पसमांदा महाज़ के नेता वसीम राईन ने पेश की कौमी एकता की मिसाल

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बाराबंकी। सामाजिक सौहार्द, आपसी भाईचारे और गंगा-जमुनी तहज़ीब को मजबूत करने की दिशा में देवा-महादेवा की पावन धरती पर, ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसीम राईन ने एक बार फिर ऐसा संदेश दिया, जिसकी पूरे क्षेत्र में सराहना की जा रही है। उन्होंने मुहर्रम के अवसर पर नवीन सब्ज़ी एवं फल मंडी में आयोजित हुसैनी लंगर में शामिल होकर श्रद्धापूर्वक अपनी सहभागिता निभाई। इसके बाद धनोखर चौराहे पर प्रत्यूष शुक्ला द्वारा आयोजित विशाल भंडारे में पहुंचकर श्रद्धालुओं एवं आम लोगों को अपने हाथों से प्रसाद वितरित किया। इस अवसर पर वसीम राईन ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी पहचान उसकी विविधता में एकता है। यहां सभी धर्मों, जातियों और समुदायों के लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते हैं। यही परंपरा देश की सामाजिक और सांस्कृतिक शक्ति का आधार है। उन्होंने कहा कि हज़रत इमाम हुसैन का जीवन त्याग, बलिदान, इंसाफ और मानवता की रक्षा का प्रतीक है। वहीं सनातन परंपरा में आयोजित भंडारे सेवा, समर्पण और परोपकार की भावना का संदेश देते हैं।read more:https://pahaltoday.com/complex-disease-care/दोनों परंपराओं का मूल उद्देश्य मानवता की सेवा और समाज में प्रेम का विस्तार करना है। उन्होंने कहा कि समाज में कुछ असामाजिक तत्व समय-समय पर नफरत फैलाने का प्रयास करते हैं, लेकिन देश की जनता हमेशा प्रेम, भाईचारे और आपसी सम्मान के मार्ग को ही अपनाती है। हमें धर्म के नाम पर विभाजन नहीं, बल्कि इंसानियत के आधार पर एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने युवाओं से भी आह्वान किया कि वे सामाजिक समरसता को मजबूत करने के लिए आगे आएं और समाज में सकारात्मक सोच का वातावरण तैयार करें। हुसैनी लंगर में उपस्थित लोगों ने वसीम राईन का गर्मजोशी से स्वागत किया और उनके सामाजिक संदेश की सराहना की। वहीं धनीखर चौराहे पर आयोजित विशाल भंडारे में भी उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित करते हुए भाईचारे और सद्भाव का संदेश दिया। कार्यक्रम में विभिन्न समुदायों के लोगों ने मिलकर सहभागिता की, जिससे सांप्रदायिक सौहार्द की एक सुंदर तस्वीर देखने को मिली। स्थानीय लोगों का कहना था कि ऐसे आयोजन समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं और विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास एवं सहयोग की भावना को मजबूत बनाते हैं। वसीम राईन की दोनों आयोजनों में उपस्थिति इस बात का प्रतीक रही कि सामाजिक समरसता केवल भाषणों से नहीं, बल्कि व्यवहार और सहभागिता से स्थापित होती है।

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