बिहार के मिथिला से निकलकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का सफर तय करने वाले सुप्रसिद्ध रंगकर्मी उत्पल झा आज भारतीय रंगमंच का एक ऐसा चेहरा हैं, जिनके काम में सोंधी मिट्टी की महक और आधुनिक दृष्टि, दोनों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। भारतीय रंगमंच की दुनिया में उत्पल झा एक ऐसा नाम है, जिसने गांव की सांस्कृतिक धरती से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। मैथिली, हिंदी, असमिया, नेपाली और खासी जैसी भाषाओं में नाटकों का निर्देशन कर चुके उत्पल झा वर्तमान भारतीय रंगमंच के महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों में गिने जाते हैं। हाल ही में भारत रंग महोत्सव तथा गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति में प्रस्तुत उनके नाटकों को मिली व्यापक सराहना के बाद पत्रकार सुभाष गौतम ने उनसे रंगमंच, संघर्ष, समाज, तकनीक और बदलते समय को लेकर विस्तृत बातचीत की और लिप्यंतरण युवा पत्रकार हिमांशु ने किया है। प्रश्न- रंगकर्मी की दुनिया में शुरुआत कैसे हुई?उत्तर- उनके भीतर कला और साहित्य के संस्कार बचपन से ही मौजूद थे। मेरा ननिहाल मिथिलांचल क्षेत्र में है, जहां संगीत और साहित्य का वातावरण स्वाभाविक रूप से जीवन का हिस्सा रहा है। परिवार में लोग हारमोनियम बजाते थे, गायन करते थे और घर में पुस्तकों का अच्छा संग्रह था। दादाजी डॉक्टर थे और साहित्य पढ़ने का विशेष शौक रखते थे, जिसके कारण बचपन से ही किताबों के बीच रहने का अवसर मिला। स्कूल और कॉलेज के दिनों में सरस्वती पूजा, दुर्गा पूजा और अन्य आयोजनों में होने वाले नाटकों में भाग लेते थे। हालांकि उस समय तक यह तय नहीं किया था कि रंगमंच को ही जीवन का उद्देश्य बनाएंगे। प्रश्न- रंगमंच की ओर झुकाव कब और कैसे हुआ? उत्तर- इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए जब पटना पहुंचे, उस समय कुछ ऐसे दोस्तों से मुलाकात हुई जो पढ़ाई के साथ-साथ रंगमंच भी करते थे। उनके साथ थिएटर देखने और समझने का अवसर मिला। धीरे-धीरे मंच की दुनिया आकर्षित करने लगी और महसूस हुआ कि अभिनय में मेरी गहरी रुचि है। उसी दौर में कई रंगकर्मियों के साथ काम करना शुरू किया और रंगमंच जीवन का स्थायी हिस्सा बनता चला गया। प्रश्न- राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय तक पहुंचने के पीछे कैसा संघर्ष रहा? उत्तर- राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय तक पहुंचने की यात्रा आसान नहीं थी। पहली बार आवेदन करने पर चयन नहीं हुआ, क्योंकि उस समय अभिनय का अनुभव तो था, लेकिन इंटरव्यू और प्रस्तुति की तैयारी पर्याप्त नहीं थी। चयन न होने के बाद मैंने श्रीराम सेंटर में प्रवेश लिया। उसके बाद लखनऊ स्थित भारतेंदु नाट्य अकादमी में चयन हुआ, जहां छात्रवृत्ति भी मिली। भारतेंदु नाट्य अकादमी में प्रशिक्षण लेने के बाद दोबारा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में आवेदन किया और तीसरे प्रयास में चयन संभव हो सका। प्रश्न- राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में चयन का वह क्षण आपके लिए कितना महत्वपूर्ण था? उत्तर- वह जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षणों में से एक था। रेपर्टरी के इंटरव्यू के दौरान तेज बुखार था, लेकिन फिर भी प्रस्तुति दी। इंटरव्यू के दौरान पूछा गया कि यदि रेपर्टरी और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दोनों में चयन हो जाए तो किसे प्राथमिकता देंगे। इसके जवाब में मैंने कहा कि सीखने के उद्देश्य से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को प्राथमिकता दूंगा। इसके बाद कहा गया कि आपका चयन हो चुका है। देवेन्द्र राज अंकुर का मार्गदर्शन मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक रहा। अंकुर जी केवल शिक्षक नहीं, बल्कि ऐसे मार्गदर्शक रहे जिन्होंने अभिनय के साथ-साथ जीवन को समझने की दृष्टि भी दी। प्रश्न- आपके जीवन का महत्वपूर्ण नाटक कौन-सा रहा? उत्तर- बचपन में लोक शैली के छोटे-छोटे नाटकों में अभिनय करता था, लेकिन पेशेवर रंगमंच की वास्तविक शुरुआत स्वदेश दीपक के चर्चित नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ से हुई। इस नाटक में विकास राय का किरदार निभाया था, जो बेहद चुनौतीपूर्ण भूमिका थी। इसी नाटक से अभिनय को गंभीरता से समझने और मंच को जीवन के रूप में स्वीकार करने की शुरुआत हुई। प्रश्न- इस वर्ष भारत रंग महोत्सव में चर्चित रहे आपके नाटक ‘पांच पत्र’ के विषय में बताइए। इस नाटक की मूल संवेदना क्या है? उत्तर- यह मैथिली साहित्यकार हरिमोहन झा की रचना पर आधारित नाटक है।read more:https://pahaltoday.com/abhinandan-2026-became-a-historic-platform-for-education-and-talent-recognition-garnering-widespread-attention/ इसके केंद्र में स्त्री-पुरुष संबंधों की बदलती प्रकृति है। विवाह के शुरुआती दिनों का प्रेम, आत्मीयता और उत्साह आर्थिक दबाव तथा पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच किस प्रकार बदलता जाता है, यही इसकी केंद्रीय संवेदना है। नाटक में आरंभ में पति-पत्नी रातभर जागकर बातें करना चाहते हैं, लेकिन समय बीतने के साथ वही संबंध औपचारिक और थका हुआ हो जाता है। नाटक का अंतिम दृश्य अत्यंत विचलित कर देता है, जहां एक वृद्ध पति अपने बेटे से कहता है कि उसके बाद यदि उसकी पत्नी को कुछ हो जाए तो उसकी ओर से भी दो लकड़ियां डाल देना। यह संवाद केवल मृत्यु का नहीं, बल्कि रिश्तों की थकान और समय की निर्ममता का प्रतीक है। इस नाटक के अब तक चालीस से अधिक मंचन हो चुके हैं। प्रश्न- गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति में आपके नाटकों का मंचन हुआ। आप गांधी और नाटक को किस प्रकार जोड़कर देखते हैं? उत्तर- यह आयोजन मैथिली के चर्चित नाटककार महेंद्र मलंगिया के नाटकों पर केंद्रित था, जिसमें भारत और नेपाल के विभिन्न हिस्सों से रंगकर्मी शामिल हुए थे। मूल रूप से नाटक ‘पांच पत्र’ ही था, हालांकि आयोजन के लिए उसका शीर्षक परिवर्तित कर ‘सुनते करिए हैरान’ रखा गया था। गांधीवादी विचार केवल राजनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मनुष्य के रिश्तों, सामाजिक व्यवहार और नैतिक संघर्षों में भी दिखाई देते हैं। थिएटर का उद्देश्य भी मनुष्य को उसकी आंतरिक सच्चाइयों से परिचित कराना है और यही गांधीवादी दृष्टि का मूल तत्व है।प्रश्न- आपने विभिन्न भाषाओं में नाटक निर्देशित किए हैं। क्या भाषा कभी बाधा बनी? उत्तर- थिएटर की असली भाषा संवेदना होती है। हिंदी, मैथिली, असमिया, नेपाली, अंग्रेजी और खासी जैसी भाषाओं में काम किया है, लेकिन अभिनेता के हावभाव, ऊर्जा और मंचीय अभिव्यक्ति बहुत कुछ कह देती है। इसलिए थिएटर केवल भाषा का नहीं, बल्कि भावनाओं का माध्यम है। प्रश्न- छोटे शहरों और बिहार के कलाकारों के सामने किस प्रकार की समस्याएं हैं? उत्तर- वहां प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन मंच और संसाधनों का अभाव एक बड़ी समस्या है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से पास आउट होने के बाद कई वर्षों तक अपने शहर में लगातार कार्यशालाएं आयोजित कीं और कई प्रोडक्शन तैयार किए, जिनके देश के विभिन्न हिस्सों में मंचन हुए। हालांकि छोटे शहरों में थिएटर को आर्थिक स्थिरता नहीं मिल पाती, जिसके कारण कलाकारों को लगातार संघर्ष करना पड़ता है। भविष्य में अपने क्षेत्र में फिर सक्रिय रूप से रंगमंचीय गतिविधियां शुरू करना चाहता हूं। प्रश्न- समकालीन रंगमंच और तकनीक को लेकर आपकी क्या राय है? उत्तर- थिएटर लगातार बदल रहा है और नई तकनीकों ने उसे नए आयाम दिए हैं। आज रंगमंच में लाइट, वीडियो, डिजिटल डिजाइन और आधुनिक तकनीकों का प्रभाव बढ़ा है। समाज बदलता है, वैसे ही दर्शकों की मानसिकता और कलाकारों की अभिव्यक्ति भी बदलती है। किसी भी नाटक की सबसे बड़ी शक्ति उसका कंटेंट होता है और दर्शक जब नाटक देखकर जाए तो उसके भीतर कुछ बचा रहना चाहिए, चाहे वह विचार हो, संवेदना हो या कोई प्रश्न। प्रश्न- क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने रंगमंच को प्रभावित किया है? उत्तर- एआई इंसान द्वारा निर्मित तकनीक है और उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि मनुष्य उसका उपयोग किस प्रकार करता है। पहले किसी नाटक का पोस्टर डिजाइन करने में कई घंटे लग जाते थे, जबकि अब वही काम कुछ मिनटों में संभव हो जाता है। इससे डिजाइनरों और कलाकारों की आजीविका पर प्रभाव पड़ सकता है। आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती तकनीक का संतुलित और सकारात्मक उपयोग सुनिश्चित करना होगा। रंगमंच आज भी समाज को भीतर से बदलने की क्षमता रखता है। उनके अनुसार, मंच पर कही गई सच्ची बात सीधे दर्शकों के मन तक पहुंचती है और यही थिएटर की सबसे बड़ी शक्ति है।