भारत-जापान का विशेष गठबंधन और 21वीं सदी का नया भारत

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 अशोक भाटिया

 एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य में जब दो महान लोकतांत्रिक शक्तियां एक मजबूत साझा दृष्टिकोण के साथ हाथ मिलाती हैं, तो वैश्विक राजनीति और अर्थशास्त्र की दिशा बदलना स्वाभाविक है। भारत और जापान के बीच के ऐतिहासिक संबंध अब केवल पारंपरिक कूटनीति तक सीमित नहीं हैं; बल्कि यह साझेदारी वर्तमान में एशिया-प्रशांत और हिंद-प्रशांत  क्षेत्र में स्थिरता, समृद्धि और सुरक्षा की सबसे बड़ी धुरी बन चुकी है। भारत-जापान की यह ‘विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी’ भारत के ‘अमृतकाल’ के आर्थिक और तकनीकी लक्ष्यों को प्राप्त करने में एक रीढ़ की हड्डी की तरह काम कर रही है। हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न हुए 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन ने दोनों देशों के आर्थिक सुरक्षा दृष्टिकोण को नया आयाम दिया है, जिससे भारत को मिलने वाला सीधा और परोक्ष लाभ वैश्विक स्तर पर रेखांकित हो रहा है।इस साझेदारी का सबसे व्यावहारिक और ठोस पक्ष भारत को मिलने वाला विशाल आर्थिक और तकनीकी लाभ है, जो मुख्य रूप से पांच प्रमुख स्तंभों—पूंजी निवेश, उन्नत बुनियादी ढांचा, रक्षा-तकनीक, कृषि विकास और मानव संसाधन गतिशीलता—पर आधारित है।आर्थिक मोर्चे पर जापान भारत के लिए सबसे विश्वसनीय और बड़ा भागीदार रहा है। साल 2022 में दोनों देशों ने पांच वर्षों में भारत के सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में 5 ट्रिलियन येन (लगभग ₹3.3 लाख करोड़) के निवेश का जो महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा था, उसे भारत ने समय से दो वर्ष पहले ही हासिल कर लिया। इस असाधारण प्रगति को देखते हुए दोनों प्रधानमंत्रियों ने अगले एक दशक के लिए 10 ट्रिलियन येन (लगभग ₹6 लाख करोड़) का नया निजी निवेश लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्तमान में भारत में 1,500 से अधिक जापानी कंपनियां सक्रिय हैं, जिनके 5,000 से अधिक व्यावसायिक प्रतिष्ठान भारत के औद्योगिक गलियारों में फैले हुए हैं।यह पूंजी केवल वित्तीय तरलता नहीं ला रही, बल्कि भारत में ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बना रही है। जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन  के हालिया सर्वेक्षणों में भारत को जापानी कंपनियों के लिए मध्यम और दीर्घकालिक अवधि में दुनिया का नंबर एक निवेश गंतव्य माना गया है। इससे स्पष्ट है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के विविधीकरण और चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीति के तहत जापान भारत को एक सुरक्षित वैश्विक विनिर्माण केंद्र  के रूप में स्थापित कर रहा है।देखा जाय तो भारत के आधुनिक बुनियादी ढांचे की तस्वीर बदलने में जापानी ‘आधिकारिक विकास सहायता’  की भूमिका अद्वितीय रही है। वर्ष 1958 से शुरू हुआ यह सफर आज $52.7 अरब से अधिक के संचयी कर्ज तक पहुंच चुका है, जिसके तहत जापान भारत को सबसे न्यूनतम ब्याज दरों और आसान किस्तों पर दीर्घकालिक ऋण प्रदान करता है। दिल्ली मेट्रो जैसी क्रांतिकारी परिवहन प्रणाली से लेकर भारत की पहली हाई-स्पीड रेल परियोजना यानी मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर, सब जापान के तकनीकी और वित्तीय सहयोग की ही देन हैं।यह बुलेट ट्रेन परियोजना केवल दो शहरों के बीच की दूरी कम करने का जरिया नहीं है, बल्कि यह भारत में उच्च-तकनीकी इंजीनियरिंग, सुरक्षा मानकों और भारी मशीनरी निर्माण के एक नए युग की शुरुआत है। इसके अलावा, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और मुंबई ट्रांस-हार्बर लिंक  जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स सीधे तौर पर भारत में रसद लागत को कम कर रहे हैं, जिससे भारतीय व्यापार की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ रही है।read more:https://pahaltoday.com/retired-officers-house-in-up-notes-everywhere-currency-found-scattered-everywhere/आज की भू-अर्थशास्त्र की जंग केवल पारंपरिक उद्योगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सिलिकॉन (चिप्स) और डेटा पर लड़ी जा रही है। भारत-जापान साझेदारी ने समय की इस नब्ज को पहचाना है। दोनों देशों के बीच हुए सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन समझौते के तहत भारत में चिप निर्माण की आधारशिला रखी जा चुकी है। जापान की दिग्गज कंपनी ‘रेनेसास इलेक्ट्रॉनिक्स’ भारत की ‘सीजी पावर’ के साथ मिलकर गुजरात के साणंद में ₹7,600 करोड़ का अत्याधुनिक प्लांट स्थापित कर रही है, जहां से ऑटोमोटिव और 5G नेटवर्क के लिए प्रतिदिन 1, 5 करोड़ चिप्स का उत्पादन होगा।यही नहीं, ‘भारत-जापान एआई सहयोग पहल’ के तहत दोनों देशों ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर  और लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स  के विकास पर हाथ मिलाया है। जापान की सटीक हार्डवेयर इंजीनियरिंग और भारत की बेजोड़ सॉफ्टवेयर योग्यताओं का यह संगम वैश्विक एआई विकास को नई दिशा दे रहा है, जो भारत के डिजिटल इंडिया और इंडिया ‘AI’ मिशन को सीधे गति प्रदान करता है।भारत की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है और इस मोर्चे पर भी भारत-जापान सहयोग एक मूक क्रांति का गवाह बन रहा है। हालिया द्विपक्षीय वार्ताओं में ‘भारत-जापान बायोगैस पहल’ के तहत भारत में 1,000 बायोगैस और जैविक उर्वरक (खाद) कारखाने स्थापित करने का निर्णय लिया गया है।यह पहल भारत के ग्रामीण परिदृश्य के लिए गेम-चेंजर साबित होने वाली है। यह न केवल देश के किसानों को सस्ती, जैविक और उच्च गुणवत्ता वाली खाद उपलब्ध कराएगी, बल्कि रासायनिक उर्वरकों के आयात पर भारत की निर्भरता को भी कम करेगी। इसके अतिरिक्त, कृषि-प्रौद्योगिकी , खाद्य प्रसंस्करण  और कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर में जापानी निवेश से फसलों की बर्बादी रुकेगी और किसानों की आय दोगुनी करने के राष्ट्रीय लक्ष्य को बल मिलेगा।एक स्थिर आर्थिक विकास के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और एक स्वतंत्र, खुला व नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र होना अनिवार्य शर्त है। भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ और जापान की ‘FOIP’ नीति का रणनीतिक संरेखण चीन की आक्रामक और विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ एक मजबूत दीवार बनकर उभरा है। दोनों देश क्वाड  के सक्रिय सदस्य हैं और ‘मालाबार’, ‘जिमेक्स’, ‘धर्म गार्जियन’ व ‘वीर गार्जियन’ जैसे नियमित सैन्य अभ्यासों के जरिए दोनों देशों की सेनाओं के बीच अंतर-संचालनीयता  चरम पर है।विशेष रूप से, भारतीय नौसेना के युद्धपोतों पर जापानी  नेवल रडार मैस्ट परियोजना का एकीकरण रक्षा उपकरणों के सह-विकास  में मील का पत्थर है। यह जापान द्वारा अपनी रक्षा निर्यात पाबंदियों में ढील देने के बाद भारत के साथ किया गया पहला ऐतिहासिक रक्षा समझौता है, जिससे भारत की नौसैनिक मारक क्षमता और स्टील्थ (अदृश्य रहने की) तकनीक को अत्यधिक मजबूती मिली है।इसके अलावा, ‘भारत-जापान एक्ट ईस्ट फोरम’ के माध्यम से भारत के संवेदनशील पूर्वोत्तर राज्यों में बुनियादी ढांचे, सड़क, पर्यटन और बिजली परियोजनाओं का विकास किया जा रहा है। जापान भारत का इकलौता ऐसा विदेशी भागीदार देश है जिसे पूर्वोत्तर में सीधे निवेश करने की संस्थागत अनुमति प्राप्त है। यह सहयोग न केवल इस क्षेत्र को दक्षिण-पूर्वी एशिया  के साथ जोड़ने वाला पुल बनाता है, बल्कि रणनीतिक रूप से चीन की सीमाओं के करीब भारत की स्थिति को अभेद्य करता है।गौरतलब है कि जापान इस समय इतिहास के सबसे बड़े जनसांख्यिकीय संकट से गुजर रहा है, जहां उसकी आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है और कार्यबल  की भारी कमी है। इसके विपरीत, भारत के पास दुनिया की सबसे युवा और तकनीकी रूप से कुशल आबादी है। इस पूरकता को भुनाने के लिए दोनों देशों ने ‘मानव संसाधन विनिमय कार्ययोजना’ को लागू किया है।इसके तहत अगले पांच वर्षों में 5 लाख लोगों के द्विपक्षीय आदान-प्रदान का लक्ष्य है, जिसमें विशेष रूप से भारत के 50,000 कुशल और अर्ध-कुशल पेशेवरों (जैसे- नर्स, केयरगिवर्स, आईटी इंजीनियर, डेटा साइंटिस्ट) को जापानी श्रम बाजार में सीधे रोजगार प्रदान किया जाएगा। ‘निर्दिष्ट कुशल श्रमिक’  और तकनीकी इंटरन ट्रेनिंग प्रोग्राम  के माध्यम से भारतीय युवाओं को जापानी मानकों पर प्रशिक्षित किया जा रहा है। हाल ही में मेघालय सरकार ने जापानी संस्थानों के साथ 5,000 युवाओं को कुशल बनाकर जापान में रोजगार दिलाने का समझौता किया है। यह भारत की बेरोजगारी समस्या का समाधान तो करता ही है, साथ ही विदेशी मुद्रा प्रेषण  के जरिए देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत भी करता है।देखा जाय तो भविष्य की इस सुनहरी तस्वीर के बीच कुछ वास्तविक नीतिगत चुनौतियां भी मौजूद हैं, जिन पर संपादकीय दृष्टि से ध्यान देना आवश्यक है। सबसे बड़ी चिंता द्विपक्षीय व्यापार का असंतुलन है। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार $27.47 अरब तक पहुंच गया, लेकिन इसमें भारत का व्यापार घाटा $15.39 अरब का है। भारत का जापान को निर्यात केवल $6.04 अरब है, जबकि आयात $21.43 अरब तक विस्तृत है।हालांकि भारत-जापान के बीच व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता 2011 से लागू है और यह 94% वस्तुओं पर सीमा शुल्क समाप्त करता है, फिर भी जापान के कड़े गैर-टैरिफ अवरोध), तकनीकी नियम और कड़े स्वच्छता मानक भारतीय कृषि और दवा उत्पादों को जापानी बाजारों में आसानी से प्रवेश नहीं देते। उदाहरण के तौर पर, हाल ही में तकनीकी और फ्युमिगेशन प्रक्रियाओं में मामूली खामियों का हवाला देकर जापान द्वारा भारतीय आमों के आयात पर अस्थायी रोक लगाना इसी व्यापारिक विषमता को दर्शाता है।इसके अलावा, भू-राजनीतिक मोर्चे पर दोनों देशों की प्राथमिकताओं में मामूली भिन्नता भी है। जापान का प्राथमिक ध्यान प्रशांत महासागर में चीन की आक्रामकता (जैसे सेनकाकू द्वीप विवाद) और यूक्रेन संकट पर रूस के विरोध पर केंद्रित है। वहीं भारत अपने व्यापक राष्ट्रीय हितों को देखते हुए ग्लोबल साउथ का नेतृत्व कर रहा है, ब्रिक्स  और एससीओ  का हिस्सा है और रूस के साथ अपने ऐतिहासिक ऊर्जा व रक्षा संबंधों को बनाए हुए है।इन आंशिक मतभेदों के बावजूद, भारत और जापान के संबंधों की नींव इतनी गहरी है कि व्यापार घाटे या रणनीतिक प्राथमिकताओं के छोटे अंतरालों से इस पर कोई आंच नहीं आती। यह संबंध दो संप्रभु देशों के बीच के व्यापार से कहीं ऊपर उठकर साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, सभ्यतागत बौद्ध कली और भविष्यवादी दृष्टि का मेल है।जापान से मिलने वाला खरबों रुपयों का निवेश, बुलेट ट्रेन और सेमीकंडक्टर जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का हस्तांतरण, रक्षा प्रणालियों का सह-उत्पादन और भारतीय कार्यबल के लिए जापानी बाजारों का खुलना यह साबित करता है कि इस साझेदारी से भारत को मिलने वाला लाभ अमूल्य और अपरिवर्तनीय है। यह साझेदारी केवल भारत की जीडीपी विकास दर को गति नहीं दे रही, बल्कि भारत को 21वीं सदी की एक आत्मनिर्भर, तकनीकी रूप से उन्नत और वैश्विक स्तर पर अदम्य महाशक्ति बनाने के संकल्प को सिद्ध कर रही है। भारत-जापान का यह ‘विशेष’ गठबंधन वास्तव में ‘अमृतकाल’ के भारत के लिए एक वरदान साबित हो रहा है।

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