मानव सभ्यता ने हजारों वर्षों की यात्रा में ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति और लोकतंत्र के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान, चिकित्सा और संचार के क्षेत्र में मानव ने ऐसी उपलब्धियाँ अर्जित की हैं जिनकी कल्पना भी कभी असंभव मानी जाती थी। किंतु विडंबना यह है कि जितनी तेजी से विज्ञान आगे बढ़ा है, उतनी ही तीव्रता से सत्ता, वर्चस्व और स्वार्थ की राजनीति भी विकसित हुई है। आज विश्व के अनेक क्षेत्रों में युद्ध की विभीषिका यह संकेत दे रही है कि मनुष्य ने तकनीक तो आधुनिक बना ली, परंतु अपनी चेतना को अभी भी संकीर्ण स्वार्थों से मुक्त नहीं कर पाया। आज अमेरिका, रूस, चीन, इज़राइल, ईरान, उत्तर कोरिया तथा अनेक क्षेत्रीय शक्तियाँ प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से शक्ति-प्रदर्शन की प्रतिस्पर्धा में लगी हुई हैं। कहीं आर्थिक प्रतिबंध हथियार बन रहे हैं, कहीं व्यापारिक युद्ध, कहीं साइबर आक्रमण, तो कहीं मिसाइलों और ड्रोन की वर्षा। ऐसा प्रतीत होता है कि वैश्विक राजनीति का मूल उद्देश्य मानव कल्याण नहीं, बल्कि प्रभुत्व स्थापित करना बन गया है। रूस–यूक्रेन युद्ध ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया कि किसी क्षेत्रीय संघर्ष का प्रभाव सीमित नहीं रहता। लाखों लोग विस्थापित हुए, हजारों सैनिक और नागरिक मारे गए, खाद्यान्न संकट उत्पन्न हुआ, ऊर्जा की कीमतें बढ़ीं और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ा। इसी प्रकार मध्य-पूर्व में इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल दो देशों का विवाद नहीं, बल्कि पूरे विश्व की सामरिक स्थिरता को प्रभावित करने वाला प्रश्न बन चुका है। विश्व की महाशक्तियाँ अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देती हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का कहना है कि “रूस अपनी सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों से कभी समझौता नहीं करेगा।” यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की बार-बार कहते रहे हैं कि स्वतंत्रता किसी भी राष्ट्र का सबसे बड़ा अधिकार है और उसकी रक्षा हर कीमत पर की जाएगी। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में युद्ध समाप्त करने की इच्छा व्यक्त की है, किंतु साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों और सहयोगियों की सुरक्षा से पीछे नहीं हटेगा। इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि इज़राइल अपने अस्तित्व और सुरक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगा। वहीं ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई का स्पष्ट संदेश रहा है कि ईरान किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। हर राष्ट्र स्वयं को सही मानता है और अपने हितों की रक्षा को सर्वोपरि रखता है। किंतु जब संवाद की जगह शक्ति और प्रतिशोध ले लेते हैं, तब विश्व शांति सबसे बड़ी कीमत चुकाती है।read more:https://pahaltoday.com/after-hearing-the-arguments-of-advocate-girish-srivastava-and-examining-the-file-sufficient-grounds-for-bail-were-found/आज युद्ध का स्वरूप भी बदल चुका है। पहले युद्ध सीमाओं पर सैनिक लड़ते थे, अब अर्थव्यवस्थाएँ, तकनीक, साइबर नेटवर्क, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उपग्रह और सूचना तंत्र भी युद्ध के हथियार बन चुके हैं। व्यापारिक प्रतिबंध, सेमीकंडक्टर तकनीक पर नियंत्रण, दुर्लभ खनिजों की प्रतिस्पर्धा और ऊर्जा संसाधनों पर कब्ज़े की होड़ इस बात का प्रमाण हैं कि आधुनिक युद्ध केवल बंदूकों से नहीं लड़े जाते।परमाणु हथियारों की बढ़ती संख्या विश्व के लिए सबसे बड़ा संकट है। आज विश्व में हजारों परमाणु हथियार मौजूद हैं। यदि किसी भी कारण से परमाणु संघर्ष प्रारंभ हुआ, तो उसका प्रभाव केवल युद्धरत देशों तक सीमित नहीं रहेगा। जलवायु परिवर्तन, परमाणु विकिरण, खाद्य संकट और वैश्विक आर्थिक पतन पूरी मानवता को प्रभावित करेंगे।महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी ने कहा था, आँख के बदले आँख पूरी दुनिया को अंधा बना देगी। प्रतिशोध कभी स्थायी शांति नहीं ला सकता।महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने चेतावनी दी थी मुझे नहीं पता तीसरा विश्वयुद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा, लेकिन चौथा विश्वयुद्ध पत्थरों और लाठियों से लड़ा जाएगा। यह कथन केवल कल्पना नहीं, बल्कि परमाणु युद्ध के संभावित परिणामों का वैज्ञानिक आकलन है।पूर्व संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की-मून ने कहा था, शांति केवल युद्ध की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि न्याय, समानता और सहयोग की उपस्थिति है। यह विचार आज पहले से अधिक प्रासंगिक है।भारतीय चिंतन सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना का समर्थक रहा है। भारत ने न तो विस्तारवादी नीति अपनाई और न ही किसी दूसरे देश की भूमि पर अधिकार करने की नीति को स्वीकार किया। भारत की विदेश नीति संवाद, संतुलन, बहुपक्षवाद और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर आधारित रही है। यही कारण है कि आज विश्व भारत को एक विश्वसनीय और संतुलित शक्ति के रूप में देखता है।युद्ध का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ता है। युद्ध किसी सैनिक की विजय का नहीं, बल्कि एक माँ के बेटे की मृत्यु का नाम है। यह किसी बच्चे से उसका बचपन छीन लेता है, किसी स्त्री से उसका परिवार, किसी किसान से उसकी जमीन और किसी विद्यार्थी से उसका भविष्य। युद्ध में विजेता भी अंततः बहुत कुछ हार जाता है।आज जरूरत इस बात की है कि विश्व के राष्ट्राध्यक्ष अपने राजनीतिक मतभेदों को संवाद की मेज पर सुलझाएँ। संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी बनाया जाए, हथियारों की अंधाधुंध होड़ पर नियंत्रण लगाया जाए और वैश्विक संसाधनों को युद्ध की तैयारी के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण तथा गरीबी उन्मूलन पर व्यय किया जाए।स्वार्थ और लालच का यह महायुद्ध वस्तुतः मनुष्य के भीतर चल रहे अहंकार का युद्ध है। जब तक सत्ता का उद्देश्य मानव सेवा के बजाय प्रभुत्व रहेगा, तब तक विश्व शांति केवल एक आदर्श बनकर रह जाएगी। वास्तविक विजय किसी राष्ट्र की दूसरे राष्ट्र पर नहीं, बल्कि मनुष्य की अपने अहंकार पर होनी चाहिए।विश्व को यह समझना होगा कि युद्ध किसी समस्या का अंतिम समाधान नहीं, बल्कि अनेक नई समस्याओं की शुरुआत है। यदि आज भी मानवता ने इतिहास से सीख नहीं ली, तो भविष्य की पीढ़ियाँ हमें विकास का नहीं, विनाश का युग कहकर याद करेंगी। इसलिए समय की पुकार है कि हथियारों की नहीं, विचारों की प्रतिस्पर्धा हो, युद्ध की नहीं, संवाद की संस्कृति विकसित हो और सत्ता की नहीं, मानवता की विजय हो।