हर्ष पांडेय
सोशल मीडिया और लोकतंत्र का बदलता स्वरूप आज के समय की सबसे महत्वपूर्ण चर्चाओं में से एक बन चुका है। यदि हम पिछले दो दशकों की तुलना करें तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि लोकतंत्र की पारंपरिक संरचना, जहाँ संवाद मुख्यता संसद, प्रेस और जनसभाओं के माध्यम से होता था, अब एक व्यापक डिजिटल मंच में परिवर्तित हो चुका है। आज सोशल मीडिया संचार का माध्यम नहीं, बल्कि जनमत के निर्माण राजनीतिक विमर्श और सत्ता के प्रति जवाबदेही प्रभावशाली यंत्र बन गया है।लोकतंत्र की आत्मा संवाद में निहित होती है और सोशल मीडिया ने इस संवाद को अभूतपूर्व विस्तार प्रदान किया है। अब कोई भी नागरिक अपने विचारों को त्वरित प्रभाव से लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है। यह स्थिति लोकतंत्र को अधिक सहभागी बनाती है क्योंकि, पहले जहाँ केवल चुनिंदा संस्थाएं ही विचार व्यक्त करने का मंच प्राप्त करती थीं, वहीं अब सामान्य नागरिक भी नीति निर्माण और राजनीतिक बहसों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। इस दृष्टि से सोशल मीडिया लोकतंत्र को अधिक समावेशी और जीवंत बनाता है।किंतु इसी प्रक्रिया में एक गंभीर प्रश्न भी उभरता है कि क्या यह डिजिटल संवाद वास्तव में कारगर एवं सार्थक है या यह केवल सूचनाओं और विचारों को अराजकता में परिवर्तित कर रहा है । सोशल मीडिया पर सूचनाओं का प्रसार अत्यंत तीव्र गति से होता है किन्तु, उसकी सच्चाई और विश्वसनीयता अक्सर संदिग्ध होती है । फेक न्यूज़, भ्रामक प्रचार और अपुष्ट सूचनाएँ लोकतांत्रिक विमर्श को प्रभावित कर रही हैं। यह स्थिति नागरिकों को निर्णय लेने की क्षमता को कमज़ोर कर रही है क्योंकि, लोकतंत्र का आधार सूचित और विवेकपूर्ण नागरिक होता है, जिसका असर हमारे देश के विकास और समृद्धि पे भी पड़ेगा।
इसके अतिरिक्त सोशल मीडिया ने राजनीतिक प्रचार के स्वरूप को भी बदल दिया है अब चुनावी अभियान केवल रैलियों और विज्ञापनों तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल प्लेटफार्म पर टारगेटेड कैंपेनिंग के माध्यम से मतदाताओं को प्रभावित किया जा रहा है। एल्गोरिद्म आधारित सामग्री वितरण लोगों को केवल वही जानकारी दिखाता है जो उनके पूर्वाग्रहों के अनुरूप हो,जिससे इको चैम्बर की स्थिति उत्पन्न होती है। यह लोकतंत्र में विविधता और विचारों के आदान प्रदान को सीमित करता है।एक और महत्वपूर्ण पहलू है, जवाबदेही। सोशल मीडिया ने सरकर और प्रशासन को अधिक पारदर्शी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।नागरिक अब सीधे अपनी समस्याएँ सार्वजनिक रूप से उठा सकते हैं, जिससे प्रशासन पर त्वरित प्रतिक्रिया देने का दबाव बनता है।अनेक मामलों में देखा गया है कि सोशल मीडिया के माध्यम से उठाए गए मुद्दों पर सरकार ने शीघ्र कार्रवाई की है।इस प्रकार यह मंच लोकतंत्र में उत्तरदायित्व को मज़बूत करता है।इसका सीधा सटीक उदाहरण है भारतीय रेल,जहाँ शिकायत के 20 मिनट में ही समस्या का समाधान होता दिखा है ।किंतु इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि इस शक्ति का दुरुपयोग न हो।ऑनलाइन ट्रोलिंग, घृणास्पद भाषण और डिजिटल उत्पीड़न जैसे मुद्दे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जो संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (a) के अंतरगत संरक्षित है, उसका प्रयोग ज़िम्मेदारी के साथ होना चाहिए ।अनुच्छेद 19 (2) अंतरगत स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं, ताकि सार्वजनिक व्यवस्था , नैतिकता और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा की जा सके।इस परिप्रेक्ष्य में यह आवश्यक हो जाता है कि सोशल मीडिया के लिए एक संतुलित नियामक ढांचा विकसित किया जाए जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दुरुपयोग के बीच उचित संतुलन स्थापित कर सके।अत्यधिक नियंत्रण से अभिव्यक्ति की आज़ादी का दम न हो सकता है, जबकि पूर्ण स्वतंत्रता अराजकता को जन्म देती है। अतः क़ानून और नीति का उद्देश्य यह होना चाहिए की डिजिटल मंचों को उत्तरदायी बनाया जाए न कि उन्हें अनावश्यक रूप से नियंत्रित किया जाए ।
अंततः यह कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया ने लोकतंत्र के स्वरूप को मूलतः बदल दिया है। यह परिवर्तन न तो पूर्णतः सकारात्मक है और न ही नकारात्मक। यह एक ऐसी शक्ति है जो लोकतंत्र को सशक्त भी बनाती है और कमज़ोर भी कर सकती है ।इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि हम इसे किस प्रकार उपयोग करते हैं और इसके लिए किस प्रकार का विधिक एवं नैतिक ढांचा विकसित करते हैं । लोकतंत्र की मज़बूती के लिए आवश्यक है कि तकनीक और ज़िम्मेदारी के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि सोशल मीडिया जनहित और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में सहायक सिद्ध हो सके।