ललितपुर- आर्थिक ,राजनीतिक मामलों के मामलों की विश्लेषक राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि कल्पना कीजिए कि दुनिया की लगभग पाँचवां हिस्सा तेल आपूर्ति जिस समुद्री रास्ते से गुजरती है, वही रास्ता अचानक बारूदी सुरंगों से भर जाए। टैंकरों के इंजन चालू हों, लेकिन समुद्र के नीचे मौत का जाल बिछा हो। यही भयावह परिदृश्य आज विश्व ऊर्जा व्यवस्था के सामने खड़ा है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध ने अब समुद्र को भी अपना रणक्षेत्र बना लिया है और विश्व ऊर्जा आपूर्ति की धुरी माने जाने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मूज में बारूदी माइंस बिछाने की खबरों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कन तेज कर दी है।
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समुद्र में उतरता युद्ध और ऊर्जा की धड़कन-
यह वही संकरा समुद्री मार्ग है जिससे दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और भारी मात्रा में एलएनजी की आपूर्ति गुजरती है। यदि इस जलमार्ग में बारूदी जाल बिछता है या जहाज़ों की आवाजाही बाधित होती है तो उसका असर केवल तेल के दामों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर सकता है।
कुछ समय पहले मैंने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और हार्मूज की संवेदनशीलता पर एक लेख में चेतावनी दी थी कि यदि यह जलमार्ग युद्ध का केंद्र बना तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में अभूतपूर्व उथल-पुथल देखने को मिल सकती है। आज की परिस्थितियाँ उस आशंका को काफी हद तक सही साबित करती दिखाई दे रही हैं।
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400 डॉलर का तेल: चेतावनी या आने वाला संकट?
इसी संदर्भ में ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि युद्ध जारी रहा और हार्मूज जलडमरूमध्य में अवरोध पैदा हुआ तो कच्चे तेल की कीमतें 400 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकती हैं।
भले ही यह अनुमान चरम स्थिति को दर्शाता हो, लेकिन इसके पीछे की वास्तविकता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। तेल का वैश्विक बाजार केवल वास्तविक आपूर्ति से नहीं बल्कि भय, जोखिम और अनिश्चितता से भी संचालित होता है। यदि बीमा कंपनियाँ टैंकरों को कवर देने से हिचकने लगें या जहाज़ मालिक इस मार्ग से गुजरने में जोखिम महसूस करें, तो आपूर्ति स्वतः बाधित हो सकती है।
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हार्मूज में बिछती बारूदी माइंस केवल जहाज़ों को नहीं रोकतीं—वे पूरी दुनिया की ऊर्जा अर्थव्यवस्था को बंधक बना सकती हैं, और इसका सबसे बड़ा झटका भारत जैसे आयातक देशों को लगेगा।”श
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भारत की ऊर्जा निर्भरता: सबसे कमजोर कड़ी-
इस संकट का सबसे बड़ा असर उन देशों पर पड़ सकता है जो ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भर हैं, और उनमें प्रमुख है भारत ।
भारत अपनी कुल तेल आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। एलपीजी और एलएनजी की आपूर्ति का भी बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है और इनका प्रमुख मार्ग हार्मूज ही है।
पहले से ही घरेलू और वाणिज्यिक गैस की बढ़ती कीमतों ने होटल, रेस्टोरेंट, टाइल्स और सिरेमिक उद्योग सहित कई छोटे और मध्यम उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। यदि वैश्विक बाजार में तेल और गैस के दाम तेजी से बढ़ते हैं तो इसका सीधा असर महँगाई, उत्पादन लागत और रोजगार पर पड़ेगा।
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रणनीतिक तेल भंडार: सुरक्षा या अपर्याप्त तैयारी?
भारत की ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में एक और गंभीर प्रश्न सामने आता है—रणनीतिक तेल भंडार की क्षमता।
वर्तमान में भारत के पास लगभग 5.33 मिलियन टन का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार है, जो देश की लगभग 9–10 दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है।
यदि रिफाइनरियों और कंपनियों के भंडार को जोड़ दिया जाए तो कुल मिलाकर लगभग 70 दिनों की आपूर्ति का सुरक्षा कवच माना जाता है। सरकार इस क्षमता को बढ़ाकर लगभग 11.8 मिलियन टन तक ले जाने की योजना बना रही है, जिससे रणनीतिक भंडार लगभग 20–22 दिनों की जरूरत पूरी कर सकेगा।
फिर भी अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार बड़े आयातक देशों को कम से कम 90 दिनों का रणनीतिक भंडार रखना चाहिए।
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क्या विदेश नीति का संतुलन बिगड़ गया है?
यह संकट भारत की विदेश नीति के सामने भी एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। दशकों तक भारत और ईरान के संबंध ऊर्जा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी पर आधारित रहे हैं।
लेकिन हाल के वर्षों में इसराइल के साथ बढ़ते खुले रणनीतिक समीकरणों ने पश्चिम एशिया की पारंपरिक संतुलित कूटनीति को एक नई दिशा दी है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में रणनीतिक साझेदारी आवश्यक हो सकती है, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा जैसे संवेदनशील प्रश्नों पर संतुलित कूटनीति अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
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ऊर्जा सुरक्षा की नई रणनीति की आवश्यकता-
स्पष्ट है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत को अपनी ऊर्जा नीति और कूटनीति दोनों को नए सिरे से परिभाषित करना होगा।
रणनीतिक तेल और गैस भंडार को अंतरराष्ट्रीय मानकों तक बढ़ाना, पश्चिम एशिया में संतुलित और सक्रिय ऊर्जा कूटनीति अपनाना तथा हरित हाइड्रोजन, बायोगैस और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे विकल्पों में तेज़ी से निवेश करना समय की मांग है।