डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
शहर के सबसे पुराने मुहल्ले में एक मकान था जिसकी दीवारें इतनी बूढ़ी हो चुकी थीं कि हर बारिश के बाद वे अपने भीतर का नमक बाहर निकालकर रोती थीं। लोग उसे भूतों का घर कहते थे, लेकिन वहाँ रहने वाला बूढ़ा आदमी हँसकर कहता, “भूत तो उन घरों में रहते हैं जहाँ इंसान होना मर जाता है।” उसका नाम कोई नहीं जानता था। बच्चे उसे बाबा कहते थे, दूधवाला उसे उधार कहता था, बिजली वाला उसे बकायेदार और नगर निगम वाला उसे अतिक्रमण। उसका अपना नाम जैसे सरकारी फाइलों के किसी पीले पन्ने में दम तोड़ चुका था। हर सुबह वह टूटी कुर्सी बाहर निकालकर बैठ जाता और राह चलते लोगों से पूछता, “बेटा, आज इंसानियत किस गली से गुज़री थी, कहीं दिखी क्या?” लोग मुस्कराकर आगे बढ़ जाते। एक दिन एक लड़का रुक गया। उसने पूछा, “बाबा, आप रोज़ यही सवाल क्यों पूछते हैं?” बाबा ने अपनी धुँधली आँखों में उतरती शाम को समेटते हुए कहा, “क्योंकि कल तक जो मेरे पड़ोसी थे, आज वे मेरे मोबाइल नंबर तक से अनजान हो गए हैं। रिश्ते अब घंटियों की तरह हैं, बजते तभी हैं जब किसी को अपना काम हो।” लड़का चुप हो गया। हवा ने सूखे नीम से कुछ पत्ते गिराए। बाबा उन्हें उठाकर हथेली पर रखने लगा जैसे किसी बूढ़ी माँ के झड़ते बाल समेट रहा हो। उसने धीमे से कहा, “पेड़ कम से कम गिरकर भी धरती का हाथ नहीं छोड़ते, इंसान तो खड़े खड़े भी साथ छोड़ देता है।” सामने से गुजरते नेता का काफिला धूल उड़ाता निकल गया। बाबा मुस्कराया, “देखो बेटा, धूल भी अब गाड़ियों के साथ चलती है, पैरों के साथ नहीं।”अगले दिन मोहल्ले में खबर फैली कि सरकार ने उस इलाके के विकास का नक्शा बना लिया है। लोग खुश थे। किसी को चौड़ी सड़क चाहिए थी, किसी को पार्क, किसी को शॉपिंग कॉम्प्लेक्स। बाबा चुपचाप अपनी दीवार सहला रहा था। तभी अधिकारी आए। एक ने नक्शा खोलकर कहा, “बाबा, आपका मकान प्रगति के रास्ते में आ रहा है।” बाबा ने मुस्कराकर पूछा, “प्रगति किसकी होगी साहब, सड़क की या आदमी की?” अधिकारी हँस पड़ा। “भावुक मत बनिए। मुआवजा मिलेगा।” बाबा ने दीवार पर टँगी अपनी पत्नी की धुँधली तस्वीर की ओर देखा और बोला, “साहब, क्या आपकी फाइल में यादों की भी कोई कीमत लिखी है?” दूसरा अधिकारी झुँझलाकर बोला, “हम भावनाएँ नहीं नापते।” बाबा ने उत्तर दिया, “यही तो इस देश की सबसे बड़ी तरक्की है। अब सब कुछ नापा जाता है, बस आदमी नहीं।” भीड़ तमाशा देख रही थी। किसी ने कहा, “बाबा जिद्दी है।” किसी ने कहा, “बूढ़े लोग बदलाव नहीं चाहते।” बाबा धीरे से बोला, “बदलाव मुझे भी चाहिए बेटा। बस इतना कि आदमी फिर आदमी कहलाने लगे।” उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि उसे सुनने के लिए कान नहीं, दिल चाहिए था। मगर वहाँ दिलों की जगह मोबाइल कैमरे खुले हुए थे। हर चेहरा घटना रिकॉर्ड कर रहा था, कोई पीड़ा नहीं।रात को वही लड़का फिर आया। उसने पूछा, “बाबा, अगर घर टूट गया तो आप कहाँ जाएँगे?” बाबा ने आकाश की ओर देखा। “जहाँ से आया था, वहीं। आदमी आखिर रहता कहाँ है? ईंटों में या स्मृतियों में?” लड़के ने कहा, “मैं आपको अपने घर ले जाऊँगा।” बाबा मुस्कराया। “बेटा, जिस घर में बूढ़े को जगह देने के लिए पहले सोफा हटाना पड़े, वहाँ बूढ़ा नहीं जाता।” लड़का रो पड़ा। “तो मैं क्या करूँ?” बाबा ने उसका सिर सहलाया। “बस इतना करना कि जब तेरे पिता बूढ़े हों तो उन्हें कैलेंडर की पुरानी तारीख मत समझना।” तभी सामने वाले मकान से तेज संगीत बजने लगा। जन्मदिन की पार्टी थी। इधर बाबा चुपचाप अपनी पत्नी की तस्वीर से बातें कर रहा था। “सुनो, लगता है अब हमारे घर की उम्र पूरी हो गई। तुम तो पहले ही चली गई थीं। मैं भी आता हूँ।” तस्वीर चुप रही, मगर उसकी आँखों में जमी धूल चाँदनी में ऐसे चमक रही थी जैसे किसी ने आँसू पोंछना भूल गया हो। बाहर आतिशबाज़ी हो रही थी। भीतर एक आदमी अपनी आखिरी उम्मीदों की राख समेट रहा था।read more:https://pahaltoday.com/13479-rupees-refunded-to-the-account-of-the-victim-of-cyber-fraud/सुबह बुलडोज़र आ गया। भीड़ पहले से भी बड़ी थी। अधिकारी ने औपचारिक स्वर में कहा, “बाबा, आखिरी बार पूछ रहा हूँ।” बाबा ने मुस्कराकर उत्तर दिया, “मैं भी आखिरी बार कह रहा हूँ, मकान गिरा देना, मगर यह मत समझना कि दीवारें ही गिरती हैं। हर ईंट के साथ किसी का बचपन, किसी की माँ की आवाज़, किसी की पहली हँसी और किसी की आखिरी प्रतीक्षा भी टूटती है।” बुलडोज़र गरजा। पहला वार हुआ। दीवार काँपी। उसी क्षण बाबा ने अपनी हथेली दीवार पर रख दी। लड़का चीखा, “हट जाइए।” बाबा बोला, “जिसने जीवन भर घर को सहारा दिया, वह आखिरी क्षण में घर का साथ कैसे छोड़ दे?” भीड़ में सन्नाटा उतर आया। मशीन रुक गई। चालक नीचे उतर आया। उसकी आँखें भर आई थीं। उसने अधिकारी से कहा, “साहब, मशीन दीवार तोड़ सकती है, मेरा दिल नहीं।” अधिकारी ने गुस्से से दूसरा चालक बुला लिया। इस बार मशीन चली और घर मलबे में बदल गया। धूल बैठी तो बाबा कहीं दिखाई नहीं दिया। लोग समझे कि वह भाग गया। पर जब मलबा हटाया गया तो वह दीवार से लिपटा मिला, जैसे कोई बच्चा अपनी माँ की गोद में सो गया हो।कुछ दिनों बाद उसी जगह एक भव्य इमारत बन गई। उद्घाटन हुआ। भाषण हुए। तालियाँ बजीं। प्रवेश द्वार पर चमकती पट्टिका लगी थी जिस पर लिखा था कि यह भवन मानव कल्याण को समर्पित है। उसी शाम वही लड़का वहाँ आया। उसने देखा कि सीढ़ियों के कोने में एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पड़ी है। शायद किसी ने कबाड़ समझकर रख दी थी। वह कुर्सी बाबा की थी। लड़के ने उसे उठाया तो नीचे से एक मुड़ा हुआ कागज निकला। उस पर काँपते हाथों से लिखा था, “घर ईंटों से नहीं बनता, किसी के लौट आने की उम्मीद से बनता है। जिस दिन लोग लौटना छोड़ देंगे, उस दिन महलों में भी उजाड़ बस जाएगा।” लड़का फूट फूटकर रो पड़ा। उसी समय उद्घाटन समारोह से लौटते लोग हँसते हुए उसके पास से गुज़रे। किसी ने नहीं पूछा कि वह क्यों रो रहा है। सबके पास समय था, संवेदना नहीं। तभी उसे लगा कि शायद बाबा सच कहते थे। इस शहर में अब लोग मकानों के मालिक हैं, मगर साँसों के किरायेदार।