स्नेहा सिंह
आज के माहौल में यह जानना भी ज़रूरी हो गया है कि अपनी बेटी या बहू किस कंपनी में काम करती है, कंपनी कहां स्थित है और उसका तत्काल बॉस कौन है। शिक्षित महिलाएं अपने ज्ञान का उपयोग आर्थिक कमाई के लिए कर रही हैं और अपने परिवार तथा समाज के लिए प्रेरणा बन रही हैं। विदेशों की तरह महानगरों में पति-पत्नी दोनों नौकरी कर समृद्ध जीवन जीते हैं और अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दे पाते हैं। कंपनियों के बोर्ड में महिलाओं की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है और कई कंपनियों में महिला सीईओ भी देखने को मिल रही हैं। स्टार्टअप क्षेत्र में भी महिलाएं शीर्ष स्थान पर हैं। नौकरी करने वाली महिलाओं को प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिनमें यौन उत्पीड़न भी शामिल है। हालांकि इस समस्या से निपटने की समझ उनमें विकसित हुई है और कानून भी उनकी रक्षा के लिए मौजूद हैं। टीसीएस (टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज) की नासिक शाखा में महिला कर्मचारियों के यौन उत्पीड़न और कथित धर्म परिवर्तन के दबाव का मामला देशभर की कार्पोरेट कंपनियों में चर्चा का विषय बन गया है। इस घटना के बाद नौकरी करने वाली महिलाओं और उनके परिवारों में सतर्कता बढ़ी है। सभी कंपनियों में ऐसा नहीं होता, लेकिन जब प्रतिष्ठित कंपनी में भी ऐसे आरोप सामने आते हैं, तो छोटे संस्थानों की स्थिति पर सवाल उठता है। जहां मानव संसाधन (एचआर) विभाग होता है, वहां यदि वही जिम्मेदार व्यक्ति गलत आचरण करने लगे तो कर्मचारियों के पास विकल्प सीमित हो जाते हैं। कर्मचारियों का मूल्यांकन एचआर रिपोर्ट पर निर्भर करता है और नकारात्मक रिपोर्ट नौकरी को खतरे में डाल सकती है। ऐसे में कई लोग मजबूरी में चुप रह जाते हैं। कई बार कर्मचारियों पर अलग-अलग तरह के दबाव डाले जाते हैं। जो लोग विरोध नहीं कर पाते, वे धीरे-धीरे परिस्थितियों के आगे झुक जाते हैं और शोषण का शिकार बनते हैं।read more:https://pahaltoday.com/adulteration-is-very-worrying/महिलाओं की चुप्पी को अक्सर उनकी सहमति समझ लिया जाता है, जो एक गलत मानसिकता को दर्शाता है। जहां लाचारी होती है, वहीं शोषण जन्म लेता है। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब नौकरी की मजबूरी का फायदा उठाकर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाया जाता है। देश में महिलाओं ने कई ऊंचे पद हासिल किए हैं, महिला मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री और राष्ट्रपति तक, फिर भी कार्यस्थल पर वे शोषण का आसान लक्ष्य बन जाती हैं, खासकर मध्य स्तर की नौकरी करने वाली महिलाएं। कुछ महिलाएं विरोध कर नौकरी छोड़ देती हैं, जबकि कुछ मजबूरी में सहन करती रहती हैं। टीसीएस प्रबंधन की सराहना की जा सकती है कि उसने आरोप सामने आने पर त्वरित कार्रवाई की और जांच में सहयोग दिया। मामला अब अदालत के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी चर्चा में है, जहां विभिन्न तरह की राय सामने आ रही हैं।read more:https://pahaltoday.com/india-gets-gold-gift-during-oil-crisis-estimated-reserves-of-42-5-tonnes-in-andhra/कोई भी कंपनी यह दावा नहीं कर सकती कि वहां यौन उत्पीड़न के मामले बिलकुल नहीं होते। महिलाओं को रोजमर्रा में छोटी-बड़ी टिप्पणियां, मजाक या अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ता है, चाहे वह आफिस हो या सार्वजनिक परिवहन। कई कंपनियां ड्रेस कोड और व्यवहार संबंधी नियम बनाती हैं, लेकिन कर्मचारियों की मानसिकता बदलना आसान नहीं है। आधुनिकता का दिखावा करने वाली कंपनियों के भीतर भी कई बार अंधेरा छिपा होता है। पब्लिक रिलेशन और छवि प्रबंधन के कारण कई घटनाएं सामने नहीं आ पातीं। धर्म परिवर्तन का मुद्दा संवेदनशील है। यदि यह स्वेच्छा से हो तो स्वीकार्य है, लेकिन दबाव या मजबूरी में हो तो विवाद उत्पन्न होता है। नौकरी करने वाली महिलाओं पर पारिवारिक जिम्मेदारियां भी होती हैं, जिसके कारण वे कई बार नौकरी छोड़ने का जोखिम नहीं उठा पातीं। कार्पोरेट जगत में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है और वे नेतृत्व की भूमिकाओं में भी आगे आई हैं। दूसरी ओर कई महिलाएं अब गलत व्यवहार को नजरअंदाज करने के बजाय उसका विरोध करना सीख रही हैं और आवश्यकता पड़ने पर शिकायत भी करती हैं। लेंसकार्ट जैसी कंपनी भी ड्रेस कोड विवाद में घिरी थी, जहां बिंदी या टीका लगाने पर रोक की बात सामने आई थी, जिसे बाद में कंपनी ने स्पष्ट किया। सोशल मीडिया पर इसकी कड़ी आलोचना हुई। कई राज्यों में मल्टीनेशनल कंपनियां हैं, जहां बड़ी संख्या में महिलाएं काम करती हैं। कुछ मामलों के बाद कंपनियों ने सुरक्षा उपायों को मजबूत किया है। POSH एक्ट (2013) कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संबंधित एक महत्वपूर्ण कानून है। इसके तहत कुछ प्रमुख न्यायिक निर्णय- विशाखा बनाम राज्य राजस्थान- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न महिला के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। एपरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल बनाम ए.के. चोपड़ा-नियोक्ता कर्मचारियों के आचरण के लिए जिम्मेदार हैं। टीसीएस ICC बनाम तनुजा प्रिया भट्ट-सुरक्षित कार्यस्थल और प्रभावी आंतरिक शिकायत समिति आवश्यक है। पूर्णिमा अडवाणी बनाम भारत संघ-POSH कानून सरकारी संस्थानों पर भी लागू होता है। संचयनी शर्मा बनाम नेशनल इंश्योरेंस-यौन उत्पीड़न केवल शारीरिक ही नहीं, मौखिक/इशारों में भी हो सकता है। मधु बनाम राज्य केरल-आरोपों को संभावना के आधार पर भी सिद्ध किया जा सकता है। अंजलि भारद्वाज बनाम भारत संघ-सभी सरकारी विभागों में शिकायत समितियां अनिवार्य हैं। HDFC बैंक बनाम विनोद कुमार-तीसरे पक्ष द्वारा उत्पीड़न होने पर भी नियोक्ता जिम्मेदार हो सकता है। कमलजीत कौर बनाम पंजाब एंड सिंध बैंक-शिकायत समिति का गठन न होने पर नियोक्ता दोषी माना जा सकता है। विनिता श्रीवास्तव बनाम सहारा इंडिया-जीरो टोलरेंस नीति अपनाने पर ज़ोर। यह लेख कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा, जागरूकता और कानूनी अधिकारों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।