डिजिटल वैतरणी 

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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ कंचनपुर गांव की टेढ़ी गलियों में जब आधुनिकता का भूत सवार हुआ, तो सबसे पहले वहां के ‘लल्लन कक्का’ ने अपनी धोती त्याग कर बरमूडा पहन लिया। गांव की चौपाल अब ‘ग्लोबल विलेज’ के नाम पर वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी का हेडक्वार्टर बन चुकी थी, जहाँ गोबर गैस से लेकर मंगल ग्रह तक की चर्चा गुड़ की चाय के साथ गुड़गुड़ाई जाती थी। लल्लन कक्का का मानना था कि राजनीति वह मट्ठा है, जिसे जितना बिलोओ, मक्खन हमेशा दिल्ली वाले ही निकालते हैं। इस बार गांव के प्रधान पद के लिए ‘रामभरोसे’ मैदान में थे, जिनका एकमात्र चुनावी वादा था कि वे गांव के हर तालाब में वाई-फाई का ऐसा जाल बिछाएंगे कि मछलियां भी ऑनलाइन ऑर्डर पर पकड़ी जा सकेंगी। सरकारी फाइलों में गांव की धूल अब ‘पाउडर’ बन चुकी थी और कीचड़ को ‘प्राकृतिक लेप’ बताकर पर्यटन विभाग को फाइल भेज दी गई थी। रामभरोसे की बातों में ऐसी चाशनी थी कि मक्खियां भी अपनी वफादारी बदलकर उनके कुर्ते पर चिपकी रहती थीं।चुनाव की आखिरी रात रामभरोसे ने गांव के बरगद तले एक ‘अदृश्य शक्ति’ के आगमन की घोषणा कर दी। उन्होंने दावा किया कि आधी रात को गांव के पुराने कुएं से एक ‘सोने का कलश’ निकलेगा, जो केवल उसी को दिखेगा जिसने रामभरोसे को वोट देने की गुप्त शपथ ली होगी। पूरे कंचनपुर में सनसनी फैल गई; लोग टॉर्च लेकर कुएं के इर्द-गिर्द ऐसे जमा हो गए जैसे वहां कोई अंतरिक्ष यान उतरने वाला हो। विपक्षी उम्मीदवार ‘घसीटा राम’ परेशान थे कि इस दैवीय चमत्कार का मुकाबला किस भौतिकवादी वादे से करें। रामभरोसे ने कुएं के पास अगरबत्तियों का ऐसा धुआं किया कि लोगों को साक्षात इंद्रलोक की अनुभूति होने लगी। हर ग्रामीण अपनी आंखें फाड़-फाड़ कर उस अंधेरे कुएं में अपना भाग्य तलाश रहा था, जबकि रामभरोसे कोने में बैठकर अपनी डायरी में उन लोगों के नाम नोट कर रहे थे जो सबसे ज्यादा श्रद्धा से सिर झुकाए खड़े थे।अगले दिन जब वोटों की गिनती खत्म हुई और रामभरोसे भारी मतों से जीत गए, तो जनता ने उस ‘सोने के कलश’ की मांग की। रामभरोसे ने बड़ी गंभीरता से सबको उसी कुएं पर बुलाया और एक बाल्टी पानी खींचकर सबके ऊपर छिड़क दिया। लोग हक्के-बक्के रह गए, तभी रामभरोसे दहाड़ कर बोले— “मूर्खों! कलश तो निकल चुका, पर वह सोने का नहीं, ‘वोटों’ का था जो मेरी तिजोरी में सुरक्षित पहुंच गया है! और जो चमक तुम्हें कुएं में दिख रही थी, वह कोई सोना नहीं, बल्कि मैंने अपनी मोबाइल की फ्लैशलाइट एक कांच के टुकड़े पर सेट की थी।” जनता एक-दूसरे का मुंह ताकती रह गई और रामभरोसे अपनी नई स्कॉर्पियो पर ‘प्रधान’ की पट्टी लिखवाने शहर की ओर कूच कर गए। पीछे छोड़ गए तो बस कुएं की वही सड़ांध और ग्रामीणों के चेहरे पर चस्पां हुई एक लाचार सी हंसी, जो लोकतंत्र के इस महान सर्कस की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

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