नितिन गुप्ता।धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक नगरी वाराणसी में मोक्षदायिनी गंगा का अति-रौद्र और विकराल रूप एक बार फिर तटीय व निचले इलाकों के लाखों निवासियों के लिए भीषण तबाही और महाप्रलय की आहट बनकर उभरा है। पहाड़ी राज्यों और मैदानी क्षेत्रों में हो रही अनवरत मूसलाधार बारिश के साथ-साथ विभिन्न बांधों से छोड़े जा रहे पानी के कारण नदी का जलस्तर प्रति घंटे कई सेंटीमीटर की घातक रफ्तार से ऊपर चढ़ रहा है। चेतावनी बिंदु को बेहद आसानी से पार करने के बाद अब गंगा का जलस्तर पूरी भयावहता के साथ खतरे के निशान की तरफ तेजी से कदम बढ़ा रहा है। जल स्तर में हो रही इस अप्रत्याशित, अकल्पनीय और तीव्र वृद्धि ने समूची काशी के 84 पारंपरिक घाटों का आपसी संपर्क पूरी तरह काट दिया है और तटीय इलाकों में रहने वाले हजारों परिवारों के दिलों में गहरी दहशत, खौफ और भारी अनहोनी की आशंका पैदा कर दी है।गंगा में आए इस प्रचंड, अदम्य और विकराल उफान का सबसे ज्यादा, भयावह और विनाशकारी प्रभाव उसकी सहायक वरुणा नदी के मुहाने तथा तटीय रिहाइशी क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है। मुख्य गंगा नदी में जल का विशाल दबाव और घनत्व अत्यधिक बढ़ जाने के कारण वरुणा नदी का स्वाभाविक बहाव पूरी तरह रुका हुआ है और उसमें व्यापक स्तर पर ‘रिवर्स फ्लो’ यानी पलट प्रवाह (बैकवॉटर) की अत्यंत गंभीर स्थिति पैदा हो गई है। वरुणा का उफनता पानी अपने सामान्य मार्ग को छोड़कर उल्टी दिशा में भीषण वेग से बहते हुए आसपास की घनी आबादी वाली बस्तियों को बड़ी बेरहमी से अपनी आगोश में ले रहा है। नदी के इस विपरीत और विनाशकारी बहाव ने निचले इलाकों में जलप्लावन की स्थिति को पल-पल और अधिक भयावह, अनियंत्रित तथा विस्फोटक बना दिया है।वरुणा के इस प्रचंड पलट प्रवाह और बदबूदार दूषित पानी के तेज भराव के कारण कोनिया घाट, पुलकोहना, पुराना पुल, सलारपुर, सरैया और नदेसर के निचले हिस्सों समेत शहर की दर्जनों बड़ी रिहाइशी बस्तियां पूरी तरह से जलमग्न होकर ताल-तलैया में तब्दील हो चुकी हैं। मोहल्लों की मुख्य सड़कों, संकरी गलियों, पार्कों, विद्यालयों और खाली मैदानों में चार से छह फीट तक बाढ़ का मटमैला पानी भर जाने से आम जनजीवन पूरी तरह से पटरी से उतर गया है और ठप हो चुका है। सैकड़ों मकानों की पहली मंजिल, निचले कमरों, बैठकों और रसोईघरों तक बाढ़ का पानी समा जाने के कारण लोगों का हफ्तों का राशन, कीमती इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, फर्नीचर, कपड़े और गृहस्थी का सारा जमा-पूंजी सामान पानी में डूबकर सड़ने और बर्बाद होने लगा है, जिससे प्रभावित क्षेत्रों में चारों तरफ केवल बेबसी और तबाही का मंजर नजर आ रहा है।बाढ़ के इस भीषण प्रकोप ने प्रभावित क्षेत्रों की मुख्य परिवहन व्यवस्था, सार्वजनिक आवागमन और संपर्क मार्गों की रीढ़ ही पूरी तरह से तोड़कर रख दी है। क्षेत्रीय आवागमन और व्यापारिक गतिविधियों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाने वाला सलारपुर-कोनिया पुल का मुख्य अप्रोच मार्ग पूरी तरह जलमग्न हो चुका है और जलधारा में विलीन हो गया है। अप्रोच मार्ग पर कई फीट गहरा पानी तेजी से बहने के कारण आधा दर्जन से अधिक बड़े मोहल्लों का एक-दूसरे से तथा शहर के मुख्य व्यावसायिक केंद्रों से संपर्क पूरी तरह कट गया है।read more:https://pahaltoday.com/demand-to-remove-government-country-liquor-shop-villagers-stage-protest-at-the-collectorate/#google_vignetteजो सड़कें कल तक गाड़ियों के हॉर्न और लोगों की चहल-पहल से गुलजार रहती थीं, वे आज किसी उफनती विशाल नदी या खतरनाक जलधारा के रूप में तब्दील नजर आ रही हैं, जिससे इलाके पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गए है।मुख्य रास्ते पूरी तरह से ठप, बाधित और डूब जाने के कारण स्थानीय नागरिकों को अपनी जान हथेली पर रखकर बेहद मुश्किल, दर्दनाक और जोखिम भरी परिस्थितियों में आवाजाही करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। बीमारों, वृद्धों और बच्चों की दैनिक जरूरतों के सामान व दवाओं का प्रबंध करने के लिए घर के पुरुष सदस्य कमर तक, तो कहीं छाती तक भरे बदबूदार बाढ़ के गंदे पानी में तैरते और खतरनाक ढंग से पैदल गुजरते हुए देखे जा रहे हैं। जिन इलाकों में पानी का बहाव बेहद तेज, गहरा और अनियंत्रित है, वहां अब आने-जाने का एकमात्र सहारा लकड़ी की छोटी-छोटी नावें ही बची हैं। पानी के तेज थपेड़ों और लहरों के बीच इन छोटी नावों पर क्षमता से दोगुने लोगों का सवार होना किसी भी वक्त एक बहुत बड़े और जानलेवा हादसे को दावत दे रहा है, जिससे मासूम बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा पर गंभीर खतरे के बादल मंडरा रहे है।जलस्तर में हर बीतते मिनट के साथ हो रहे इजाफे और घरों की दीवारों को फांदकर भीतर तेजी से घुसते पानी को देखकर प्रभावित इलाकों में पूरी तरह से चीख-पुकार और हाहाकार मचा हुआ है। अपने जीवनभर की गाढ़ी कमाई और खून-पसीने की मेहनत से बनाए गए आशियानों को अपनी आंखों के सामने जलसमाधि लेते देख दर्जनों बेबस और असहाय परिवार अब अपने ही मकानों को छोड़कर सुरक्षित ठिकानों की ओर आनन-फानन में पलायन करने की जद्दोजहद में जुटे है। लोग अपने छोटे-छोटे मासूम बच्चों, बुजुर्ग माता-पिता और मवेशियों को लेकर पक्की छतों, ऊंचे तटबंधों, पुलों की ढलानेों या दूर-दराज के रिश्तेदारों के यहां शरण लेने को मजबूर है। हालांकि, चारों तरफ फैले गहरे बाढ़ के पानी और कट चुके रास्तों के बीच अपना बचा-खुचा राशन, कपड़े, मवेशियों का चारा और सामान सुरक्षित बाहर निकालना उनके लिए एक बहुत बड़ी और नामुमकिन सी चुनौती बन चुका है।इन बेहद कष्टदायक, विचलित करने वाली और भीषण आपदा की परिस्थितियों के बावजूद बाढ़ प्रभावित इलाकों के निवासियों में स्थानीय प्रशासन की ढुलमुल कार्यशैली और राहत तैयारियों को लेकर गहरा आक्रोश, गुस्सा और निराशा साफ दिखाई दे रही है। पूरी तरह से बेघर होने और भुखमरी के मुहाने पर खड़े सैकड़ों लाचार परिवारों का आरोप है कि जलभराव को कई घंटे और दिन बीत जाने के बाद भी धरातल पर न तो कोई जिम्मेदार उच्च प्रशासनिक अधिकारी स्थिति का जायजा लेने पहुंचा है और न ही लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए एनडीआरएफ, एसडीआरएफ या जल पुलिस की पर्याप्त टीमें और नावें तैनात की गई है। राहत सामग्री के पैकेट, तिरपाल, सूखी सामग्री और पीने के साफ पानी के घोर अभाव में बाढ़ पीड़ित खुद को पूरी तरह असहाय, उपेक्षित और भगवान के भरोसे महसूस कर रहे है।यदि गंगा और वरुणा के जलस्तर में हो रही इस भीषण बढ़ोतरी का यह अनवरत सिलसिला इसी तेज रफ्तार से आगे भी जारी रहा, तो अगले 24 से 48 घंटे वाराणसी के कई अन्य नए रिहाइशी, निचले और घने व्यावसायिक इलाकों को भी अपनी तबाही की चपेट में ले सकते है। फिलहाल, चारों तरफ उफनते मटमैले पानी और बदबू के बीच घिरे हजारों बेबस नागरिक खुले आसमान, छतों और तटबंधों के नीचे बिना बिजली-पानी के भगवान के भरोसे अपनी खौफनाक और सन्नाटे से भरी रातें काटने को विवश है। ये बाढ़ पीड़ित लगातार टकटकी लगाए शासन और प्रशासन के मदद का इंतजार कर रहे है कि कब तक सरकारी तंत्र जागेगा, राहत सामग्री के पैकेट पहुंचेंगे, सुरक्षित नावें चलेंगी और राहत शिविरों का संचालन शुरू होगा, ताकि इस मंडराते जलप्रलय के बीच उनकी जिंदगी को बचाया जा सके।