बिहार की पावन मिथिला भूमि अपनी समृद्ध संस्कृति, प्राचीन विद्या और गौरवशाली परंपराओं के लिए पूरे विश्व में जानी जाती है। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़े ‘दरभंगा राज’ और वहां के महाराजाओं के बहुमूल्य योगदान को रेखांकित करता एक विशेष आलेख सामने आया है, जिसका शोध दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. भीमराव अंबेडकर कॉलेज के बी.ए. हिंदी पत्रकारिता के प्रथम वर्ष के छात्र आदर्श कुमार ने किया है। यह आलेख दरभंगा राज के खंडवाला राजवंश, उसकी ऐतिहासिक संपत्ति और मिथिला को शिक्षा एवं संस्कृति का प्रमुख केंद्र बनाने में राजपरिवार की भूमिका को गहराई से उजागर करता है। दरभंगा राज के इतिहास में महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह का अत्यंत विशेष स्थान रहा है, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा, समाज सुधार और विभिन्न सार्वजनिक कार्यों में गहरी रुचि दिखाई। वे उन प्रमुख भारतीय राजाओं में गिने जाते है जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शुरुआती दौर में इसे मजबूत आर्थिक सहायता प्रदान की थी। उनके पश्चात, महाराजा रामेश्वर सिंह ने राजपरिवार की महान धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया। आज दरभंगा का प्रसिद्ध और लोकप्रिय श्यामा माई मंदिर इसी समृद्ध धार्मिक विरासत की एक जीवंत देन है, जो वर्तमान में इस ऐतिहासिक शहर की पहचान का एक मुख्य हिस्सा बन चुका है।read more:https://pahaltoday.com/ballia-police-receive-two-modern-interceptor-bikes-sp-omvir-singh-flags-them-off/इस राजपरिवार के अंतिम प्रमुख शासक महाराजा कामेश्वर सिंह थे, जिन्होंने शिक्षा, संस्कृति, समाजसेवा और राजनीति के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया। वे स्वतंत्र भारत के निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से जुड़े रहे और भारत की संविधान सभा के सम्मानित सदस्य भी रहे। उनके कार्यकाल के दौरान दरभंगा की शैक्षणिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को अभूतपूर्व प्रोत्साहन मिला, जिसके कारण शिक्षा के क्षेत्र में उनका नाम आज भी अत्यंत आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। इसके अतिरिक्त, दरभंगा राज का इतिहास आधुनिक विमानन क्षेत्र से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। महाराजा कामेश्वर सिंह के समय में ‘दरभंगा एविएशन’ नाम की एक निजी विमानन कंपनी और एयरफील्ड का संचालन होता था, और आज इसी ऐतिहासिक क्षेत्र को आधुनिक ‘दरभंगा एयरपोर्ट’ के रूप में विकसित किया गया है। वर्ष 1947 में भारत की स्वतंत्रता के पश्चात जब जमींदारी व्यवस्था समाप्त होने लगी, तब इस राजपरिवार की पुरानी राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का भी अवसान हो गया, किंतु इसकी गौरवशाली विरासत आज भी सुरक्षित है। आज दरभंगा के भव्य महल, प्राचीन मंदिर, प्रमुख शैक्षणिक संस्थाएं और अनूठी सांस्कृतिक परंपराएं उस स्वर्णिम इतिहास की याद दिलाती है।यह कहानी केवल कुछ राजाओं की गाथा नहीं है, बल्कि यह मिथिला, बिहार की शिक्षा-संस्कृति और बदलते भारत की विकास यात्रा का एक प्रेरणादायक और जीवंत दस्तावेज है।