डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
कमरे में चौंसठ साल के जगदीश बाबू फेफड़ों के गंभीर संक्रमण के कारण पिछले तीन हफ्तों से होम ऑक्सीजन कंसंट्रेटर के सहारे सांसें खींच रहे थे। अचानक बिजली कटते ही मशीन की मोटर थम गई और ऑक्सीजन का फ्लो शून्य पर आ गिरा। उनके पच्चीस साल के बेटे अनुराग ने अंधेरे में फोन की रोशनी में देखा कि कंसंट्रेटर की इमरजेंसी बैटरी में सिर्फ बारह मिनट का बैकअप बचा था। अनुराग की कांपती उंगलियों ने बिजली विभाग का सुपर स्मार्ट ऊर्जा ऐप खोला तो स्क्रीन पर लाल रंग का पॉप अप दिखा कि पीक ऑवर डायनामिक टैरिफ के कारण आपका बैलेंस माइनस तीन रुपये चालीस पैसे हो गया है, तत्काल रिचार्ज करें। अनुराग ने तुरंत सौ रुपये का रिचार्ज डालकर यूपीआई पिन दर्ज किया, लेकिन स्क्रीन पर बैंक सर्वर से संपर्क का पहिया घूमने लगा। पिता के सीने से घुरघुराहट की आवाज आने लगी और वे हवा में हाथ उठाकर भागती जिंदगी को थामने की कोशिश कर रहे थे।घबराकर अनुराग ने चौबीस घंटे वाली एआई पावर्ड हेल्पलाइन पर कॉल लगाया, जहाँ से एक मीठी कम्प्यूटरीकृत आवाज आई कि सभी ऑपरेटर व्यस्त हैं।read more:https://pahaltoday.com/ballia-police-receive-two-modern-interceptor-bikes-sp-omvir-singh-flags-them-off/ अनुराग के रोने और चिल्लाने पर भी कंप्यूटर ने शालीनता से कह दिया कि अमान्य इनपुट है और सफल भुगतान के तीन घंटे के भीतर आपूर्ति बहाल होगी। व्यवस्था जब ऑटोमैटिक होती है तो सबसे पहले अपनी आत्मा को फॉर्मेट कर देती है। अनुराग नंगे पैर रात के दो बजे सब स्टेशन की तरफ दौड़ा, लेकिन लोहे के चैनल गेट पर ताला लटक रहा था और डिजिटल भारत का नोटिस बोर्ड लगा था कि अब दफ्तर आने की जरूरत नहीं है।बदहवास होकर जब वह कमरे में लौटा तो कंसंट्रेटर की लाल बत्ती बुझ चुकी थी और हर तरफ सन्नाटा था। जगदीश बाबू का हाथ चारपाई से नीचे लटक चुका था और उनका शरीर बर्फ जैसा ठंडा हो गया था। वे उस तीन रुपये चालीस पैसे के कर्ज से बहुत आगे निकल चुके थे, जिसे वसूलने के लिए एक एल्गोरिदम ने उनकी सांसों का प्लग खींच लिया था। ठीक उसी पल अनुराग के फोन पर बैंक का संदेश चमका कि ट्रांजैक्शन सक्सेसफुल और कमरे का स्मार्ट मीटर चालू होते ही सीलिंग फैन घूमने लगा और बल्ब जल उठा। अनुराग ने उस रोशनी में अपने पिता के शांत चेहरे को देखा और उनके सीने पर सिर रखकर बिना किसी आवाज के रोने लगा।