काशी की मिट्टी से निकला वह शब्द, जो दिल्ली तक बनारसी बना रहा

Share

किसी पत्रकार को उसके जन्मदिन पर बधाई देना महज औपचारिक शुभकामना नहीं होती। खासकर तब, जब वह पत्रकार अपने समय का केवल साक्षी न रहा हो, बल्कि समय को शब्द देने वाला भी रहा हो। डॉ. हेमंत शर्मा को जन्मदिन की बधाई देना इसलिए भी सुखद है कि उनके व्यक्तित्व में पत्रकार की पैनी नजर, लेखक की संवेदनशीलता और बनारसी आदमी की बेफिक्री—तीनों एक साथ दिखाई देते हैं। को बनारस में जन्मे हेमंत शर्मा आज चौसठ वर्ष पूरे कर 65वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। वैसे सरकारी हिसाब से कहें तो वे 64 के हुए हैं, लेकिन बनारस की चकाचक बनारसी की भाषा में कहें तो ‘सठियाये हुए चार साल’ हो गए! उम्र का यह मुहावरा अपने आप में जितना शरारती है, हेमंत शर्मा के व्यक्तित्व पर उतना ही फबता है। क्योंकि सठियाने की उम्र भले आ गई हो, लेकिन जिज्ञासा अभी जवान है, स्मृतियां अभी ताजा हैं और समसामयिक घटनाओं को पकड़ने वाली उनकी नजर में अब भी वही चमक है।आखिर हेमंत शर्मा को उम्र के अंकों में बांधा भी कैसे जा सकता है? उनके लिए समय शायद कैलेंडर पर बदलता है, भीतर नहीं। उम्र बढ़ती है, लेकिन सवाल पूछने की आदत नहीं जाती; अनुभव बढ़ता है, लेकिन जिज्ञासा कम नहीं होती। शायद यही किसी पत्रकार के जीवित और प्रासंगिक बने रहने की सबसे बड़ी निशानी है।read more:https://pahaltoday.com/demand-to-remove-government-country-liquor-shop-villagers-stage-protest-at-the-collectorate/#google_vignette

‘अस्सी’ के राय साहब

हेमंत शर्मा के व्यक्तित्व को समझने के लिए उनकी किताब ‘अस्सी के राय साहब’ का नाम ही काफी है। अस्सी काशी का केवल एक इलाका नहीं, अपने आप में एक दर्शन है—फक्कड़पन, बेबाकी, आत्मीयता, ठसक, ठिठोली और जीवन को उसकी पूरी मस्ती के साथ जीने का अंदाज। यह शीर्षक अस्सी के राय साहब जिसमें मोहल्ला और राम बहादुर राय दोनों का जुड़ाव है।

हेमंत शर्मा में काशी का यही मिजाज दिखाई देता है।

दिल्ली ने उन्हें बड़े पद दिए, पत्रकारिता ने बड़ी जिम्मेदारियां दीं, देश ने उन्हें सम्मान दिया, लेकिन दिल्ली उन्हें पूरी तरह दिल्लीवाला नहीं बना सकी। उनके भीतर का बनारस अब भी जीवित है। वह बनारस जो अपने आदमी को देखकर पहले गले मिलता है, बाद में पूछता है—‘का हाल बा?’

इसीलिए उन्हें जानने वाले लोग उन्हें उनके बड़े पदों से कम और प्यार के नाम ‘छोटू’ से ज्यादा पहचानते हैं।

कुछ रिश्ते खबरों से नहीं, स्मृतियों से बनते हैं

हेमंत जी से मेरा परिचय केवल एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में नहीं रहा। उनके परिवार से मेरा आत्मीय संबंध मेरे पारिवारिक मित्र डॉ. एस.एस. गांगुली के माध्यम से बना। उन दिनों हेमंत जी होली, दीपावली और दूसरे प्रमुख त्योहारों पर कबीरचौरा स्थित अपने आवास पर आते थे। डॉ. गांगुली के साथ मैं भी कई वर्षों तक उनके घर जाता रहा।

धीरे-धीरे आने-जाने का वह सिलसिला औपचारिक परिचय से निकलकर आत्मीय रिश्ते में बदल गया। उनके घर के समारोहों में जाना, परिवार के लोगों से मिलना और उन आयोजनों का हिस्सा बनना एक सहज पारिवारिक अनुभव जैसा था।

उन दिनों उनके पिता जी के एस. भारतीय पुरस्कार, पुस्तक विमोचन और जन्मदिन सहित अनेक अवसरों का मैं साक्षी ही नहीं, बल्कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार सक्रिय सहभागी भी रहा। कई बार ‘आज’ और ‘अमर उजाला’ के संपादकीय पृष्ठों पर पापा जी के इंटरव्यू और आलेख प्रकाशित कराने में भी मैंने अपना सहयोग दिया। हालांकि इन प्रकाशनों के वास्तविक सूत्रधार तो स्वयं ‘छोटू जी’ ही थे। संबंधों की जो पूंजी उनके पास थी, वही कई बार किसी खबर या आलेख के लिए सबसे मजबूत सिफारिश बन जाती थी।

रिश्तों की यही गर्माहट का संस्मरण

एक बार बड़े भाई शरद शर्मा जी ने परिवार के एक सदस्य के इलाज के लिए मुझसे डॉक्टर एस.के. अग्रवाल से संपर्क कराने को कहा। मैंने उनसे कहा कि डॉक्टर साहब से मेरी व्यक्तिगत मुलाकात तो नहीं हुई है, लेकिन उनके फोन आते रहते हैं और उनकी नई खोजों तथा चिकित्सकीय सलाह को मैं समाचार पत्रों में प्रकाशित कराने में सहयोग करता रहता हूं। इसलिए संभव है कि वे मुझे जानते हों।

शरद जी ने पूछा—‘क्या वे घर पर देख सकते हैं?’

मैंने डॉक्टर साहब से बात की। वे निजी प्रैक्टिस नहीं करते थे। फिर भी मेरे अनुरोध पर उन्होंने कहा कि जब भी आना हो, फोन कर दीजिएगा, शाम चार बजे के बाद वे घर पर मिल जाएंगे।

यह मेरे लिए केवल एक चिकित्सकीय सहायता नहीं थी। उन्होंने मेरे आग्रह को जिस सहजता से स्वीकार किया और पूरे मनोयोग से मरीज को देखा, दवा लिखी और परामर्श दिया, उसने रिश्ते को एक और अर्थ दे दिया।

शायद रिश्तों की खूबसूरती यही है—वे कभी एक घटना से बनते हैं, कभी एक फोन से, कभी एक छोटी-सी मदद से और फिर स्मृतियों में वर्षों तक बने रहते हैं।

इसके बाद हेमंत जी के परिवार के हर समारोह की सूचना मुझे विशेष रूप से मिलती रही और मैं भी यथासंभव उनमें शामिल होता रहा।

लेकिन जिंदगी की अपनी गति होती है।

हेमंत जी की व्यस्तताएं बढ़ती गईं। हमारी मुलाकातें सिमटती गईं। फिर एक समय ऐसा आया कि उनके आने-जाने की खबरें भी पहले की तरह नहीं मिलतीं। मुलाकात का वह सिलसिला जैसे धीरे-धीरे अपने स्वाभाविक अवसान तक पहुंच गया।

फिर भी कुछ रिश्ते मुलाकातों के मोहताज नहीं होते।

आज जब फेसबुक पर हेमंत जी की कोई पोस्ट पढ़ता हूं, कोई टिप्पणी सुनता हूं या किसी समसामयिक विषय पर उनकी बात देखता हूं तो एक अजीब-सी आत्मीयता भीतर जागती है। लगता है कि भले ही स्मृतियों की गलियों में हम कुछ दूर हो गए हों, लेकिन कहीं न कहीं अभी भी साथ-साथ चल रहे हैं।
जनसत्ता से दिल्ली तक—खबर के पीछे समाज को पढ़ने की यात्रा

अब बात हेमंत शर्मा की पत्रकारिता यात्रा की।

जनसत्ता से शुरू हुई उनकी पत्रकारिता ने उन्हें उत्तर प्रदेश के समाज और राजनीति को बहुत करीब से देखने का अवसर दिया। लंबे समय तक राज्य संवाददाता के रूप में उन्होंने राजनीति को केवल विधानसभाओं, राजनीतिक दलों और सत्ता के गलियारों से नहीं देखा; उन्होंने उसके पीछे के समाज को भी पढ़ा।

राजनीति उनके लिए केवल नेताओं के बयान नहीं रही। वह उसके पीछे की बेचैनी, आकांक्षा, जातीय-सामाजिक संरचना, इतिहास और बदलते जनमानस को भी पढ़ते रहे।

लखनऊ की संपादकी से होते हुए जब वे दिल्ली पहुंचे तो उनका कद केवल पद से नहीं, अनुभव से बड़ा हो चुका था। टेलीविजन पत्रकारिता में प्रवेश के बाद भी उनकी लेखकीय दृष्टि कहीं पीछे नहीं छूटी।

आज TV9 नेटवर्क में महत्वपूर्ण दायित्व निभाते हुए भी उनके भीतर का पत्रकार वही है—घटना को देखकर रुक जाने वाला नहीं, बल्कि यह पूछने वाला कि घटना के पीछे क्या है, उसका अर्थ क्या है और उसका असर कहां तक जाएगा।

राजनीति की रिपोर्टिंग में अपनी अलग लकीर

राजनीति की रिपोर्टिंग में हेमंत शर्मा की अपनी शैली है। वे राजनीति को केवल नेताओं के बयानों में नहीं तलाशते। उनके लिए राजनीति के पीछे का समाज, समाज के पीछे की आकांक्षा और आकांक्षा के पीछे की बेचैनी अधिक महत्वपूर्ण है।

इसीलिए समसामयिक विषयों पर उनका बोलना या लिखना महज टिप्पणी नहीं रह जाता। उसमें इतिहास की स्मृति भी होती है, वर्तमान की धड़कन भी और भविष्य की आहट भी।

उनकी बात में पत्रकार का तथ्य होता है, लेखक का विवेक होता है और बनारसी आदमी की वह सहज मुस्कान भी, जो सबसे गंभीर बात को भी बोझिल नहीं होने देती।

जब पत्रकार के भीतर लेखक जागता है

हेमंत शर्मा के यहां पत्रकारिता और साहित्य दो अलग-अलग धाराएं नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे में घुली हुई हैं।

उनकी पुस्तकों—‘युद्ध में अयोध्या’, ‘अयोध्या का चश्मदीद’, ‘तमाशा मेरे आगे’, ‘द्वितीयोनास्ति’ और ‘एकदा भारतवर्षे’—को पढ़ते हुए लगता है कि समाचार लिखने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे कथा कहने लगा है।

उनके लेखन में घटनाएं हैं, लेकिन घटनाओं के पीछे मनुष्य भी है। इतिहास है तो उसकी धड़कन भी है। राजनीति है तो उसका सामाजिक चेहरा भी है।

उनकी लेखनी की सबसे बड़ी खूबी शायद यही है कि वह संदर्भों को बोझ नहीं बनने देती। कठिन विषय भी उनके यहां किस्से की तरह खुलता है और किस्सा धीरे-धीरे इतिहास की खिड़की में बदल जाता है।

और फिर—‘छोटू’

लेकिन इन सबके बीच हेमंत शर्मा का एक दूसरा परिचय है, जो शायद सबसे आत्मीय है—‘छोटू’।

दिल्ली के बड़े मीडिया संस्थान का वरिष्ठ पदाधिकारी जब काशी के किसी अपने से मिलता है तो जैसे पद की नेमप्लेट पीछे छूट जाती है। सामने रह जाता है वही बनारस का आदमी।

गले मिलना, ठहाका लगाना, पुरानी बात छेड़ देना, उसी सहज अंदाज में बतियाना—मानो दिल्ली की दूरी कुछ थी ही नहीं।

काशी के लोगों से मिलते समय उनके भीतर का बचपन जैसे अचानक जाग जाता है।

और शायद मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वह बड़ा होते-होते अपने भीतर के बच्चे को मरने न दे।

काशी को साथ लेकर चलने वाला आदमी

हेमंत शर्मा की यात्रा काशी से लखनऊ और लखनऊ से दिल्ली तक की जरूर है, लेकिन यह केवल भौगोलिक यात्रा नहीं है।

उन्होंने शहर बदले, संस्थान बदले, जिम्मेदारियां बदलीं, लेकिन अपनी मिट्टी नहीं बदली।

उनके भीतर का बनारस आज भी जिंदा है—कभी शब्द बनकर, कभी ठहाका बनकर, कभी स्मृति बनकर और कभी किसी पुराने मित्र को देखते ही अचानक गले लग जाने की आत्मीयता बनकर।

यही कारण है कि उनके व्यक्तित्व में एक साथ दो संसार दिखाई देते हैं—एक वह जो दिल्ली के बड़े मीडिया संस्थान की जिम्मेदारियों को संभालता है और दूसरा वह जो बनारस की गलियों में आज भी ‘छोटू’ कहलाने में संकोच नहीं करता।

चौसठ के हेमंत और सठियाये चार साल

चौसठ का आंकड़ा अपने आप में कुछ नहीं कहता। असली बात यह है कि इन चौसठ वर्षों में आदमी ने कितना देखा, कितना जिया, कितना लिखा और कितनी स्मृतियां दूसरों के हिस्से में छोड़ीं।

हेमंत शर्मा ने अपने हिस्से का समय केवल जिया नहीं, उसे दर्ज भी किया है।

इसलिए उनके जन्मदिन पर उम्र का हिसाब लगाते हुए बनारसी शरारत से यही कहा जा सकता ह
चौसठ के हो गए हेमंत!
यानी सठियाये हुए चार साल!

मगर ये चार साल भी बड़े काम के हैं—इनमें अनुभव की धूप है, स्मृतियों की छांव है, पत्रकारिता की तपिश है और लेखन की वह चमक है जो उम्र के साथ मंद नहीं, और गहरी होती जाती है।

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि हेमंत शर्मा की यात्रा केवल एक पत्रकार की यात्रा नहीं है। यह उस बनारसी आदमी की यात्रा है जिसने महानगरों को देखा, सत्ता के गलियारों को देखा, इतिहास के निर्णायक क्षणों को देखा, लेकिन अपने भीतर के बनारस को बचाए रखा।

शायद इसी को कहते हैं—बड़ा होना, मगर अपना न छूटना।

जन्मदिन पर उनसे बस यही कहना है—

हेमंत जी, आपकी कलम में काशी की गंगा की रवानी बनी रहे, आपकी भाषा में अस्सी की फक्कड़ी बनी रहे, आपकी दृष्टि में पत्रकार की पैनी धार बनी रहे और आपके भीतर का ‘छोटू’ कभी बूढ़ा न हो।

मुलाकातें भले कम हो गई हों, रास्ते भले अलग हो गए हों, स्मृतियों के दरवाजे बंद नहीं होते।

फेसबुक की किसी पोस्ट में, किसी किताब के पन्ने में, किसी टेलीविजन स्क्रीन पर आपकी आवाज सुनाई देती है तो लगता है—अरे, छोटू अभी वहीं है; बस बनारस से दिल्ली तक उसकी यात्रा थोड़ी लंबी हो गई है।

जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई, हेमंत जी।

काशी के इस अपने ‘छोटू’ को उम्र के 64वें पड़ाव पर स्नेह, सम्मान और आत्मीय शुभकामनाएं।

डॉ. सुनील कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर, जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग
वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *