कस्बे के मुख्य बाजार के मुहाने पर करीम चाचा की सिलाई की दुकान किसी पुराने लोकतंत्र की तरह खड़ी थी जिसकी दीवार पर लकड़ी का एक घिसा हुआ गज ऐसे टँगा रहता था जैसे किसी दफ्तर में नैतिकता की पुरानी तस्वीर धूल फाँक रही हो। उस नापने वाले गज के सिरों पर जड़ी पीतल की पत्तियाँ धूप की मार से वैसी ही मद्धम पड़ गई थीं जैसी चुनाव के बाद जनसेवक की ईमानदारी पड़ जाती है। दुकान में हर रोज सुबह आठ बजते ही सिलाई मशीनों की खटर-पटर ऐसे शुरू होती थी जैसे सरकारी विभाग में भ्रष्टाचार की फाइलें दौड़ने लगी हों। करीम चाचा रोज सुबह शटर उठाते ही सबसे पहले उस पुराने गज को दीवार से उतारते और उस पर जमी गर्द ऐसे पोंछते जैसे कोई नेता अपने दामन के पुराने दाग साफ करने की कोशिश कर रहा हो। सफेद जालीदार टोपी और आँखों पर आधा चश्मा टिकाए चाचा दिन भर उस गज को ऐसे निहारते थे जैसे वह लकड़ी का डंडा न होकर किसी बेईमान विभाग का ऑडिट रिकॉर्ड हो जिसे देखकर बड़े-बड़े ठेकेदारों का ब्लड प्रेशर बढ़ जाए। जब भी कोई नया ग्राहक नाप देने आता तो चाचा पुराने गज को हाथ नहीं लगाते थे क्योंकि उन्हें पता था कि नए जमाने के खोखले शरीरों को नापने के लिए प्लास्टिक का वह आधुनिक फीता ही काफी है जो हर मोड़ पर मुड़ने की सलाहियत रखता है। सलीम चाचा की इस आदत पर अक्सर मज़ाक उड़ाता कि जब प्लास्टिक का फ्लेक्सिबल फीता मौजूद है तो इस लकड़ी के बोझ को ढोने की क्या तुक है पर वह नहीं जानता था कि सख्त सिद्धांत अक्सर बोझ ही महसूस होते हैं। करीम चाचा बस एक कड़वी मुस्कान बिखेर देते जो किसी बजट भाषण की तरह नीरस और रहस्यमयी होती थी और कहते कि यह गज इंसान के ईमान का वह सच्चा पैमाना है जिसे नापने का हुनर आजकल के उस प्लास्टिक में नहीं जो खुद हर पल अपनी लंबाई बदलने को तैयार रहता है।उस कस्बे के सबसे रईस ठेकेदार बाबू बृजमोहन जी का अपनी दौलत पर वैसा ही अटूट विश्वास था जैसा एक अनपढ़ का अपनी तकदीर पर होता है। बृजमोहन जी जब अपनी लंबी चमचमाती गाड़ी से बाजार में कदम रखते तो पूरा बाजार उनके स्वागत में ऐसे बिछ जाता था जैसे किसी अपराधी के स्वागत में न्याय की गरिमा बिछ जाती है। बृजमोहन जी को अपने सूट सिर्फ करीम चाचा से ही सिलवाना पसंद था क्योंकि उन्हें पता था कि जितना करीम चाचा कपड़े की कमियाँ छुपा सकते हैं उतना तो शायद उनका मुनीम खातों की हेराफेरी भी नहीं कर पाता होगा। एक दिन जब बाजार में रौनक वैसी ही सुस्त थी जैसा किसी सरकारी स्कूल का लंच ब्रेक होता है तब बृजमोहन जी अपने नौकरों के साथ दुकान पर पहुँचे। उनके हाथ में विदेशी रेशम का वह थान था जिसकी चमक देखकर गरीब की भूख और बढ़ जाए।read more:https://pahaltoday.com/manveer-singh-arrested-near-nepal-border-sent-to-punjab-under-tight-security/ बृजमोहन जी ने गद्दी पर बैठते हुए ऐसे रौब से सूट तैयार करने को कहा जैसे वह किसी मंत्री को तबादले का हुक्म दे रहे हों ताकि शादी में आने वाले अफसर उनकी अमीरी की चौंध से अंधे हो सकें। जब उनकी नजर मेज पर रखे उस पुराने गज पर पड़ी तो उन्होंने नाक-भौं ऐसे सिकोड़ी जैसे किसी संस्कारी सभा में कोई सच बोल गया हो। उन्होंने तल्ख लहजे में पूछा कि इस कबाड़ को क्यों नहीं फेंक देते तो चाचा ने धीमे स्वर में कहा कि बाबूजी यह कबाड़ नहीं बल्कि उस दौर का गवाह है जब इस कस्बे में शरीफ इंसान और ईमानदारी का नाप भी इसी से लिया जाता था।पुराने मुंशी दीनानाथ जो सालों से कचहरी की धूल फाँककर इतने अनुभवी हो गए थे कि चेहरे देखकर ही धाराओं का अंदाजा लगा लेते थे उन्होंने भी गज की महिमा का बखान शुरू किया। उन्होंने बताया कि पच्चीस साल पहले जब अकाल पड़ा था और लोग ऐसे तड़प रहे थे जैसे बिना रिश्वत के कोई फाइल तड़पती है तब चाचा के बेटे कासिम ने इसी गज से गरीबों का बदन ढका था। बृजमोहन जी ने उत्सुक होकर पूछा कि आखिर उस डंडे में ऐसी क्या खास बात है तो दीनानाथ ने लंबी साँस भरकर बताया कि कासिम ने इसी गज से नापकर मुफ़्त में पोशाकें बाँटी थीं ताकि कस्बे का आत्मसम्मान नंगा न रह जाए। करीम चाचा की आँखें नम हो गईं क्योंकि उनके लिए वह गज एक बेटे का वादा था जो शहर जाकर शायद सफलता की उस ऊँचाई पर पहुँच गया था जहाँ से बाप की छोटी दुकान किसी चींटी जैसी नजर आती होगी। बृजमोहन जी ने एक कड़कड़ाता हुआ ठहाका लगाया जो किसी भ्रष्ट अफसर की जीत जैसा लग रहा था और बोले कि तुम आज भी उस पुराने वादे को इस लकड़ी में ढूंढ रहे हो जबकि वह लड़का अब तक शहर में मुनाफाखोरी के नए पैमानों से अपनी तकदीर नाप चुका होगा।बृजमोहन जी ने नाप देने के लिए खड़े होकर कहा कि मेरी इज्जत का सवाल है इसलिए सूट में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए क्योंकि उनकी नजर में इज्जत हमेशा कपड़े की सिलाई में ही टँगी रहती थी। करीम चाचा ने पहली बार उस पुराने गज को किसी ग्राहक के शरीर पर रखा तो उनके हाथ अचानक ऐसे थरथराने लगे जैसे किसी पुराने गवाह के पैर अदालत के कटघरे में डगमगा जाते हैं। चाचा ने चुपचाप कपड़े को काटा और सूट तैयार करने का वादा किया जैसे कोई राजनेता चुनाव से पहले खुशहाली का वादा करता है। अगले दिन जब सूरज की लालिमा ऐसे बिखर रही थी जैसे किसी घोटाले की खबर अखबार के पन्नों पर बिखरती है तब बृजमोहन जी अपना सूट लेने पहुँचे। उन्होंने सूट पहना और आईने के सामने अपनी छाती ऐसे फुलाई जैसे कोई नया ठेकेदार पहली सड़क बनाने के बाद फुलाता है। सूट इतना सटीक बैठा था कि बृजमोहन जी ने रुपयों की गड्डी ऐसे निकाली जैसे कोई सेठ अपने पापों का प्रायश्चित दानपात्र में कर रहा हो। उन्होंने घमंड से कहा कि तुम्हारे इस पुराने गज में वाकई कोई जादू है पर चाचा ने उन नोटों को हाथ भी नहीं लगाया क्योंकि वे जानते थे कि कागज के इन टुकड़ों में खून की महक छिपी है।चाचा ने दराज से एक पुराना मुड़ा हुआ कागज निकाला जो किसी पुरानी वसीयत की तरह बदरंग हो चुका था और उसे बृजमोहन जी के सामने फैला दिया। उस कागज को देखकर बृजमोहन जी के चेहरे की रंगत वैसी ही उड़ गई जैसी पुलिस को देखकर किसी पॉकेटमार की उड़ती है। वह पच्चीस साल पुराना एक गुप्त समझौता पत्र था जो यह साबित कर रहा था कि आदर्शवादी कासिम को असल में बृजमोहन जी ने ही अपनी काली कमाई का साझीदार बनाकर शहर भेजा था ताकि गरीबों का कपड़ा गोदामों में कैद किया जा सके। करीम चाचा ने बिलखते हुए कहा कि बाबूजी जिस कासिम की कामयाबी के किस्से आप सुना रहे हैं वह असल में आपका ही दामाद है जिसने अपनी जमीर को पच्चीस साल पहले ही नीलाम कर दिया था। चाचा ने उस गज को छाती से चिपका लिया क्योंकि उन्हें समझ आ गया था कि जिस बेटे का वे इंतजार कर रहे थे वह तो कब का मर चुका है और अब केवल एक बड़ा व्यापारी बचा है। उन्होंने रुँधे गले से कहा कि आज जब मैंने इस गज से आपका सीना नापा तो पता चला कि सूट तो बहुत शानदार बन गया पर आपकी इंसानियत इतनी सिकुड़ गई है कि वह इस लकड़ी के गज के एक इंच के बराबर भी नहीं बची। बृजमोहन जी आईने के सामने किसी निर्जीव मूर्ति की तरह खड़े रह गए क्योंकि उनकी सारी दौलत उस घिसे हुए गज के सामने बहुत बौनी नजर आ रही थी और पूरा बाजार उस बाप के आंसुओं के सन्नाटे में डूब गया जो अपनी ईमानदारी का आखिरी पैमाना बचाए बैठा था।