डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
इश्क जब परवान चढ़ता है तो मजनू लैला के लिए तारे तोड़ लाता है। लेकिन जब यही इश्क बेंगलुरु के किसी लॉ कॉलेज की कैंटीन में कड़क चाय और समोसे के साथ पकता है, तो कानून की किताबें सिर्फ कोर्ट में गवाही मुकरने के काम आती हैं, साहब।कहानी शुभा नाम की उस इक्कीस साल की कन्या की है, जिसका दिल उन्नीस साल के अपने जूनियर अरुण वर्मा पर ऐसा आया कि लगा दुनिया के सारे ट्रैफिक सिग्नल हरे हो गए हैं। अब माता-पिता तो ठहरे पुराने जमाने के रेडियो, जिनमें सिर्फ सामाजिक सुरक्षा के गाने बजते हैं। उन्होंने अरुण को देखा तो कहा कि बेटा, इस लौंडे की मूंछें ठीक से उगी नहीं हैं, यह तुम्हें क्या खिलाएगा। उन्होंने शुभा के लिए एक सीधा-साधा, संस्कारी और मोटी तनख्वाह वाला बकरा ढूंढा। नाम था बी. वी. गिरीश। सत्ताइस साल का बढ़िया सॉफ्टवेयर इंजीनियर, जिसका काम सिर्फ कंप्यूटर के की-बोर्ड पर उंगलियां नचाना और महीने की आखिरी तारीख को खाते में गिरते रुपयों को गिनना था।तीस नवंबर की उस ठंडी शाम को जब सगाई के ढोल बज रहे थे, तो पूरा खानदान रसगुल्ले खाकर डकार ले रहा था। सबको लग रहा था कि लड़की का भविष्य अब सीधे स्वर्ग के हाईवे पर दौड़ने लगा है। कैमरे फ्लैश चमका रहे थे, पर शुभा के चेहरे की बत्ती गुल थी। वह ऐसे बैठी थी मानो सगाई की अंगूठी नहीं, तिहाड़ जेल का वारंट थमा दिया गया हो। वीडियो कैमरे वाले ने बार-बार कहा कि मैडम थोड़ा मुस्कुराइए, पर वह तो अंदर ही अंदर अपने अरुण के साथ जुदाई के आंसू पी रही थी।खैर, शादी पक्की होने के ठीक तीन दिन बाद, शुभा के भीतर अचानक एक आदर्श मंगेतर की आत्मा जाग उठी। उसने गिरीश को फोन घुमाया। आवाज में मिश्री घोलकर बोली कि सुनो जी, शादी से पहले थोड़ा एक-दूसरे को समझ लेते हैं। चलो, आज शाम डिनर करते हैं और फिर एचएएल एयरपोर्ट के पास इनर रिंग रोड पर चलकर हवाई जहाजों को उड़ते हुए देखेंगे।गिरीश ठहरा कंप्यूटर का सीधा प्रोग्राम। उसने जिंदगी भर कोडिंग सीखी थी, औरतों की डिकोडिंग उसे आती नहीं थी। वह फूला नहीं समाया। उसने सोचा कि कितनी रोमांटिक मंगेतर मिली है, जो तारों के नीचे हवाई जहाज दिखाना चाहती है। वह अपनी बाइक स्टार्ट करके पहुंच गया, यह सोचे बिना कि कुछ उड़ानें सीधे ऊपर वाले के घर के लिए भी तय होती हैं।दिसंबर की उस रात इनर रिंग रोड पर हवाएं चल रही थीं। गिरीश बड़े चाव से रनवे की तरफ आंखें फाड़े देख रहा था कि कैसे लोहे का इतना बड़ा पंछी आसमान को चीरते हुए उड़ जाता है। वह कौतुक से भरा हुआ था। ठीक उसी समय, शुभा के प्यार का असली रंग पीछे से मोटरसाइकिल पर सवार होकर आया। तीन लड़के आए, जिनके हाथों में गुलाब के फूल नहीं, बल्कि मोटरसाइकिल के लोहे के भारी-भरकम शॉक एब्जॉर्बर थे।जैसे ही गिरीश ने एक जहाज को उड़ते देखा, पीछे से लोहे के उस भारी रॉड ने उसके सिर पर जोर का प्रहार किया। खोपड़ी के परखच्चे उड़ गए। खून की धार बह निकली। शुभा वहीं खड़ी रही। उसने अपनी वकालत की पढ़ाई का पहला लाइव प्रैक्टिकल देखा। उसने रोने-चीखने का ऐसा नाटक शुरू किया कि आसपास के राहगीरों को लगा कि इस बेचारी से ज्यादा दुखी औरत इस ब्रह्मांड में कोई नहीं है। वह हैरान होने का स्वांग रचती रही, मानो उसे पता ही न हो कि यह सब किसने किया।अगले दिन अस्पताल के सफेद बिस्तरों के बीच गिरीश की सांसें टूट गईं। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि उसने एक ऐसी लड़की पर भरोसा किया था जो कोर्ट की दलीलों से पहले कत्ल की दलीलें तैयार कर चुकी थी।पुलिस आई। शुरुआती जांच वैसे ही चली जैसे हमारे देश में सरकारी काम चलते हैं। गिरीश का कोई दुश्मन नहीं था, बेचारा सीधा लड़का था। शक की सुई शुभा पर कैसे जाती, जिसकी सगाई को अभी बहत्तर घंटे भी नहीं हुए थे। पर कहते हैं कि पाप का घड़ा जब भरता है, तो उसकी आवाज बहुत दूर तक जाती है।read more:https://pahaltoday.com/a-devastating-storm-is-coming-to-india-there-will-be-heavy-rain/पुलिस ने जब सगाई का वह वीडियो देखा, तो उन्हें दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली नजर आई। वीडियो में शुभा का उतरा हुआ चेहरा और सूजी आंखें चीख-चीखकर कह रही थीं कि यह शादी की खुशी नहीं, किसी की बरसी की तैयारी है।इसके बाद जब पुलिस ने मोबाइल कंपनियों के बही-खाते खंगाले, तो जो सच सामने आया उसने सबको सन्न कर दिया। हत्या वाले उस काले दिन, शुभा ने अपने उसी अठारह-उन्नीस साल के आशिक अरुण वर्मा को एक-दो नहीं, पूरे तिहत्तर फोन कॉल किए थे। संदेशों की तो बाढ़ आई हुई थी। मानो वह पल-पल की लोकेशन दे रही हो कि हां, अब बकरा हलाल होने के लिए सही जगह पर आ गया है।जब पुलिस ने इन पुख्ता सबूतों का पुलिंदा शुभा के सामने खोला, तो उसके कानून के सारे पन्ने बिखर गए। उसने रोते हुए सब उगल दिया। पता चला कि यह कोई अचानक हुआ गुस्सा नहीं था। यह तो एक सोची-समझा स्क्रिप्ट थी, जिसे सगाई के ढोल बजने से पहले ही लिख लिया गया था। शुभा को अपने उस छोटे आशिक के साथ घर बसाना था, और इस रास्ते का कांटा गिरीश था। इसलिए दो किराए के गुंडों को पैसे देकर इस खूनी खेल का इंतजाम किया गया था।सगाई के महज तीन दिन बाद ही एक हंसता-खेलता परिवार श्मशान घाट में तब्दील हो गया।कानून की चक्की धीरे चलती है पर पीसती बारीक है। जुलाई दो हजार दस में अदालत ने चारों को गुनहगार माना और उम्रकैद की सजा सुनाकर जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया। शुभा को लगा था कि वह कर्नाटक हाई कोर्ट से बच जाएगी, पर वहां भी उसकी दाल नहीं गली। आखिरकार, दो हजार पच्चीस में देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी उनकी इस सजा पर पक्की मुहर लगा दी।सुप्रीम कोर्ट के जजों ने भी अपना सिर पकड़ लिया। उन्होंने साफ लफ्जों में कहा कि इस लड़की ने अपनी निजी उलझनों को सुलझाने के लिए जो खूनी रास्ता चुना, वह इस समाज के मुंह पर एक तमाचा है। एक बेकसूर और सीधे लड़के की जिंदगी सिर्फ इसलिए छीन ली गई क्योंकि किसी को अपनी आशिकी मुकम्मल करनी थी।गिरीश उस रात बहुत खुश था। वह अपनी होने वाली पत्नी के हाथ में हाथ डालकर हवाई जहाजों को बादलों को छूते हुए देखना चाहता था। उसे क्या मालूम था कि वह जिस उड़ान को देखने आया है, वह उसकी अपनी जिंदगी की आखिरी उड़ान साबित होगी। वह उस रात के बाद कभी अपने घर नहीं लौटा, पीछे छोड़ गया तो सिर्फ एक बूढ़े मां-बाप की रोती हुई आंखें और एक ऐसा समाज जो आज भी किसी अजनबी सुनसान सड़क पर मंगेतर के साथ जाने से पहले सौ बार सोचता है।