पटना। पटना हाईकोर्ट ने कुशवाहा (कोइरी) और दांगी जाति को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कुशवाहा (कोइरी) जाति के लोग अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के आरक्षण का लाभ नहीं ले सकते, क्योंकि वे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में आते हैं। हाई कोर्ट ने कहा है कि कुशवाहा और दांगी जाति अलग है और कुशवाहा जाति के लोग दांगी को मिले आरक्षण का लाभ नहीं ले सकते। दरअसल दांगी जाति को कुशवाहा जाति की ही उप जाति माना जाता है। लेकिन सरकारी दस्तावेजों में दोनों को अलग समूह में रखा गया है। दांगी को अति पिछड़ी जाति का दर्जा मिला हुआ है तो कुशवाहा ओबीसी यानि अन्य पिछड़ी जाति में आते हैं। पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कुशवाहा और दांगी दो अलग-अलग जातियां हैं और दोनों का वर्गीकरण भी अलग है। अदालत ने कहा कि कुशवाहा समुदाय अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में आता है, जबकि दांगी समुदाय अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) में शामिल है। इस आधार पर ईबीसी के लिए आरक्षित सीट पर ओबीसी कुशवाहा जाति का व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता। यह मामला पश्चिम चंपारण जिले के बेतिया प्रखंड स्थित वजहा वसमहापुर पंचायत से जुड़ा है। वर्ष 2021 के पंचायत चुनाव में मुखिया पद पर मनोज प्रसाद निर्वाचित हुए थे। उनके चुनाव को संतोष कुमार ने चुनौती दी थी।read more:https://khabarentertainment.in/major-action-by-kangra-police-youth-arrested-with-drugs-in-hrtc-bus/ याचिकाकर्ता का आरोप था कि मनोज प्रसाद ने खुद को दांगी जाति का बताकर ईबीसी आरक्षित सीट से चुनाव लड़ा, जबकि वे वास्तव में कुशवाहा (कोइरी) जाति से हैं, जो ओबीसी श्रेणी में आती है। मामला राज्य निर्वाचन आयोग के पास पहुंचा, जहां एक तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई गई। जांच में पाया गया कि मनोज प्रसाद कुशवाहा जाति से हैं, न कि दांगी। इसके आधार पर आयोग ने उनका चुनाव रद्द कर दिया। इस फैसले को मनोज प्रसाद ने पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी। न्यायाधीश सुधीर सिंह और न्यायाधीश शैलेन्द्र सिंह की डबल बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि कुशवाहा और दांगी जातियों का सामाजिक वर्गीकरण अलग है एक ओबीसी यानि पिछड़ी जाति में है तो दूसरा ईबीसी यानि अति पिछड़ी जाति में शामिल है। ईबीसी के लिए आरक्षित सीट पर केवल उसी वर्ग का उम्मीदवार चुनाव लड़ सकता है। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रस्तुत साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर याचिकाकर्ता मनोज प्रसाद अपने आरोप को साबित नहीं कर सके। वे नहीं साबित कर पाए कि अति पिछड़ों के लिए आरक्षित सीट पर वे कैसे चुनाव लड़ सकते हैं। इसलिए कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।