अखिल भारतीय संस्कृत साहित्य सम्मेलन के वार्षिक समारोह में चार संस्कृत विद्वानों का भव्य सम्मान

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अखिल भारतीय संस्कृत साहित्य सम्मेलन, नई दिल्ली द्वारा आयोजित वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह वेदव्यास गुरुकुलम्, नई दिल्ली में अत्यंत गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। समारोह में संस्कृत भाषा, भारतीय ज्ञान परम्परा तथा शास्त्रीय अध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले चार विद्वानों को प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।कार्यक्रम का आयोजन वेदव्यास गुरुकुलम्, नई दिल्ली तथा पैजावर अधोक्षज पीठ, उडुपी (कर्नाटक) के परमाध्यक्ष परम पूज्य श्री श्री विश्वप्रसन्नतीर्थ जी महाराज के सान्निध्य में हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. श्रीनिवास वरखेडी, कुलपति, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली उपस्थित रहे। न्यायमूर्ति डॉ. मुकुन्दकाम शर्मा (पूर्व न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय) एवं न्यायमूर्ति सी. हरिशंकर (न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय) विशिष्ट अतिथि के रूप में समारोह की शोभा बढ़ाने पहुंचे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय, पूर्व कुलपति, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय तथा अध्यक्ष, अखिल भारतीय संस्कृत साहित्य सम्मेलन ने की।अपने आशीर्वचन में श्री श्री विश्वप्रसन्नतीर्थ स्वामी जी महाराज ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय अध्यात्म, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान की मूल धारा है।read more:https://pahaltoday.com/villagers-upset-over-garbage-dumping-staged-a-protest-at-the-district-collectorate/उन्होंने कहा कि संस्कृत के अक्षर ज्ञान से लेकर ब्रह्मज्ञान तक की यात्रा इसी भाषा के माध्यम से संभव है, इसलिए इसका संरक्षण और संवर्धन हम सभी का दायित्व है।इस अवसर पर डॉ. रंजन कुमार त्रिपाठी (संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) को डॉ. गोस्वामी गिरधारीलाल संस्कृत गौरव पुरस्कार, डॉ. मनीषा उपेन्द्र कोठेकर (अध्यक्ष, राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग) को डॉ. श्रीमती शीला दीक्षित संस्कृत श्री पुरस्कार, डॉ. यशवन्त कुमार त्रिवेदी (सहायकाचार्य, गंगानाथ झा परिसर) को मयंक वत्स संस्कृत भूषण युवा पुरस्कार तथा डॉ. अनमोल शर्मा (सहायकाचार्य, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय) को श्री गोपालचन्द्र शास्त्री संस्कृत रत्न युवा पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया।मुख्य अतिथि प्रो. श्रीनिवास वरखेडी ने कहा कि संस्कृत भारतीय ज्ञान परम्परा की आधारशिला है। इसके अध्ययन और अनुसंधान को आधुनिक संदर्भों से जोड़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि विद्वानों का सम्मान नई पीढ़ी को संस्कृत के अध्ययन और शोध के लिए प्रेरित करेगा।न्यायमूर्ति सी. हरिशंकर ने अपने संबोधन में कहा कि संस्कृत भारतीय संस्कृति, दर्शन और विधि-विचार की समृद्ध परम्परा को समझने का सशक्त माध्यम है। वहीं न्यायमूर्ति डॉ. मुकुन्दकाम शर्मा ने कहा कि वेद, उपनिषद, दर्शन और शास्त्रों का अमूल्य ज्ञान संस्कृत में सुरक्षित है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए शोध, अध्यापन और अनुवाद को बढ़ावा देना आवश्यक है।अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय ने कहा कि संस्कृत की सेवा, भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत की सेवा है। सम्मेलन ऐसे विद्वानों को सम्मानित कर समाज में संस्कृत के प्रति जागरूकता और सम्मान की भावना को सुदृढ़ कर रहा है।कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थानों के आचार्य, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं संस्कृतप्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सम्मेलन के महासचिव रमाकान्त गोस्वामी, डॉ. कनुप्रिया गोस्वामी, आर.एन. वत्स, पं. हरिदत्त वशिष्ठ, सुरेन्द्र कैरम, मधुसूदन शर्मा तथा मधु सैनी सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति ने समारोह को और अधिक गरिमामय बना दिया।यह समारोह संस्कृत भाषा, भारतीय ज्ञान परम्परा और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति विद्वत् समाज की प्रतिबद्धता का प्रेरणादायी उदाहरण बनकर उभरा।

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