अविनाश एक प्रोफेशनल ‘इंपैथी ब्लॉगर’ था। उसका काम था— दुनिया के दुख को 4के क्वालिटी में दुनिया के सामने पेश करना। एक दिन शहर के चौक पर एक बूढ़ा आदमी भूख से बेहोश होकर गिर पड़ा। अविनाश वहां पहुंचा, पर उसने बूढ़े को उठाने के बजाय अपनी ‘सेल्फी स्टिक’ निकाली और ‘एंगल’ सेट करने लगा। उसने अपने फॉलोअर्स से कहा, “दोस्तों, आज मैं आपको ‘वास्तविक भारत’ की भूख दिखाऊंगा। देखिए, इन झुर्रियों में कितना ‘कंटेंट’ छिपा है।” बूढ़े ने कांपते हाथों से अविनाश का पैर पकड़ा और फुसफुसाया, “बेटा… पानी।” अविनाश चिल्लाया, “अरे बाबा, थोड़ा ‘नेचुरल’ रहिए! ये ‘पानी-पानी’ बोलकर वीडियो का ‘मूड’ खराब मत कीजिए। बस एक बार कैमरे की तरफ देखकर थोड़ा और ‘बेबस’ महसूस कीजिए।” भीड़ जमा हो गई, पर हर हाथ में एक स्मार्टफोन था। कोई ‘लाइव स्ट्रीम’ कर रहा था, तो कोई ‘सैड म्यूजिक’ के साथ रील बना रहा था। तभी एक छोटा बच्चा अपनी बोतल लेकर आगे बढ़ा, तो अविनाश ने उसे धक्का दे दिया— “हटो! फ्रेम खराब हो रहा है।” जब बूढ़े की सांसें थम गईं, तो अविनाश ने एक विजयी मुस्कान के साथ ‘अपलोड’ बटन दबाया। दस मिनट में उसके वीडियो पर एक लाख ‘हार्ट’ इमोजी आ गए। कॉमेंट्स में लोग लिख रहे थे— “सो सैड”, “हृदयविदारक”, “मानवता मर गई है”। अविनाश ने अपनी गाड़ी स्टार्ट की और अगले ‘दुख’ की तलाश में निकल पड़ा। उसे अपनी रूह के मरने का गम नहीं था, उसे गम था कि ‘अपलोड’ के दौरान इंटरनेट की स्पीड थोड़ी कम क्यों थी। उस रात अविनाश को नींद नहीं आई, क्योंकि किसी ने कॉमेंट किया था कि बूढ़े का चेहरा ‘फोकस’ में नहीं था।