स्नेहा सिंह
सीमावर्ती इलाकों में चीन लगातार निर्माण कार्य कर रहा है। पहले भी यह दावा किया जा चुका है कि उसने छोटे-छोटे गांव बसाकर उन्हें अपने सैनिकों के ठिकानों में बदल दिया है। “जहां हमारे पूर्वज रहते थे, वह जमीन अब हमारे पास नहीं रही। हम सदियों से इस इलाके में रहते आए हैं। जहां हम बिना किसी रोक-टोक के अपने मवेशी चराने जाते थे, वहां अब जाने से पहले दो बार सोचना पड़ता है। जंगलों से हम अपनी जरूरत की चीजें लाते थे, लेकिन अब वहां नहीं जा सकते। जिन जंगलों में हमारे कबीले की महिलाएं खाना बनाने के लिए ईंधन लेने जाती थीं, वहां भी अब उनका जाना संभव नहीं है। हमारी इस जमीन पर चीनियों ने कब्जा कर लिया है।”ऐसी शिकायत अरुणाचल प्रदेश की नाह जनजाति ने भारत सरकार से की है। नाह जनजाति ने सनसनीखेज दावा किया है कि चीन ने पांच स्थानों पर कब्जा कर लिया है। ये सभी स्थान उनके गांवों और पशु चराने के क्षेत्र हैं। ये इलाके अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले के ताक्सिंग क्षेत्र में स्थित हैं और राजस्व सर्किल के अंतर्गत आते हैं।नाह वेलफेयर सोसायटी ने एक ज्ञापन देकर कहा कि यह पूरा क्षेत्र उनके पूर्वजों की भूमि है, लेकिन अब चीन के कब्जे के कारण उनका वहां आना-जाना कठिन हो गया है। इनमें से कई इलाके दुर्गम जंगल हैं। वे जंगलों की उपज से अपना जीवन-यापन करते थे, लेकिन अब चीनी सेना रोज थोड़ा-थोड़ा क्षेत्र अपने कब्जे में लेती जा रही है, इसलिए उन्हें वहां जाने नहीं दिया जाता।अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी के डिप्टी कमिश्नर को नाह वेलफेयर सोसायटी द्वारा ज्ञापन सौंपे जाने के बाद एक बार फिर चीन के सीमा अवसंरचना (बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर) की चर्चा तेज हो गई है। संगठन के अध्यक्ष केरू चादेर ने अपने ज्ञापन में कहा कि पिछले 10-15 वर्षों से चीन ने पहाड़ी क्षेत्रों में अपनी गतिविधियां बढ़ाई थीं, लेकिन 2020 के बाद उसने तेज गति से पूरे इलाके पर कब्जा करना शुरू कर दिया। ज्ञापन में यह भी दावा किया गया कि चीनी सेना ने भारतीय सीमा के भीतर सड़कें बना दी हैं।इस ज्ञापन के बाद किरण रिजिजू ने कहा कि ये रिपोर्टें भ्रामक हैं और भारतीय सीमा में ऐसी कोई घुसपैठ नहीं हुई है। उन्होंने नाह जनजाति के दावों पर सीधे टिप्पणी नहीं की, लेकिन इतना कहा कि सीमा पूरी तरह निर्धारित न होने के कारण दोनों पक्षों द्वारा सीमा का उल्लंघन होता रहता है। भारतीय सेना ने भी इन दावों का खंडन किया, लेकिन स्थानीय लोग वर्षों से ऐसे आरोप लगाते रहे हैं।read more:https://khabarentertainment.in/prof-dr-rajendra-rajput-receives-guru-shree-2026-award-at-national-level-brings-honour-to-ghazipur/इससे पहले लद्दाख में भी स्थानीय लोगों ने दावा किया था कि चीन ने भारतीय सीमा के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया है, जबकि सरकार ने इन दावों को नकार दिया था। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी समय-समय पर ऐसे आरोप लगाते रहे हैं और केंद्र सरकार उनका खंडन करती रही है। डोकलाम विवाद के बाद भी कई रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि कुछ क्षेत्रों में चीन की घुसपैठ स्थायी रूप ले चुकी है।करीब एक-दो वर्ष पहले चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने अरुणाचल प्रदेश की सीमा के पास लगभग 100 गांव बसाने के संबंध में कहा था कि यह पूरी तरह स्वाभाविक प्रक्रिया है, क्योंकि वे अपने ही क्षेत्र में निर्माण कार्य कर रहे हैं। उनका कहना था कि तिब्बत का झेंगनान क्षेत्र चीन का हिस्सा है और वहां वे अपनी इच्छा के अनुसार निर्माण कर सकते हैं। चीन लगातार यह दावा करता रहा है कि अरुणाचल प्रदेश तिब्बत के दक्षिणी हिस्से का भाग है। इतना ही नहीं, वह अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख को अपना क्षेत्र दिखाते हुए राजनीतिक नक्शे भी जारी कर चुका है।इन दावों और प्रतिदावों के बीच इतना तो स्पष्ट है कि चीन की सीमावर्ती गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। वह ऐसे कई कदम उठा रहा है जिनका सीधा प्रभाव भारत पर पड़ सकता है।जब नाह जनजाति के दावों की चर्चा चल रही थी, उसी दौरान कई रक्षा विशेषज्ञों के हवाले से एक और चिंता सामने आई। रक्षा विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी का हवाला देते हुए रिपोर्टों में कहा गया कि चीन तिब्बत में हिमालय से निकलने वाली नदियों पर नियंत्रण स्थापित करने की योजना बना रहा है। आशंका जताई गई कि यदि चीन हिमालयी नदियों को नियंत्रित कर लेता है तो वह भारत में जल संकट पैदा कर सकता है। तिब्बत को दुनिया की छत कहा जाता है। तिब्बत पर कब्जा करने के बाद चीन हिमालयी प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण मजबूत करने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है। यह भी कहा जाता रहा है कि नेपाल सीमा पर विकास परियोजनाओं के नाम पर सड़कें बनाकर चीन भारत को चारों ओर से घेरने की रणनीति अपना रहा है।इसी वर्ष की शुरुआत में चीन ने वर्ष 2030 तक की विकास योजनाओं को मंजूरी दी, जिनमें भारत की सीमा के निकट होने वाले निर्माण कार्य भी शामिल हैं। चीन सरकार ने शिनजियांग प्रांत के तियानशान क्षेत्र में 394 किलोमीटर लंबा राजमार्ग बनाने की स्वीकृति दी है। 15वीं पंचवर्षीय योजना के तहत इस परियोजना को मंजूरी देते हुए वर्ष 2032 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। नेशनल पीपुल्स कांग्रेस से भी स्वीकृति मिलने के बाद अब दुर्गम पहाड़ों को काटकर इस नए मार्ग का निर्माण तेज गति से किया जाएगा।इस राजमार्ग के बनने से भारत की सीमा के निकट चीन की संपर्क व्यवस्था और मजबूत होगी। पहले से ही चीन ने पूरे क्षेत्र में सड़कें और विमान उतरने योग्य हवाई पट्टियां (एयरस्ट्रिप) बना रखी हैं। 1962 से मौजूद मार्गों के समानांतर यह नया प्रोजेक्ट शुरू किया जाएगा। इससे न केवल सीमा तक पहुंच आसान होगी बल्कि चीन के पास एक वैकल्पिक मार्ग भी उपलब्ध हो जाएगा। चीनी मीडिया ने इसे भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में से एक बताया है।वर्ष 2026 से 2030 तक की 15वीं पंचवर्षीय योजना में तिब्बत जाने वाले तीन राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास का भी प्रावधान किया गया है। इसके तहत शिनजियांग और तिब्बत को चीन के अन्य हिस्सों से बेहतर तरीके से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया है। चीन कुल नौ सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क निर्माण करेगा। इन सभी योजनाओं को मंजूरी मिल चुकी है।चीन विकास परियोजनाओं के नाम पर लगातार सीमा क्षेत्रों में सड़कें और रेलवे लाइनें बना रहा है। वह पहाड़ों को काटकर ऐसे मार्ग तैयार कर रहा है जो सीमावर्ती क्षेत्रों को मुख्य सड़क नेटवर्क से जोड़ते हैं। वर्ष 2030 तक ऐसे रेलमार्ग और सड़कें तैयार हो जाएंगी, जिनसे चीन की सेना भारत की सीमा तक बहुत कम समय में पहुंच सकेगी। इनमें से कुछ मार्ग सीधे भारतीय सीमा तक नहीं जाते, लेकिन वे सीमा तक पहुंचना काफी आसान बना देंगे।इससे पहले भी लद्दाख के निकट चीन ने ऐसी ‘सील्ड सड़क’ बनाई थी जिस पर विमान उतर सकते हैं। उसी क्षेत्र में नदी पर एक पुल बनाए जाने का दावा भी उपग्रह चित्रों के आधार पर किया गया था। लद्दाख के डेमचोक क्षेत्र में चीनी सैनिकों ने तंबू भी लगा दिए थे। बाद में भारत द्वारा राजनयिक और सैन्य स्तर पर कड़ा विरोध दर्ज कराने के बाद चीन ने वे तंबू हटा लिए थे, लेकिन इस प्रकार की गतिविधियों से वह सीमा पर लगातार तनाव का माहौल बनाए रखता है।चीन के सीमा निर्माण और घुसपैठ के पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए यदि अरुणाचल प्रदेश की नाह जनजाति के लोग घुसपैठ का दावा कर रहे हैं तो उसे पूरी तरह असंभव नहीं कहा जा सकता। यदि वास्तव में घुसपैठ न भी हुई हो, तब भी उनकी यह शिकायत गंभीर चिंता का विषय है। इससे स्पष्ट है कि भारतीय सेना की उस सीमा क्षेत्र में जिम्मेदारी और अधिक बढ़ गई है।