आजादी के महासंग्राम में बिहार के गोपालगंज जिले का कटेया थाना क्षेत्र रणबांकुरों की शहादत, त्याग और अदम्य साहस का अमर साक्षी रहा है। अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों-सितम और अत्याचारों के खिलाफ इस पावन माटी के बेटों ने जो हुंकार भरी थी, उसने तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाकर रख दी थी। आजादी के इस वृहद आंदोलन में कटेया थाना क्षेत्र के खुरहुरिया निवासी बाबू महादेव राय, बैकुंठपुर के फुलेश्वर दुबे, रूपीबगही के आगम पांडेय, लामीचौर के भुआल पांडेय, गहनी चकिया के रामनंदन लाल श्रीवास्तव, राम इकबाल राय और राधिका वर्णवाल समेत कई शूरवीरों ने अपनी जान की बाजी लगा दी। स्थानीय इतिहास और उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, इन सेनानियों ने न केवल पूरे इलाके में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आम जनता को एकजुट कर संगठित किया, बल्कि हर मोड़ पर गोरी हुकूमत को सीधी चुनौती दी।
स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में 16 अगस्त 1942 का दिन कटेया क्षेत्र के लिए एक स्वर्णिम और ऐतिहासिक अध्याय के रूप में दर्ज हुआ। ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की ज्वाला जब पूरे देश में प्रचंड रूप से भड़क रही थी, तब बाबू महादेव राय के एक आह्वान पर हजारों की तादाद में आक्रोशित ग्रामीणों का जनसैलाब कटेया थाने की ओर निकल पड़ा। उग्र आंदोलनकारियों के प्रचंड तेवर, अदम्य साहस और भारी भीड़ को देखकर ब्रिटिश हुकूमत का तत्कालीन थाना प्रभारी चंद्रिका सिंह थर-थर कांप उठा और उसे वहां से अपनी जान बचाकर उल्टे पांव भागना पड़ा। इसके बाद उग्र क्रांतिकारियों ने पूरे थाने और स्थानीय डाकघर को पूरी तरह अपने कब्जे में ले लिया। थाने पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने के तुरंत बाद बाबू महादेव राय, फुलेश्वर दुबे और उनके सहयोगी वीर सेनानियों ने थाना परिसर में पूरे मान-सम्मान के साथ तिरंगा फहराया। अंग्रेजी हुकूमत के मुंह पर यह एक सीधा और करारा तमाचा था।read more:https://pahaltoday.com/district-magistrate-holds-meeting-of-the-district-drinking-water-and-sanitation-mission-issues-directives/आंदोलनकारियों ने केवल झंडा ही नहीं फहराया, बल्कि कई दिनों तक कटेया थाने पर अपना पूर्ण नियंत्रण भी बनाए रखा, जिससे वहां ब्रिटिश सत्ता पूरी तरह ठप हो गई।कटेया थाने पर तिरंगा फहराने और उस पर क्रांतिकारियों के कब्जे की खबर जब ब्रिटिश उच्चाधिकारियों तक पहुंची, तो वे बौखला उठे। बाबू महादेव राय को सबक सिखाने और उन्हें किसी भी कीमत पर गिरफ्तार करने के लिए अंग्रेजों ने विशेष ‘टॉमी फोर्स’ को कटेया भेजा। 29 अगस्त 1942 की काली भोर में अंग्रेजी सेना ने खुरहुरिया गांव को चारों तरफ से घेर लिया और गांव की घेराबंदी कर बाहर बड़ी-बड़ी मशीनगनें तैनात कर दीं। हालांकि, अंग्रेजों की इस खौफनाक चाल की भनक बाबू महादेव राय को पहले ही लग चुकी थी और वे सुरक्षित रूप से वहां से निकल चुके थे। महादेव राय को न पाकर झुंझलाए ब्रिटिश सिपाहियों ने उसी दिन शाम करीब चार बजे उनके पूरे घर में पेट्रोल डालकर आग लगा दी। इस बर्बर कार्रवाई और पूरे घर-बार के जलकर खाक हो जाने के बावजूद महादेव राय का हौसला नहीं टूटा। वे दो महीने तक लगातार भूमिगत रहकर गुप्त रूप से आंदोलन की मशाल जलाते रहे, जिसके बाद ही अंग्रेज पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने में सफल हो सकी। गिरफ्तारी के बावजूद उनके अंदर देशभक्ति का संकल्प कभी कमजोर नहीं पड़ा।अंग्रेजी हुकूमत का यह खौफनाक दमनचक्र केवल महादेव राय तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि रूपीबगही गांव के निवासी आगम पांडेय भी ब्रिटिश पुलिस के मुख्य निशाने पर रहे। स्वाधीनता आंदोलन में उनकी लगातार बढ़ती सक्रियता से बौखलाए अंग्रेजों ने एक-दो बार नहीं, बल्कि पूरे तीन बार उनके घर को आग के हवाले कर दिया। इसके बावजूद आगम पांडेय ने कभी भी फिरंगी हुकूमत के आगे घुटने टेकना स्वीकार नहीं किया और अपने मार्ग से पीछे नहीं हटे। इस कठिन और संघर्षपूर्ण दौर में उनकी धर्मपत्नी पैजनी देवी भी अपने पति के कंधों से कंधा मिलाकर खड़ी रहीं और उन्होंने भी आजादी के इस जन-आंदोलन में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाई।इसी कड़ी में बैकुंठपुर निवासी फुलेश्वर दुबे अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ी पहेली और सिरदर्द बने रहे। फुलेश्वर दुबे का प्रभाव और पहचान ऐसी थी कि वे देश के शीर्ष नेताओं—बाबू जगजीवन राम, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, गिरीश तिवारी और झूलन बाबू के साथ गांव के पूरब में स्थित डीघा के घने जंगलों में बैठकर अंग्रेजों के खिलाफ गुप्त रणनीतियां तैयार करते थे। जब अंग्रेजों को उनकी गतिविधियों की गुप्त सूचना मिली और उनके घर पर छापेमारी की योजना बनी, तो फुलेश्वर दुबे ने ग्रामीणों को एकजुट किया और रातोंरात गांव की मुख्य सड़क काटकर अंग्रेजी फौज का रास्ता ही पूरी तरह रोक दिया। यही नहीं, उन्होंने कई मौकों पर सरकारी टेलीफोन और तार काटकर ब्रिटिश अधिकारियों की पूरी संचार व्यवस्था ठप कर दी। फुलेश्वर दुबे की विलक्षण चतुराई का एक चर्चित किस्सा यह भी है कि वे कई दिनों तक खुद दरोगा का छद्म रूप धारण कर कटेया थाने में बेखौफ घूमते रहे और पुलिस के पूरे तंत्र पर अपना दबदबा बनाए रखा। इस दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ीं, लेकिन उनका यह संघर्ष देश को आजादी मिलने तक लगातार जारी रहा।कटेया की इस पावन माटी की शहादत और समर्पण की गाथा महज 18 वर्ष के युवा भुआल पांडेय के अमूल्य बलिदान के बिना अधूरी है। लामीचौर गांव के निवासी भुआल पांडेय ने इतनी छोटी सी उम्र में ही देश की आजादी की बेदी पर अपनी जान हथेली पर रख दी थी। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों से परेशान होकर ब्रिटिश अधिकारियों ने वर्ष 1932 में ही उन्हें गिरफ्तार कर पटना जेल भेज दिया। जेल के भीतर अंग्रेज अधिकारियों ने उन्हें झुकाने और तोड़ने के लिए क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। अंग्रेज अदालत ने 18 साल के इस नौजवान को 56 कोड़े मारने की अमानवीय सजा सुनाई और जेल में उन्हें पानी की एक बूंद तक न देने का सख्त फरमान जारी किया।कोड़ों की भीषण मार और पानी के अभाव में भुआल पांडेय का शरीर पूरी तरह जर्जर होता चला गया और वे मौत के मुहाने पर पहुंच गए, लेकिन उनकी आत्मा ने कभी ब्रिटिश शासन के सामने समर्पण नहीं किया। अत्यधिक यातनाओं के कारण जब उनका शरीर जवाब दे रहा था, तब भी उनकी अंतिम सांस तक मुख से केवल ‘भारत माता की जय’ का ही जयघोष निकलता रहा। भुआल पांडेय का यह सर्वोच्च बलिदान कटेया के स्वाधीनता इतिहास में वीरता का सबसे महान और भावुक अध्याय माना जाता है।यद्यपि आजादी के बाद लिखे गए मुख्यधारा के इतिहास में कटेया के इन महान स्वतंत्रता सेनानियों को वह स्थान और पहचान नहीं मिल सकी जिसके वे सच्चे हकदार थे, लेकिन उनका यह अमूल्य योगदान स्थानीय लोगों के दिलों और स्मृतियों में आज भी पूरी शिद्दत से जिंदा है। बाबू महादेव राय, फुलेश्वर दुबे, आगम पांडेय और भुआल पांडेय जैसे महान नायकों ने अपने व्यक्तिगत सुख, परिवार, संपत्ति और जीवन की परवाह किए बिना देश की स्वाधीनता की वेदी पर अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। कटेया की मिट्टी में दबा यह गौरवशाली इतिहास आने वाली हर पीढ़ी को राष्ट्रभक्ति, त्याग और स्वाभिमान की प्रेरणा देता रहेगा।