JNU में ‘प्रयाग-दिल्ली संगम 2026’ के अंतर्गत ‘प्रयाग उत्सव’ का भव्य आयोजन, 450 से अधिक प्रतिभागियों ने प्रयागराज की सांस्कृतिक एवं अकादमिक विरासत का किया उत्सवपूर्ण स्मरण

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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), नई दिल्ली के कन्वेंशन सेंटर में रविवार, 25 अक्टूबर को ‘प्रयाग-दिल्ली संगम 2026’ के अंतर्गत ‘प्रयाग उत्सव’ का भव्य आयोजन किया गया। शंख इनिशिएटिव्स की इस महत्वपूर्ण पहल के माध्यम से प्रयागराज की सांस्कृतिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक एवं अकादमिक विरासत को एक साझा मंच पर प्रस्तुत किया गया। उत्सव में दिल्ली-एनसीआर में निवास करने वाले प्रयागराज से जन्म, शिक्षा, कार्य, प्रवास अथवा सांस्कृतिक जुड़ाव रखने वाले 450 से अधिक प्रतिभागियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम का उद्देश्य प्रयागराज की समृद्ध परंपराओं का उत्सव मनाने के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में योगदान दे रहे शहर से जुड़े व्यक्तित्वों को एक मंच पर लाना तथा नई पीढ़ी को इसकी विरासत से जोड़ना रहा।कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं इलाहाबाद पश्चिम के पूर्व विधायक श्री सिद्धार्थ नाथ सिंह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने ‘प्रयाग उत्सव 2026’ को प्रयागराज की सांस्कृतिक पहचान और गौरवशाली विरासत को राष्ट्रीय राजधानी में अभिव्यक्त करने वाली महत्वपूर्ण पहल बताया। उन्होंने कहा कि शंख इनिशिएटिव्स ने प्रयागराज की संस्कृति, साहित्य और बौद्धिक परंपरा को दिल्ली में रहने वाले लोगों के समक्ष प्रस्तुत करने का सराहनीय प्रयास किया है। जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान में इस प्रकार का आयोजन प्रयागराज की ऐतिहासिक विरासत और समकालीन बौद्धिक विमर्श के बीच संवाद स्थापित करने का अवसर प्रदान करता है। ऐसे प्रयासों से अपनी जड़ों के प्रति जुड़ाव मजबूत होता है और आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने की प्रेरणा मिलती है।उत्सव के समापन सत्र में उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री श्री नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि प्रयागराज की मिट्टी में एक विशेष प्रकार का अपनत्व है, जो यहां से निकलकर देश-दुनिया में कहीं भी जाने वाले लोगों को आपस में जोड़ देता है। गंगा और यमुना की पावन धारा तथा सरस्वती की आध्यात्मिक उपस्थिति से पहचाने जाने वाले प्रयागराज की वास्तविक सांस्कृतिक चेतना यहां के लोगों के मन, उनकी स्मृतियों, संस्कारों और कर्मों में निरंतर प्रवाहित होती है। सरस्वती को विलुप्तावस्था में माना जाता है, लेकिन प्रयागराज से निकलने वाले और इसकी परंपराओं को अपने जीवन में संजोने वाले प्रत्येक व्यक्ति के विचारों एवं कार्यों में इसकी ज्ञान-परंपरा जीवंत रहती है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक प्रयागवासी को अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना चाहिए। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में देश और प्रदेश में सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए हो रहे प्रयास इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं।

read more:https://pahaltoday.com/manveer-singh-arrested-near-nepal-border-sent-to-punjab-under-tight-security/ उन्होंने शंख इनिशिएटिव्स की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि ‘प्रयाग उत्सव’ जैसे आयोजन सांस्कृतिक स्मृतियों को सहेजने, सामाजिक आत्मीयता को मजबूत करने और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का अवसर प्रदान करते हैं।कार्यक्रम में इतिहास, साहित्य, शिक्षा और समकालीन विमर्श से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों ने अपने विचार साझा किए। प्रयाग उत्सव 2026 के संरक्षक एवं ईश्वर डिग्री कॉलेज के प्राचार्य प्रो. आनंद शंकर सिंह ने प्रयागराज की ऐतिहासिक निरंतरता, बौद्धिक परंपरा और ज्ञान-सृजन में इसके योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि प्रयागराज की विरासत केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को दिशा देने वाली जीवंत परंपरा है। शंख इनिशिएटिव्स की संरक्षिका डॉ. कृतिका अग्रवाल ने आयोजन को विभिन्न पीढ़ियों, शैक्षणिक समुदायों और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से जुड़े लोगों के बीच संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि प्रयागराज की पहचान को व्यापक विमर्श में स्थापित करने और उसकी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए ऐसे मंचों की निरंतर आवश्यकता है। श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने भी भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और अकादमिक संवाद के महत्व को रेखांकित किया। इसके अतिरिक्त डॉ. धनंजय चोपड़ा, डॉ. मृत्युंजय राव परमार, प्रो. मधु रानी शुक्ला, श्री शांतनु गुप्ता, श्री रौनक गुप्ता, श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी, श्री शिवेंद्र कुमार सिंह और श्री जितेंद्र मणि त्रिपाठी सहित विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े वक्ताओं ने प्रयागराज की सांस्कृतिक पहचान, साहित्यिक योगदान, ऐतिहासिक महत्त्व और समकालीन संभावनाओं पर विचार रखे।उत्सव के दौरान आयोजित दो पैनल चर्चाओं में प्रयागराज की साहित्यिक परंपरा, सांस्कृतिक चेतना, अकादमिक योगदान और सामाजिक जीवन के विविध आयामों पर विस्तार से विमर्श हुआ। कथक, लोकगायन, युवा कवि सम्मेलन और संगीतमय प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को विशिष्ट सांस्कृतिक स्वरूप प्रदान किया। आयोजन में यह विचार प्रमुखता से उभरा कि प्रयागराज से जुड़ाव केवल जन्मस्थान या निवास तक सीमित नहीं है; यहां शिक्षा प्राप्त करने, कार्य करने, सांस्कृतिक आयोजनों में सहभागिता करने अथवा शहर की परंपराओं से आत्मीय संबंध रखने वाले सभी लोगों के लिए प्रयागराज एक साझा सांस्कृतिक पहचान है। आयोजन समिति के सदस्य एडवोकेट प्रतीक मिश्रा, इंजीनियर आलोक कुमार सिंह, श्री सिद्धांत मिश्रा, श्री आशुतोष उपाध्याय, श्री विजय जायसवाल, डॉ. कृतिका अग्रवाल, प्रो. सपना रतन शाह और डॉ. मृत्युंजय राव परमार ने आयोजन को सफल बनाने में योगदान देने वाले सभी अतिथियों, वक्ताओं, कलाकारों, सहयोगियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। ‘प्रयाग-दिल्ली संगम 2026’ के अंतर्गत आयोजित ‘प्रयाग उत्सव’ ने प्रयागराज की सांस्कृतिक और अकादमिक विरासत को साझा मंच प्रदान करते हुए दिल्ली-एनसीआर में बसे प्रयागराज से जुड़े लोगों के बीच आत्मीयता, संवाद और सांस्कृतिक जुड़ाव को सुदृढ़ करने की दिशा में सार्थक पहल की।

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