भारत में अनुसूचित जाति की व्यवस्था का निर्माण किसी धर्म विशेष को लाभ देने के लिए नहीं किया गया था, बल्कि उन सामाजिक वर्गों को संरक्षण और अवसर देने के लिए किया गया था, जो सदियों से सामाजिक भेदभाव, अस्पृश्यता और सामाजिक बहिष्कार का सामना करते रहे थे।संविधान निर्माताओं ने यह माना था कि समाज में जो ऐतिहासिक अन्याय और सामाजिक असमानता रही है, उसे दूर किए बिना वास्तविक समानता स्थापित नहीं की जा सकती। इसी कारण आरक्षण और विशेष कानूनी संरक्षण की व्यवस्था की गई। यह व्यवस्था मूलतः सामाजिक भेदभाव पर आधारित थी, आर्थिक आधार पर नहीं। इसलिए अनुसूचित जाति का प्रश्न धर्म से अधिक सामाजिक संरचना से जुड़ा हुआ था।जब कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर ऐसे धर्म को स्वीकार करता है, जहां जाति व्यवस्था को मान्यता नहीं दी जाती, तो फिर यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या उसे उसी आधार पर अनुसूचित जाति के लाभ मिलते रहने चाहिए। इसी प्रश्न को लेकर वर्षों से देश में बहस चलती रही है।कई मामलों में यह देखा गया कि व्यक्ति ने धर्म परिवर्तन कर लिया, वह दूसरे धर्म की धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था में सक्रिय भी हो गया, लेकिन वह अनुसूचित जाति के आरक्षण, छात्रवृत्ति, नौकरी में आरक्षण और एससी/एसटी एक्ट जैसे कानूनों का लाभ लेना चाहता था। इससे एक प्रकार की कानूनी और सामाजिक विसंगति उत्पन्न हो रही थी। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इसी विसंगति को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है और यह स्पष्ट करता है कि संविधान द्वारा दी गई सुविधाओं का उपयोग उसी सामाजिक संदर्भ में किया जा सकता है, जिसके लिए वे बनाई गई थीं।धर्मांतरण का प्रश्न भारत में केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं रहा है, बल्कि कई बार यह सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और जनसंख्या संतुलन से भी जुड़ जाता है।देश के विभिन्न क्षेत्रों में विशेषकर गरीब, वंचित और अनुसूचित जाति तथा जनजाति वर्गों में धर्मांतरण की घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रही हैं। कई बार धर्मांतरण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सहायता के माध्यम से हुआ, तो कई बार लालच, प्रलोभन, दबाव या सामाजिक परिस्थितियों के कारण भी धर्म परिवर्तन के आरोप लगे। इसी कारण कई राज्यों ने धर्मांतरण को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाए, ताकि बल, प्रलोभन या धोखे से होने वाले धर्म परिवर्तन को रोका जा सके, लेकिन इन कानूनों का प्रभाव उतना व्यापक नहीं हो पाया जितनी अपेक्षा थी।जब किसी विशेष सामाजिक वर्ग का बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन होता है, तो उसका प्रभाव केवल धर्म पर ही नहीं पड़ता, बल्कि जातीय संरचना, सामाजिक संतुलन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक संबंधों पर भी पड़ता है। धीरे-रे यह स्थिति सामाजिक और धार्मिक संतुलन को प्रभावित करने लगती है। भारत जैसे बहुधर्मी और बहुजातीय देश में सामाजिक और धार्मिक संतुलन का बने रहना राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि समाज लगातार जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर बदलता और विभाजित होता रहेगा, तो इसका प्रभाव सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता पर पड़ना स्वाभाविक है। इस दृष्टि से धर्मांतरण का प्रश्न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि यह सामाजिक और राष्ट्रीय संतुलन