घूंघट, पंचायत और प्रगतिशील पैड

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 DR. SURESH KUMAR MISHRA:मुरलीपुर गांव में जब ‘बिंदिया बुआ’ ने प्रधानी का चुनाव लड़ने का मन बनाया, तो गांव के मठाधीशों के हुक्के की गुड़गुड़ाहट अचानक रुक गई। बिंदिया बुआ का मुख्य चुनावी मुद्दा ‘महिला स्वच्छता’ था, जिसे सुनते ही गांव के बुजुर्गों ने ऐसे कान बंद किए जैसे किसी ने उनके सामने बम फोड़ दिया हो। गांव की चौपाल पर चर्चा छिड़ गई कि यह ‘औरतों वाली बात’ राजनीति के पवित्र गलियारों में कैसे आ गई? मुखिया जी के खास सिपहसालार ‘चैतू’ का तर्क था कि जिस विषय पर घूंघट की ओट में बात की जाती है, उसे वोट की पेटी तक ले जाना साक्षात कलयुग है। लेकिन बिंदिया बुआ अडिग थीं; उन्होंने गांव की जर्जर दीवारों पर लिखवा दिया— “शर्म छोड़ो, स्वास्थ्य चुनो।” उन्होंने तर्क दिया कि जब तक गांव की बेटियां माहवारी के दिनों में पुराने कपड़ों की सड़ांध झेलेंगी, तब तक गांव का ‘विकास’ केवल फाइलों में इत्र लगाकर घूमता रहेगा।read more:https://pahaltoday.com/indian-red-cross-society-gave-nutritional-packets-to-the-patients-it-adopted/प्रचार के अंतिम सप्ताह में बिंदिया बुआ ने एक ‘गुप्त डिब्बा’ गांव के चौराहे पर रखा और घोषणा की कि इसमें ‘शक्तिवर्धक जड़ी-बूटी’ है जो केवल महिलाओं के कष्ट हरेगी। पुरुषों में खलबली मच गई; उन्हें लगा कि शायद इसमें कोई ऐसा जादू है जिससे उनकी सत्ता छिन जाएगी। विपक्षी उम्मीदवार ‘दकियानूस लाल’ ने अफवाह फैला दी कि बिंदिया बुआ ‘अशुद्धता’ का व्यापार कर रही हैं और इससे गांव के देवता नाराज हो जाएंगे। जवाब में बुआ ने गांव की सभी महिलाओं की एक गुप्त सभा बुलाई और उन्हें सैनिटरी पैड के इस्तेमाल और उससे जुड़ी वैज्ञानिक सच्चाई के बारे में शिक्षित किया। पहली बार मुरलीपुर की औरतों को लगा कि जिसे वे अपनी नियति का ‘अभिशाप’ मानती थीं, वह तो मात्र एक शारीरिक प्रक्रिया है। पुरुषों को अब भी लग रहा था कि डिब्बे में कोई राजनीतिक बारूद है, जबकि वहां सिर्फ जागरूकता की मशाल जल रही थी।read more:https://khabarentertainment.in/raid-against-illegal-liquor-two-distilleries-destroyed-25-litres-of-raw-liquor-and-150-kg-of-raw-material-recovered/ चुनाव का परिणाम आया और बिंदिया बुआ ने दकियानूस लाल की जमानत जब्त करा दी। जीत के बाद जब उस ‘गुप्त डिब्बे’ को खोलने की बारी आई, तो पूरा गांव तमाशा देखने इकट्ठा हुआ। डिब्बा खुला तो उसमें से सैनिटरी पैड्स के पैकेट और एक बड़ा सा पोस्टर निकला जिस पर लिखा था— “जिस खून से सृष्टि का सृजन होता है, उसे अछूत कहने वालों, अपनी सोच बदलो!” पुरुष वर्ग हक्का-बक्का रह गया, उन्हें लगा था कि कोई दैवीय चमत्कार दिखेगा, पर वहां तो एक कड़वी सामाजिक सच्चाई मुस्कुरा रही थी। बिंदिया बुआ ने माइक संभाला और दहाड़ कर बोलीं, “भाइयों, जो पैड आपको ‘अशुद्ध’ लग रहा है, वह आपकी बेटियों के स्कूल जाने का टिकट है।” जनता सन्न थी और उधर बुआ ने अपनी पहली सैलरी से गांव में ‘पैड वेंडिंग मशीन’ लगवाने का टेंडर साइन कर दिया, जबकि पुरुष अभी भी सोच रहे थे कि इस ‘जादू’ का तोड़ किस पंचांग में मिलेगा।

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