लो फिर से नीट का पेपर लीक हो गया

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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 
माँ की कलाई पर अब वह स्वर्ण-वृत्त नहीं था जो कभी समय और संस्कार की गवाही देता था। वहाँ सिर्फ सफेद निशान थे जो अभाव की नई लिपि लिख रहे थे। पिता के जाने के बाद घर की छत तो नहीं गिरी पर दीवारें संकरी हो गईं। माँ की आँखों के नीचे जो काले घेरे थे वे महज नींद की कमी नहीं थे बल्कि उन आंसुओं के सूखे हुए तालाब थे जिन्हें उन्होंने बेटे के भविष्य की खातिर पी लिया था। घर का सारा सोना अब कोचिंग संस्थान की तिजोरी में पीला पड़ चुका था। बेटा घर से नहीं निकला था बल्कि एक उम्मीद निकली थी जिसे सिस्टम के कसाईखाने में हलाल होने के लिए भेजा गया था। माँ कहती थी कि तू बस पढ़ना बेटा। बेटा पढ़ता रहा और माँ के हाथ खाली होते रहे यहाँ तक कि चूड़ियाँ भी उस रेस के घोड़े पर दाँव लगा दी गईं। सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोगों के लिए नैतिकता महज एक चुनावी जुमला है। जब ईमान ही किस्तों पर बिकता हो तो प्रश्नपत्र की कीमत क्या होगी। त्याग और तपस्या का फल अक्सर व्यवस्था के गटर में बह जाता है। आँखों का पानी मर जाए तो शासन की चमक बढ़ जाती है। शिक्षा अब मोक्ष का मार्ग नहीं बल्कि नीलामी का चबूतरा है। कोचिंग की दीवारें जेल की उन सलाखों जैसी थीं जहाँ कैदी खुद अपनी मर्जी से अंदर जाता है और अपनी आत्मा को बाहर गिरवी रख देता है। लड़का उस मशीन का हिस्सा बन गया जहाँ सपनों को कुचलकर रैंक बनाई जाती थी। उसके कमरे में बिखरी हुई किताबों के पन्ने उसे अपनी ही चमड़ी जैसे लगते थे। जब नीट का पेपर हुआ तो उसे लगा कि वह अपनी माँ की सूनी कलाइयों का हिसाब चुकता कर देगा। परीक्षा केंद्र पर उसकी ऐसी तलाशी ली गई जैसे वह बम लेकर जा रहा हो। जूतों से लेकर बेल्ट तक उतरवा लिए गए। उसे लगा कि इतनी शुचिता है तो अंदर सच ही होगा। उसे क्या पता था कि शुचिता सिर्फ बाहर खड़े दरबानों के लिए है और अंदर का दरवाजा तो पहले ही नोटों की गड्डियों से खोला जा चुका है। सत्य को नग्न करने के लिए जाँच कमिटी का पर्दा ही काफी है। जाँच कमिटी वह लोरी है जो व्यवस्था जनता को सुलाने के लिए सुनाती है। तंत्र की ईमानदारी सिर्फ निर्धन की जेब तक सीमित है। ऊँचे पदों पर बैठे लोगों के लिए न्याय एक सौदेबाजी का नाम है। जहाँ प्रश्नपत्र बिकते हों वहाँ मेधा दम तोड़ देती है। फिर वह खबर आई जिसने हवाओं का रुख मोड़ दिया। पेपर लीक हो गया। मंत्री जी टीवी पर आए और बड़ी गंभीरता से बोले कि हम एक उच्चस्तरीय जाँच कमिटी बिठा रहे हैं। उनकी नाटकीयता देखकर लगा कि शायद वे अपनी ही लाश पर विलाप कर रहे हैं। कमिटी का गठन ऐसे हुआ जैसे किसी फटे हुए कपड़े पर रेशम का पैबंद लगाया जा रहा हो। लड़का हतप्रभ था। उसे वह दृश्य याद आ रहा था जब उसकी तलाशी ली जा रही थी। उसे लगा कि यदि सिस्टम इतना ही पारदर्शी है तो उसकी आत्मा तक क्यों नहीं झाँक पाया जहाँ गरीबी की सड़न थी। उसका मानसिक संतुलन उस पतंग की तरह कट गया जिसकी डोर भ्रष्टाचार के खंभे में उलझ गई थी।read more:https://pahaltoday.com/heavy-vehicles-taken-action-against-in-drink-and-drive-campaign-dozens-challaned/व्यवस्था का सबसे बड़ा नाटक उसकी निष्पक्षता का ढोंग है। कमेटियाँ समस्याओं को सुलझाने के लिए नहीं बल्कि उन्हें दफनाने के लिए बनती हैं। भ्रष्टाचार जब शिष्टाचार बन जाए तो समझो देश तरक्की कर रहा है। राजनीति में आँसू भी स्क्रिप्ट के हिसाब से बहते हैं। न्याय की देवी अंधी नहीं बस रईसों के इशारे पर नाचती है। लड़के ने माँ की ओर देखा और उसे अपनी आँखों के नीचे का काला तालाब और गहरा होता महसूस हुआ। उसे लगा कि वह खुद एक ओएमआर शीट है जिसे व्यवस्था ने गलत भर दिया है। वह सड़कों पर पागलों की तरह घूमने लगा और हर खंभे से पूछता कि क्या तुम्हारे पास भी कोई लीक हुआ सच है। कोचिंग का प्रेशर और घर की तबाही उसके दिमाग में एक ऐसा शोर पैदा कर रही थी जिसे सिर्फ मौत ही शांत कर सकती थी। वह बड़बड़ाता कि जूता उतरवा लिया पर जमीर नहीं देख पाए। वह मनोविश्लेषण की उस चरम सीमा पर था जहाँ यथार्थ और भ्रम की सीमाएँ मिट जाती हैं। पागलपन अक्सर सच बोलने की सजा का दूसरा नाम है। जब उम्मीदें कत्ल होती हैं तो सबसे पहले दिमाग मरता है। शिक्षा का बाजारीकरण मेधा का कत्लगाह है। मध्यम वर्ग की नियति सिर्फ टैक्स भरना और धोखा खाना है। जो सच देख लेते हैं उन्हें अक्सर पागल करार दिया जाता है। एक सुबह जब टीवी पर विज्ञापन की तरह चमकती हुई जाँच कमिटी की रिपोर्ट आई, जिसमें हर काले सच को सफेदी से पोत दिया गया था, तो लड़का पागलों की तरह नाचने लगा। उसकी हँसी उस उजड़े हुए घर की दीवारों से टकराकर वापस आ रही थी जहाँ अब पिता की तस्वीर के सिवाय कुछ भी सलामत नहीं था। वह भागता हुआ उस परीक्षा केंद्र की दहलीज़ पर जा खड़ा हुआ जहाँ उसकी रगों का खून स्याही की तरह सुखा दिया गया था। उसे गेट पर रोकने वाले गार्ड के चेहरे में उसे वह मंत्री दिखाई दिया जो कल रात नैतिकता की बात कर रहा था। लड़के ने चिल्लाकर कहा “सुनो! मेरा जिस्म तो यहीं है पर मेरी रूह उस पेपर के साथ लीक हो चुकी है जिसे तुमने सुरक्षित बताया था।” उसने अपनी मुट्ठी में भींची हुई उस ओएमआर शीट को फाड़ा नहीं, बल्कि उसे मुँह में भरकर ऐसे चबाने लगा जैसे वह कोई ज़हरीला फल हो। वह वहीं गिर पड़ा, मानो व्यवस्था के सामने एक आखिरी और खामोश विरोध दर्ज कर रहा हो। मेधा का अंतिम संस्कार हमेशा सरकारी फाइलों के नीचे ही होता है। सच बोलना अब एक गंभीर मानसिक बीमारी का लक्षण है। जहाँ सवाल बिकने लगें वहाँ जवाब की उम्मीद बेईमानी है। तंत्र का सबसे बड़ा हथियार उसकी बेशर्म खामोशी है। मरे हुए सपनों की गंध केवल माँओं को ही आती है। अस्पताल में जब उसका पोस्टमार्टम हुआ, तो डॉक्टरों के हाथ काँप गए। उसके पेट से ज़हर नहीं, बल्कि अक्षरों का वह सैलाब निकला जो व्यवस्था की रद्दी बन चुका था। उसके शव को मुखाग्नि देने के लिए लकड़ियाँ उसी कोचिंग की पुरानी मेजों से चुनकर लाई गईं जिन पर उसने अपने जीवन के सुनहरे दो साल घिसे थे। वह उसी लकड़ी पर जल रहा था जो कभी उसकी सफलता की सीढ़ी बनने का वादा करती थी। माँ दूर बैठी अपनी उन सूनी कलाइयों को निहार रही थी जहाँ अब केवल गरीबी की नीली नसें उभरी हुई थीं। उसे लगा कि उसके बेटे की चिता से धुआँ नहीं, बल्कि उसकी चूड़ियों की वह खनक उड़ रही है जिसे उसने किस्तों में बेचा था। शिक्षा अब मोक्ष नहीं, बल्कि श्मशान तक जाने का सीधा रास्ता है। चिता पर जलता हुआ छात्र व्यवस्था के लिए केवल एक संख्या है। जहाँ चिता की राख से तिलक किया जाए, वही असली राजनीति है। न्याय की देवी अब रईसों के बेडरूम में पहरा देती है। गरीबी वह अपराध है जिसकी सजा मौत के बाद भी खत्म नहीं होती। अगले दिन शहर के अखबार में उस लड़के की मौत की खबर किसी विज्ञापन के नीचे छोटे से कोने में दबी थी, जबकि मुख्य पृष्ठ पर उसी कोचिंग संस्थान का बड़ा सा पोस्टर था जिसमें नए बैच के लिए प्रवेश शुरू होने की खुशखबरी थी। मंत्री जी ने अपने बंगले पर एक पार्टी रखी थी जहाँ शुचिता और पारदर्शिता के जाम टकराए जा रहे थे। माँ ने अपने घर के उस अंधेरे कोने में झाडू लगाई जहाँ लड़के की किताबें अब भी उसकी वापसी का इंतज़ार कर रही थीं। सबसे भयावह दृश्य तो यह था कि उस लड़के की राख को विसर्जित करने के लिए भी गंगा के किनारे पैसे कम पड़ गए। भविष्य का कत्ल करना इस दौर का सबसे मुनाफे वाला व्यापार है। सहानुभूति वह मरहम है जो केवल वोट के घाव पर लगाया जाता है। व्यवस्था के लिए हर लाश एक नया अवसर लेकर आती है। जहाँ नैतिकता की बोली लगे, वहाँ न्याय की भीख मत माँगो। अंतिम सच यही है कि हम सब एक ऐसे सर्कस के दर्शक हैं जहाँ जोकर ही राजा है।

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