कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से विवेक और नैतिकता डाउनलोड नहीं किए जा सकते

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साल 1884 के अक्टूबर महीने की एक शाम पुणे में शिक्षा को नई दिशा देने की इच्छा रखने वाले कुछ युवा शिक्षाविद एकत्र हुए थे। बाहर से देखने पर यह एक सामान्य बैठक लगती थी, लेकिन उस बंद कमरे में चल रही चर्चा भारत के भविष्य को स्पर्श कर रही थी। प्रश्न अंग्रेजी भाषा या पश्चिमी ज्ञान का विरोध करने का नहीं था। प्रश्न यह था कि क्या ऐसी शिक्षा-व्यवस्था, जो भारत की आवश्यकताओं के बजाय अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर गढ़ी गई हो, वह भारत का भविष्य गढ़ सकती है? इस प्रश्न का उत्तर खोजने की दिशा में शुरू हुए प्रयासों ने आगे चलकर ‘डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी’ को जन्म दिया। इतिहास इसे एक शैक्षणिक संस्था की शुरुआत के रूप में देखता है, लेकिन वास्तव में यह हमारे राष्ट्रीय अर्थात भारतीय शिक्षा के बारे में शुरू हुए एक अविरत संवाद का प्रारंभ था।
इस संवाद के केंद्र में थे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक। हम सामान्यतः उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के प्रखर नेता के रूप में याद करते हैं, लेकिन वे उतने ही गहरे शिक्षाचिंतक भी थे। उनके लिए शिक्षा का अर्थ केवल कक्षाएं चलाना या पाठ्यक्रम तैयार करना नहीं था। वह मानते थे कि जो शिक्षा व्यक्ति को उसकी भाषा, उसके इतिहास, उसके समाज और उसकी सांस्कृतिक चेतना से नहीं जोड़ती, वह शिक्षा ज्ञान तो दे सकती है, लेकिन राष्ट्र को आत्मविश्वास नहीं दे सकती। इसीलिए उनके लिए राष्ट्रीय शिक्षा का प्रश्न राजनीतिक स्वराज जितना ही महत्वपूर्ण था।तिलक का विरोध पश्चिम के ज्ञान से नहीं था। उन्होंने आधुनिक विज्ञान, तर्क और बौद्धिक अनुसंधान के मूल्य को स्वीकार किया था। उनका मूलभूत आग्रह केवल इतना था कि ज्ञान भले ही वैश्विक हो सके, लेकिन शिक्षा की जड़ें अपनी संस्कृति में होनी चाहिए। किसी भी राष्ट्र की शिक्षा तब ही अर्थपूर्ण बनती है, जब वह विश्व को देखने की दृष्टि दे और साथ ही अपने अस्तित्व को समझने की क्षमता भी विकसित करे। यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है।डेढ़ सदी बाद विश्व फिर से एक नए युग के द्वार पर खड़ा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल तकनीक और तेजी से बदलती ज्ञान व्यवस्था शिक्षा के स्वरूप को नए सिरे से परिभाषित कर रही हैं। केवल जानकारी प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है, सही जानकारी को पहचानना, उसका विश्लेषण करना और उसे मानवीय मूल्यों से जोड़ना आज सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है। ऐसे समय में शिक्षा का मूल प्रश्न फिर से हमारे सामने खड़ा होता है: क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल कुशल मानव संसाधन तैयार करना है या विचारशील, जिम्मेदार और मूल्यनिष्ठ नागरिक गढ़ना है?यह प्रश्न लोकमान्य तिलक के शिक्षाचिंतन को आज के समय से जीवंत रूप से जोड़ता है। शायद इसीलिए आज 1 अगस्त को, उनकी पुण्यतिथि पर उनका स्मरण करना केवल उनके जीवनकार्य को याद करने के लिए नहीं है, बल्कि उनके द्वारा शुरू किए गए शिक्षा के अविरत संवाद को हमारे समय के संदर्भ में आगे बढ़ाने के लिए है। वास्तव में क्या राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) इस संवाद का स्वाभाविक विकास है, या फिर यह उसके नए अध्याय की केवल शुरुआत है?इन प्रश्नों का उत्तर शायद सीधे ‘हां’ या ‘ना’ में नहीं दिया जा सकता। यहां लोकमान्य तिलक और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के बीच ऐतिहासिक जुड़ाव खोजने का प्रयास नहीं है। दोनों अलग-अलग युगों की उपज हैं, जो अलग चुनौतियों से जन्मे हैं। लेकिन उनके बीच का वैचारिक जुड़ाव निसंदेह महसूस होता है। तिलक ने 19वीं सदी के भारत के लिए जो मूलभूत प्रश्न खड़े किए थे, शिक्षा का उद्देश्य क्या है, यह किसके लिए है और यह कैसा समाज गढ़ेगी इत्यादि। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 उन्हीं प्रश्नों को 21वीं सदी के भारत के संदर्भ में फिर से समझने और उनका उत्तर खोजने का प्रयास करती है।तिलक की विशेषता यह थी कि उन्होंने शिक्षा को कक्षा की चार दीवारों में कैद नहीं रहने दिया।read more:https://pahaltoday.com/demand-to-remove-government-country-liquor-shop-villagers-stage-protest-at-the-collectorate/#google_vignetteडेक्कन एजुकेशन सोसाइटी द्वारा उन्होंने शिक्षा को संस्थागत आधार दिया, तो सार्वजनिक गणेशोत्सव द्वारा उन्होंने सामाजिक अभिव्यक्ति का माध्यम भी बनाया। गणेशोत्सव उनके लिए केवल धार्मिक उत्सव नहीं था; वह भारतीय समाज को एकजुट करने, सार्वजनिक संवाद जगाने और राष्ट्रीय चेतना को प्रेरणा देने का अवसर था। शायद इसीलिए उनके शिक्षाचिंतन में पूरा समाज एक जीवंत पाठशाला बन जाता है।इसी दृष्टि से देखा जाए तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का महत्व केवल इसके सुधारों में नहीं, बल्कि इसकी दिशा में है। भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा, सर्वांगीण विकास, बहुविषयक शिक्षा, अनुसंधान, कौशल, तकनीक और मूल्यनिष्ठ जीवनदृष्टि पर दिया गया बल यह संकेत देता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार क्षमता बढ़ाना ही नहीं, विचारशील, सृजनात्मक और जिम्मेदार नागरिक गढ़ना भी है। इस अर्थ में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और तिलक के विचारों के बीच का संबंध शब्दों का नहीं, बल्कि दर्शन का है।
बेशक, नीतियां स्वयं परिवर्तन नहीं लातीं। वे केवल दिशा का संकेत देती हैं। सच्चा परिवर्तन तब जन्म लेता है, जब शिक्षक नीति की आत्मा को कक्षा में पोषित करके जीवन देते हैं, विद्यार्थी उसे अनुभव में बदलते हैं और समाज उसे अपने वर्तमान में उतारता है। शिक्षा का इतिहास साक्षी है कि महान दस्तावेजों से ज्यादा महान शिक्षक समाज पर अधिक लंबा प्रभाव छोड़ते हैं। यह चर्चा आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में और अधिक अर्थपूर्ण बन जाती है। जानकारी अब आसानी से उपलब्ध है, लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता में विवेक और नैतिकता जैसे सनातन मूल्यों को डाउनलोड नहीं किया जा सकता। कृत्रिम बुद्धिमत्ता असंख्य उत्तर दे सकती है, लेकिन सही प्रश्न पूछने की क्षमता, सत्य को पहचानने की दृष्टि और ज्ञान का जिम्मेदार उपयोग करने की समझ आज भी शिक्षा को ही विकसित करनी है। भविष्य की शिक्षा शायद इसीलिए जानकारी के संग्रह से ज्यादा विवेक के विकास पर आधारित होने वाली है।तिलक की विशेषता यह थी कि उन्होंने शिक्षा को कक्षा की चार दीवारों में कैद नहीं रहने दिया।
उपनिषद प्रश्नों से शुरुआत करते हैं, भगवद्गीता संवाद द्वारा समाधान तक पहुंचती है और भारत की प्राचीन विश्वविद्यालयों की परंपरा ज्ञान को मुक्त विचार-विमर्श से जोड़ती है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि शिक्षा का हेतु केवल बुद्धि को प्रखर बनाना नहीं है, मनुष्य को परिपक्व बनाना भी है। इसीलिए भारतीय ज्ञान-परंपरा का समावेश मात्र भूतकाल का गौरवगान करने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य को अधिक मानवीय बनाने का प्रयास है।आज भारत मजबूत नेतृत्व के हाथों में विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस यात्रा में तकनीक, नवीनता और वैश्विक स्पर्धा अनिवार्य है, लेकिन उतना ही जरूरी है कि विकास का केंद्र मनुष्य ही रहे। शिक्षा जो ज्ञान के साथ विवेक, कौशल के साथ चरित्र और प्रगति के साथ सामाजिक जिम्मेदारी का संवर्धन करे, तो ही विकास राष्ट्र के जीवन में स्थायी संस्कृति बन सकता है।
शायद इसीलिए लोकमान्य तिलक आज भी हमारे समकालीन लगते हैं। उन्होंने ऐसे उत्तर तैयार करने की अपेक्षा, ऐसे प्रश्न दिए हैं, जो हर युग को फिर से पूछे जाने हैं। शिक्षा का संवाद कभी पूर्ण नहीं होता। हर पीढ़ी अपने समय की चुनौतियों, अपने अनुभवों और अपनी संभावनाओं से समाज को समृद्ध बनाती है। राष्ट्र केवल नियमों के संविधान से नहीं, शिक्षा से गढ़े जाते हैं और शिक्षा तब ही जीवंत रहती है, जब समाज उसके बारे में सोचने का, चर्चा करने का और प्रश्न पूछने का कभी अंत नहीं करता। लोकमान्य तिलक की सबसे बड़ी विरासत यह अविरत विचार संवाद ही है

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