भागलपुर, बिहार। भारत में शिक्षा को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाने और वयस्कों को ज्ञान, जागरूकता तथा आत्मनिर्भरता से जोड़ने की दिशा में 1–2 दिसंबर 1939 को भागलपुर स्थित तेज नारायण बनैली (टी.एन.बी.) कॉलेज में आयोजित द्वितीय अखिल भारतीय प्रौढ़ शिक्षा सम्मेलन एक ऐतिहासिक पड़ाव के रूप में सामने आया। इस सम्मेलन ने देश में प्रौढ़ शिक्षा के प्रयासों को संगठित स्वरूप देने तथा राष्ट्रीय स्तर पर उनके विस्तार के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। इस अवसर पर भारतीय प्रौढ़ शिक्षा संघ (IAEA) की औपचारिक स्थापना और उसके संविधान को अपनाया जाना भारतीय शिक्षा के इतिहास की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है। सम्मेलन की अध्यक्षता बॉम्बे विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. आर. पी. मसानी ने की। वे बॉम्बे प्रेसीडेंसी प्रौढ़ शिक्षा संघ के संस्थापक अध्यक्ष भी थे। उनके नेतृत्व में आयोजित इस सम्मेलन ने प्रौढ़ शिक्षा को केवल साक्षरता तक सीमित न रखते हुए उसे सामाजिक चेतना, नागरिक उत्तरदायित्व, व्यक्तित्व विकास और आजीवन सीखने की प्रक्रिया से जोड़ने की आवश्यकता को रेखांकित किया। इस ऐतिहासिक सम्मेलन से जुड़े प्रमुख शिक्षाविदों और सार्वजनिक जीवन की प्रतिष्ठित हस्तियों में श्री आर. एन. चेटसिंह, श्री एच. बी. रिचर्डसन, डॉ. अमरनाथ झा, डॉ. जाकिर हुसैन, श्री वी. एस. माथुर, श्री एन. के. मुखर्जी, श्री एस. एम. भरूचा तथा श्री रघुनंदन सरन के नाम उल्लेखनीय है। इन शिक्षाविदों और नेतृत्वकर्ताओं की भागीदारी ने प्रौढ़ शिक्षा को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने तथा विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे प्रयासों को एक साझा मंच प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।read more:https://pahaltoday.com/ballia-police-receive-two-modern-interceptor-bikes-sp-omvir-singh-flags-them-off/डॉ. जाकिर हुसैन, जिन्होंने आगे चलकर भारत के राष्ट्रपति का पद संभाला, शिक्षा को मानवीय विकास, सामाजिक समानता और राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम मानने वाले प्रमुख शिक्षाविदों में शामिल थे। डॉ. अमरनाथ झा सहित अन्य शिक्षाविदों की उपस्थिति ने भी इस सम्मेलन के शैक्षिक महत्व को विशेष पहचान प्रदान की।भारतीय प्रौढ़ शिक्षा संघ के गठन और संविधान की स्वीकृति का उद्देश्य प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक साझा मंच उपलब्ध कराना तथा वयस्कों की शिक्षा से संबंधित गतिविधियों को व्यवस्थित दिशा देना था। उस समय भारत में निरक्षरता एक बड़ी सामाजिक चुनौती थी। ऐसे वातावरण में प्रौढ़ शिक्षा को बढ़ावा देना सामाजिक जागरूकता, लोकतांत्रिक भागीदारी और व्यापक शैक्षिक अवसरों की दिशा में आवश्यक कदम था। यह सम्मेलन इस विचार को मजबूत करने वाला आयोजन था कि शिक्षा प्राप्त करने की कोई निश्चित आयु नहीं होती। व्यक्ति जीवन के किसी भी चरण में सीख सकता है और अपने ज्ञान तथा क्षमताओं का विकास कर सकता है। प्रौढ़ शिक्षा का उद्देश्य केवल पढ़ना-लिखना सिखाना नहीं, बल्कि लोगों को अपने अधिकारों, कर्तव्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक बनाना भी है।भागलपुर के टी.एन.बी. कॉलेज में आयोजित यह सम्मेलन भारतीय शिक्षा के इतिहास में सामूहिक प्रयास, शैक्षिक नेतृत्व और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक मिसाल के रूप में देखा जा सकता है। भारतीय प्रौढ़ शिक्षा संघ के औपचारिक गठन और संविधान को अपनाए जाने से 82प्रौढ़ शिक्षा को संगठित राष्ट्रीय दिशा देने की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण आधार मिला। इस ऐतिहासिक पहल का मूल संदेश आज भी प्रासंगिक है—शिक्षा केवल विद्यालयों और विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को बेहतर बनाने वाला सतत अभियान है।