महाराजा राजेंद्र नारायण सिंह देव के शिक्षा-स्वप्न से ज्ञान-केंद्र तक की यात्रा

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किसी विश्वविद्यालय की पहचान केवल उसके भवनों, पाठ्यक्रमों और उपाधियों से नहीं बनती। उसकी असली पहचान उन सपनों में होती है, जिन्हें वह पीढ़ियों की आँखों में रोपता है और उस ज्ञान में होती है, जो व्यक्ति के साथ पूरे समाज की दिशा बदलने की क्षमता रखता है। 1 सितंबर 2026 को राजेंद्र विश्वविद्यालय, बलांगीर अपना छठा स्थापना दिवस मनाएगा, लेकिन राजेंद्र की कहानी केवल छह वर्षों की नहीं है। इसकी जड़ें आठ दशक से अधिक पुराने उस इतिहास में हैं, जिसकी शुरुआत 3 जुलाई 1944 को हुई, जब तत्कालीन पटना रियासत के शासक महाराजा राजेंद्र नारायण सिंह देव ने बलांगीर में राजेंद्र कॉलेज की स्थापना की। यह केवल एक शिक्षण संस्था की स्थापना नहीं, बल्कि भविष्य में विश्वास की घोषणा थी। महाराजा समझते थे कि किसी क्षेत्र की नियति केवल उसके संसाधनों से नहीं, बल्कि उसके लोगों के ज्ञान, चेतना और नेतृत्व से बदलती है।1944 में जब उच्च शिक्षा पश्चिमी ओडिशा के लिए दूर की आकांक्षा थी, तब राजेंद्र कॉलेज की स्थापना दूरदर्शी कदम था। संस्था ने इंटरमीडिएट कॉलेज के रूप में यात्रा शुरू की और जुलाई 1946 में बी.ए. पास पाठ्यक्रम शुरू होने के साथ डिग्री कॉलेज के रूप में विकसित हुई। 1964-65 में वाणिज्य और 1965-66 में विज्ञान की शुरुआत हुई, जबकि 1978-79 में कला, विज्ञान और वाणिज्य में स्नातकोत्तर शिक्षा का विस्तार हुआ। जनवरी 1967 में यह संबलपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध हुआ और 1 अप्रैल 2002 से इसे स्वायत्त महाविद्यालय का दर्जा मिला। ये केवल प्रशासनिक पड़ाव नहीं थे, बल्कि इंटरमीडिएट से डिग्री, डिग्री से स्नातकोत्तर, संबद्धता से स्वायत्तता और अंततः स्वायत्तता से विश्वविद्यालय बनने की क्रमिक शैक्षिक यात्रा थी।वर्ष 2020 में इस यात्रा ने नया ऐतिहासिक मोड़ लिया। ओडिशा सरकार ने राजेंद्र स्वायत्त महाविद्यालय को राजेंद्र विश्वविद्यालय में उन्नत किया और 1 सितंबर 2020 से यह राज्य सार्वजनिक विश्वविद्यालय के रूप में अस्तित्व में आया। इसका क्षेत्राधिकार बलांगीर और सुबरनपुर जिलों के महाविद्यालयों तक विस्तृत हुआ। लेकिन विश्वविद्यालय बनना केवल नाम परिवर्तन नहीं था; यह जिम्मेदारियों का विस्तार था। विश्वविद्यालय को ज्ञान का प्रसार करने के साथ नए ज्ञान का सृजन करना है, विद्यार्थियों को डिग्री देने के साथ उनमें प्रश्न पूछने, तर्क करने, शोध करने और समाज के प्रति उत्तरदायी बनने का साहस भी पैदा करना है।राजेंद्र की सबसे बड़ी पूँजी उसकी मानवीय विरासत है।read more:https://pahaltoday.com/district-magistrate-holds-meeting-of-the-district-drinking-water-and-sanitation-mission-issues-directives/ दशकों में यहाँ से निकले विद्यार्थी सिविल सेवा, न्यायपालिका, शिक्षा, राजनीति, प्रशासन, व्यवसाय और सार्वजनिक जीवन के अनेक क्षेत्रों में पहुँचे और ओडिशा तथा देश के निर्माण में योगदान दिया। साधारण और ग्रामीण परिवारों के अनेक युवाओं के लिए यह संस्था शिक्षा, रोजगार, गरिमा और सामाजिक गतिशीलता का माध्यम बनी। किसी विश्वविद्यालय की इससे बड़ी उपलब्धि क्या होगी कि उसकी कक्षा से निकलने वाला विद्यार्थी केवल अपना जीवन नहीं बदलता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की दिशा भी बदल देता है?आज राजेंद्र विश्वविद्यालय के सामने पश्चिमी ओडिशा की आकांक्षाओं को दिशा देने की बड़ी जिम्मेदारी है। इसे केवल पश्चिमी ओडिशा में स्थित विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि पश्चिमी ओडिशा की आवश्यकताओं और सपनों का विश्वविद्यालय बनना होगा। जनजातीय जीवन, प्रवासन, कृषि, जल, पर्यावरण, ग्रामीण परिवर्तन, लोकसंस्कृति, भाषाएँ, शिक्षा और स्थानीय ज्ञान प्रणालियाँ ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर गंभीर और अंतर्विषयक शोध की अपार संभावनाएँ हैं। स्थानीय समस्याओं को आधुनिक शोध और वैश्विक ज्ञान से जोड़कर राजेंद्र ऐसी अकादमिक पहचान विकसित कर सकता है, जिसकी जड़ें क्षेत्र में हों और जिसकी दृष्टि दुनिया पर।विश्वविद्यालय के विकास में भौतिक और डिजिटल अवसंरचना भी महत्वपूर्ण है। लगभग 60 एकड़ में फैले परिसर, शैक्षणिक एवं प्रशासनिक सुविधाओं और पुस्तकालय के साथ उच्च गति की डिजिटल कनेक्टिविटी की दिशा में भी काम हुआ है। शैक्षणिक भवनों, प्रशासनिक सुविधाओं और छात्रावासों को जोड़ने वाला 1 Gbps फाइबर-ऑप्टिक नेटवर्क इस बदलते समय की आवश्यकता को रेखांकित करता है। डिजिटल युग में किसी दूरस्थ गाँव के विद्यार्थी की प्रतिभा उसके पते से नहीं, उसकी क्षमता से पहचानी जानी चाहिए। PM-USHA के अंतर्गत विश्वविद्यालय को आधारभूत संरचना सुदृढ़ करने के लिए सहायता और ₹20 करोड़ का आवंटन इस क्षेत्र की शैक्षिक भूमिका में विश्वास का संकेत है। फिर भी यह याद रखना होगा कि महान विश्वविद्यालय केवल ईंट-पत्थर से नहीं बनते। भवन उनका शरीर हो सकते हैं, लेकिन शिक्षण, शोध और विचार उनकी आत्मा हैं।कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा साइंस, जैव-प्रौद्योगिकी, कम्प्यूटेशनल विधियाँ, डिजिटल मानविकी, उद्यमिता और कौशल आधारित शिक्षा आज उच्च शिक्षा के नए क्षितिज हैं। राजेंद्र विश्वविद्यालय को इन क्षेत्रों से जुड़ना होगा, लेकिन केवल तकनीक अपनाना पर्याप्त नहीं होगा। असली चुनौती यह है कि तकनीक को स्थानीय जरूरतों से कैसे जोड़ा जाए। क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता किसानों की मदद कर सकती है? क्या डेटा विज्ञान प्रवासन को समझने में सहायक हो सकता है? क्या डिजिटल तकनीक जनजातीय भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित कर सकती है? ऐसे प्रश्न विश्वविद्यालय के शोध को समाज से जोड़ेंगे।ज्ञान का भविष्य सहयोग में भी निहित है। राजेंद्र विश्वविद्यालय और IIT भुवनेश्वर के बीच हुआ समझौता-ज्ञापन उन्नत शोध, नवाचार, संकाय विकास और विद्यार्थियों को अत्याधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण अवसर प्रदान कर सकता है। भविष्य में देश और विदेश के श्रेष्ठ संस्थानों के साथ ऐसे सहयोग बढ़ाने होंगे, लेकिन हर सहयोग की सार्थकता इसी बात से तय होगी कि उसका लाभ अंततः विश्वविद्यालय की कक्षा, प्रयोगशाला और विद्यार्थी तक कितना पहुँचता है।राजेंद्र की यात्रा अनेक शिक्षकों, प्रशासकों और कुलपतियों के सामूहिक योगदान से बनी है। विश्वविद्यालय बनने के प्रारंभिक चरण में प्रो. दीपक कुमार बेहरा ने नेतृत्व प्रदान किया। अप्रैल 2021 में प्रो. उमा बल्लभ महापात्र ने प्रथम नियमित कुलपति के रूप में कार्यभार संभाला और अप्रैल 2026 में मैंने, प्रो. बिभूति भूषण मलिक ने, दूसरे कुलपति के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। नेतृत्व बदलता है, लेकिन संस्था की विरासत बनी रहती है। यह विरासत शिक्षकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों और पूर्व छात्रों की सामूहिक धरोहर है।छठा स्थापना दिवस इसलिए केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि भविष्य के प्रति संकल्प लेने का भी समय है। प्रश्न यह नहीं कि राजेंद्र ने अब तक क्या पाया, बल्कि यह है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हम क्या छोड़कर जाएँगे। हमारा लक्ष्य केवल एक और राज्य विश्वविद्यालय बनना नहीं होना चाहिए। राजेंद्र की जड़ें पश्चिमी ओडिशा में हों, लेकिन उसकी शाखाएँ देश और दुनिया तक फैलें; उसके शोध के प्रश्न स्थानीय हों, लेकिन उनके उत्तर वैश्विक महत्व रखते हों; और उसके विद्यार्थी अपनी मिट्टी से जुड़े रहते हुए दुनिया के किसी भी मंच पर आत्मविश्वास से खड़े हो सकें।राजेंद्र विश्वविद्यालय का आदर्श वाक्य—“आरोह तमसः ज्योति”, अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर आरोहण—इस पूरी यात्रा का सार है। 1944 के इंटरमीडिएट कॉलेज से डिग्री कॉलेज, फिर स्नातकोत्तर शिक्षा, संबद्धता से स्वायत्तता और स्वायत्तता से विश्वविद्यालय तक की यह यात्रा केवल संस्थागत विस्तार नहीं, बल्कि बदलते समाज की ज्ञान-यात्रा है। अब अगला चरण एक ऐतिहासिक संस्था से एक परिवर्तनकारी विश्वविद्यालय बनने का है—ऐसा विश्वविद्यालय जहाँ ज्ञान पुस्तकों में बंद न रहे, शोध समाज की समस्याओं के समाधान तक पहुँचे और पश्चिमी ओडिशा का युवा यह महसूस करे कि उसके सपनों की कोई भौगोलिक सीमा नहीं है।महाराजा राजेंद्र नारायण सिंह देव ने जिस समय शिक्षा का दीप जलाया था, वह आज ज्ञान के बड़े प्रकाश-पुंज में बदल चुका है। उन्होंने बीज बोया, पीढ़ियों ने उसे सींचा और आज हमारी जिम्मेदारी है कि उसकी छाया को और विस्तृत करें। संस्थापकों ने दृष्टि दी, शिक्षकों ने ज्ञान दिया, विद्यार्थियों ने ऊर्जा दी और पूर्व छात्रों ने प्रतिष्ठा। अब हमारी बारी है कि इस विरासत को पश्चिमी ओडिशा के नए बौद्धिक भविष्य में बदलें।

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