित्र त्योहार अधिक खर्चीला बन गया है। रक्षाबंधन के दिन बलेव यानी जनेऊ बदलने का भी महत्वपूर्ण दिन होता है, लेकिन मार्केटिंग के अभाव में इसमें बहुत कम उपस्थिति देखने को मिलती है। जनेऊ धारण करने वाले ब्राह्मणों की संख्या लाखों में होने के बावजूद नदी किनारे मुश्किल से 100 लोग एकत्र होते हैं, जबकि बाकी लोग घर पर ही गायत्री मंत्र का जाप करके जनेऊ बदल लेते हैं।बलेव के दिनों में न तो किसी गिफ्ट की, न फूलों के बुके की, न मिठाई की और न ही चांदी के किसी गिफ्ट की लेन-देन होती है। यही वजह है कि मार्केटिंग करने वालों के लिए यह नॉन-प्रॉफिटेबल यानी कमाई न देने वाला त्योहार है।वैदिक और पौराणिक संदर्भ परंपरा से चले आ रहे हैं। इनमें आधुनिकीकरण भी दिखाई देता है, लेकिन इनके पीछे छिपी मूल भावना आज भी सुरक्षित है। हिंदू संगठनों को यज्ञोपवीत और समुद्र पूजन जैसे आयोजनों का भी प्रचार-प्रसार और मार्केटिंग करने के प्रयास शुरू करने की आवश्यकता है।

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