लखनऊ 26 मार्च। “सुंदरकांड महा अभियान, भारतवर्ष की बने पहचान” की वैश्विक संचालिका सनातन ध्वज वाहिका सपना गोयल के अनुसार रामनवमी केवल एक तिथि या सामान्य पर्व नहीं है, बल्कि यह मानवीय गरिमा, नैतिकता और वैश्विक संतुलन के पुनरुत्थान का प्रतीक है। *रामनवमी के मूल में “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का भाव समाहित है* । वास्तव में रावण का वध केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं बल्कि महाज्ञानी परन्तु अहंकारी और अन्यायी के अंत का प्रतीक है। जब समाज से अन्याय मिटता है, तभी ‘विश्व मंगल’ संभव हो सकता है। मौजूदा वैश्विक युद्ध के माहौल में शान्ति और प्रगति के लिए राम के आदर्श अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। वास्तव में राम केवल एक राजा नहीं बल्कि वह ऐसे मर्यादापुरुषोत्तम हैं जिन्होंने संत समाज और पशु-पक्षियों को ही नहीं निषाद समुदाय, भील जनजाति, केवट समाज तक को गले लगाया। इसीलिए कहा गया है कि “रामो विग्रहवान् धर्मः” । अर्थात प्रभु राम, धर्म के साक्षात स्वरूप हैं। इसीलिए प्रभु राम की जीवनदायिनी कथा भारत ही नहीं इंडोनेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया और लाओस तक में लोक जीवन का मुख्य अंग है।रामनवमी के पावन अवसर पर सनातन ध्वजवाहिका सपना गोयल ने कहा कि “सुंदरकांड महा अभियान, भारतवर्ष की बने पहचान” को अभी केवल दो साल ही हुए है, पर इतनी अल्पावधि में ही हिन्दुस्तान के दस राज्यों में जिलों से लेकर दिलों तक को जोड़ा जा सका है।* उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे विभिन्न राज्यों में मातृशक्तियां न केवल नियमित सुंदरकांड का पाठ कर रही हैं बल्कि मंगलवार और शनिवार को नियमित रूप से नजदीकी मंदिरों में भी सामूहिक सुंदरकांड का पाठ कर रही हैं। बात अकेले उतर प्रदेश की करें तो यहां 25 से अधिक जिलों में सुंदरकांड का पाठ संकल्पित होकर मातृशक्तियां कर रही हैं। तीर्थाटन के अभियान में उत्तराखंड कोटद्वार के प्राचीन सिद्धबली मंदिर, नैमिषारण्य तीर्थ, काशी विश्वनाथ मंदिर, हर की पौड़ी हरिद्वार, रुड़की महादेव मंदिर और प्रयागराज के लेटे हुए हनुमान मंदिर परिसर मथुरा जन्म भूमि चित्रकूट रामघाट एवं कानपुर के आनंदेश्वर महादेव मंदिर के गंगा जी घाट परिसर में भी भव्य सुंदरकाण्ड का पाठ हजारों मातृशक्तियां साथ लेकर इस अभियान को महायज्ञ और भारत वर्ष की पहचान का स्वरूप देने का प्रयास कर सफलतापूर्वक आयोजित किया जा चुका है। सनातन ध्वजवाहिका सपना गोयल का एकमात्र लक्ष्य है कि संतों और ऋषियों की पावन भूमि, भारत एक बार पुन: अपनी आध्यात्मिक पहचान के रूप में प्रतिष्ठित हो।