डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा‘
शहर के उस वीवीआईपी मोहल्ले में दुख भी ब्रांडेड था। दीवान साहब क्या मरे, कोठी के बाहर मातम की सेल लग गई। सफ़ेद कुर्ते-पजामे में लोग ऐसे सजे थे जैसे किसी मातम-थीम वाली पार्टी में आए हों। रुआंसा होना वहाँ शिष्टाचार था, पर रोना मिडिल क्लास होने की निशानी। तभी शोक-लिमिटेड कंपनी की गाड़ी रुकी और चार पेशेवर मातमगीर उतरे। इनके चेहरे पर दुख की ऐसी परत थी कि फेयरनेस क्रीम भी शर्मिंदा हो जाए। छोटा बेटा, जो पिता की वसीयत और नेटफ्लिक्स के सब्सक्रिप्शन के बीच झूल रहा था, धीरे से बोला, “देखिए, माहौल ऐसा बनाइए कि पड़ोसियों को लगे कि पिता नहीं, कोई भगवान गकए हैं। पैकेज में हिचकियां और छाती पीटना भी शामिल है न?” मुख्य मातमगीर ने उसे ऐसे देखा जैसे कोई कलाकार किसी नौसिखिए को देखता है, और बस इतना कहा, “साहब, हम आंसुओं की खेती करते हैं, फसल ऐसी काटेंगे कि पूरा मोहल्ला डूब जाएगा।”read more:https://pahaltoday.com/cdo-reviewed-census-mnrega-housing-schemes/
दीवान साहब के शव के पास पहुंचते ही मुख्य मातमगीर ने जो तान छेड़ी, उसे सुनकर मोहल्ले के कुत्ते भी डिप्रेशन में चले गए। “ओ मेरे अन्नदाता! आप क्या गए, मोहल्ले की रौनक चली गई!” उसकी आवाज़ में वो दर्द था जो अक्सर ईएमआई बाउंस होने पर भी नहीं होता। उसने शव के पैर ऐसे पकड़े जैसे वो कोई खोया हुआ खजाना हो। घर की औरतें, जो अब तक साड़ियों के मैचिंग और कैटरिंग के मेन्यू पर चर्चा कर रही थीं, अचानक ‘हाथ से बने’ आंसुओं के मुकाबले में पिछड़ने लगीं। लोग फुसफुसा रहे थे—”क्या वफादार लोग हैं, दीवान साहब की रूह भी ऊपर बैठकर खुश हो रही होगी कि चलो, कोई तो है जो मुफ्त में नहीं रो रहा।” बड़ा बेटा अपनी रुमाल भिगोने के लिए बार-बार आंखों में ग्लिसरीन डाल रहा था ताकि इन भाड़े के रुदालियों से कंपटीशन कर सके। श्मशान की राह में उन चारों ने ऐसा कोहराम मचाया कि लगा साक्षात यमराज को भी अपनी नौकरी से इस्तीफा देना पड़ेगा। वे दीवान साहब के गुणों का ऐसा बखान कर रहे थे जैसे वो कोई समाज सुधारक थे, जबकि सच ये था कि दीवान साहब ने पूरी जिंदगी ब्याज और बददुआएं कमाने में बिताई थी। चिता के पास पहुंचकर मुख्य मातमगीर ने अपनी छाती पीटनी शुरू की, “बाबूजी, हमें किसके भरोसे छोड़ गए?” छोटा बेटा मन ही मन मुस्कराया, “पैसा वसूल है भाई, एकदम नेचुरल एक्टिंग।” जैसे-जैसे आग की लपटें बढ़ीं, उन चारों का विलाप पेशेवर दायरे से बाहर निकलकर व्यक्तिगत होने लगा। वे अब चीख नहीं रहे थे, तड़प रहे थे। उनकी आंखों से बहता पानी अब पैकेज का हिस्सा नहीं लग रहा था। अंतिम क्रिया खत्म हुई। बेटे ने चेक बुक निकाली और मुख्य मातमगीर के पास गया, “ये लो तुम्हारा बोनस, बहुत जानदार परफॉर्मेंस थी।” मातमगीर ने चेक की तरफ देखा भी नहीं, उसकी नजरें चिता की राख पर टिकी थीं। उसने अपनी फटी हुई कमीज की जेब से एक पुराना खत निकाला और राख में डाल दिया। “साहब, हम रोने के पैसे नहीं लेते, हम तो बरसों का हिसाब बराबर करने आए थे।” बड़े बेटे ने चिढ़कर पूछा, “क्या मतलब? पहेलियां मत बुझाओ।” मातमगीर की आंखों में अब वो आग थी जो चिता में भी नहीं बची थी। वह बोला, “पच्चीस साल पहले दीवान साहब ने जिस अनाथालय की जमीन हड़प कर ये कोठी खड़ी की थी, हम उन अनाथ बच्चों की पहली खेप हैं। उन्होंने हमें सड़कों पर रोने के लिए छोड़ा था, आज हम उन्हें उसी कर्ज का ब्याज चुकाने आए थे। आज हम प्रोफेशनल बनकर नहीं, बल्कि उनके पापों के गवाह बनकर रोए हैं।” चारों सन्नाटे को चीरते हुए निकल गए, और कोठी के वारिस वहां खड़े होकर अपनी वसीयत के कागज देख रहे थे, जिन पर अब राख जमी थी।