जिन्होंने पतंजलि योगपीठ में ज्ञान गंगा और धर्म गंगा का आवाहन कर अपनी श्रद्धा और तप से उन्हें जीवन्त रूप में प्रवहमान कर रखा है, ऐसे परमपूज्य स्वामी रामदेव जी को साष्टांग प्रणाम। सनातन धर्म के सभी परमपूज्य जगद्गुरू शंकराचार्यों तथा अन्य सभी जगद्गुरूओं, पूज्य संतों एवं आचार्यों, विद्वान मनीषियों और सभी साधक साधिकाओं को सादर प्रणाम। आज सनातन धर्म को लेकर अधिकारी महापुरूषों ने प्रामाणिक वक्तव्य दिये है। जिन पूज्य ज्ञानियों के उपदेशों और जिनकी लिखी टीकाओं तथा ज्ञान ग्रंथों के आधार पर हम शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करते है, उनके समक्ष उस विषय पर कुछ कहने का मैं अधिकारी नहीं हूँ। वह सब ज्ञान प्राप्त कर तथा प्रबोधन सुन कर मैं स्वयं को धन्य अनुभव कर रहा हूँ। उस विषय में दुष्टों और अधर्मियों के द्वारा किये जा रहे प्रोपेगंडा को दंडित करना भारत शासन का कर्तव्य है। पूज्य आचार्यों और संतों ने उस विषय में जो भी निर्णय लिये है और लेगें, उनका पालन करना हम सबका कर्तव्य है। परन्तु इसके अतिरिक्त यहां उठे प्रसंगों पर मुझे कुछ निवेदन करना है। हमारे विविध सम्प्रदायों के बीच जो वैचारिक और आध्यात्मिक विवेचनाओं में भिन्नता व्यक्त होती है, वह ज्ञानात्मक गहराई के लिए आवश्यक विमर्श है। उसे मतभेद समझना सही नहीं है। मतभेद क्या होता है और कितने भयंकर रूपों में उसके परिणाम सामने आते है, यह देखने के लिए ईसाइयत का और यूरोप का इतिहास जानना आवश्यक है। इसी प्रकार पैगम्बर मुहम्मद के अनुयाईयों के बीच मतभेद कितने विकराल रूप लेते है, यह जानना उपयोगी होगा। ईसाइयों में केवल उनकी ट्रिनिटी की धारणा को लेकर अथवा बाइबिल के कुछ वचनों के अर्थों को लेकर जो भयंकर मतभेद कैथोलिकों और प्रोटेस्स्टेंर्टों तथा अन्य विविध चर्चों के मध्य उभरे, उसका इतिहास हमारे धर्माचार्य सामान्यतः नहीं जानते। पूज्य स्वामी रामदेव जी जैसे विरले संत थोड़ा-थोडा जानते है। अगर हमारे लोग उन मतभेदों के भयंकर परिणामों को जान जाये, जिनमें एक चर्च के अनुयायी दूसरे चर्च के अनुयायियों के गांव के गांव और मोहल्ले के मोहल्ले जलाकर फूंक देते थे या एक दूसरे की खोपडियों से खेलते थे या ईश्वर के दोष का अपराध हर स्त्री पर स्थिर रूप से मानते हुए उसे पुरूषों के द्वारा निरंतर दमन और दंड तथा नियंत्रण के योग्य मानते थे अथवा जेनेटिक्स की एक धारणा का दुरूपयोग कर यह मानते थे कि गॉड ने सब जीवों और जन्तुओं को तो जोडे से बनाया, परन्तु गॉड जो एक वृद्ध पुरूष मात्र हैं, उन्होंने अपनी ‘इमेज’ में केवल ‘‘मेन’’ को बनाया और फिर ‘‘मेन’’ को उदास देखकर उसकी पसली खीचकर उसी से ईव को रचा इसलिए वह सृष्टि के मूल विचार में उपस्थित नहीं थी और इसलिए वह कभी भी मेन के समकक्ष नहीं हो सकती अपितु उसके अधीन रहना ही उसकी नियति है। साथ ही यह भी मानते रहे है कि आत्मा केवल मेन के भीतर होती है क्योंकि गॉड ने उसे अपनी इमेज में बनाया है।शेष समस्त स्त्रियां तथा समस्त प्राणी आत्मा विहीन होते है, ऐसी-ऐसी भयंकर धारणाएं ईसाई चर्च ने फैलाई, यह हमारे आचार्य नहीं जानते। इसी प्रकार कितने भयंकर अंध विश्वास और भूत प्रेतों में ईसाइयों को अटल श्रद्धा है, यह भी हमारे आचार्य नहीं जानते। इस्लाम में तो जिन्न, जिन्नात और तरह-तरह के भूत प्रेत के बारे में विश्वास और मान्यताएं भरी पडी है। हमारे लोग वह न जान पाये और कभी उनकी चर्चा भी न कर पाये, इसके लिए वे हिन्दू धर्म के नाम पर फैला हुआ अगर कहीं कोई छोटा सा भी अटपटा विचार मिलता है जो आधुनिक मनुष्य को विवेकपूर्ण नहीं लगता तो मानों दूरबीन से देख-देखकर उसका ही प्रोपेगेंडा करते है। हमारे लोग भी उससे दवाब में आ जाते है। अगर उन्हें ईसाइयत और इस्लाम के इन भांति-भांति के विचारों और मान्यताओं का ज्ञान हो तो उनके सामने हिन्दू धर्म का उपहास करने वाले एक क्षण को भी खड़े नहीं हो पायेगें और कभी सिर उठाकर देखने की हिम्मत नहीं कर पायेगें। अतः हमें विश्व के विषय में अधिक से अधिक जानना चाहिए। यह जानना चाहिए कि ईसाइयत के अमानवीय और भीषण विचारों के कारण ही यूरोप के तीन चौथाई लोगों ने उसके प्रति विमुखता अपनाई है और आज यूरोप में आस्थावान फेथफुल क्रिश्चियन केवल 20 से 25 प्रतिशत ही है। लोगों ने मध्ययुगीन आस्थाओं का परित्याग ही कर दिया है। समस्त महत्वपूर्ण वैज्ञानिक यूरोप में चर्च के विरोधी रहे है या चर्च से उदासीन रहे है। सभी बडे यूरोपीय दार्शनिक भी ऐेसे ही चर्च विरोधी या चर्च से उदासीन रहे है। यह सब न जानने के कारण हमारे लोग भारत में चर्च के पादरियों के बारे में भारी भ्रांति रखते है। उस विषय में सत्य ज्ञान का प्रसार भारतीय शिक्षा का कर्तव्य है परन्तु यह कर्तव्य 80 वर्षों में आज तक नहीं किया गया। जहां तक इस्लाम की बात है, उसके अनुयायी किस तरह आपस में शिया.सुन्नी, वहाबी, अहमदिया आदि पंर्थों के भेद से एक दूसरे का सर्वनाश करने को उन्मत्त रहते है, यह तो विश्व के सामने ही है। हूती और अरब या ईरान और ईराक आदि आपस में कैसे एक दूसरे को खत्म कर देने के लिए तत्पर रहते है, यह सारा संसार देख ही रहा है। दूसरी ओर जब कोई सत्यनिष्ठ, धर्मनिष्ठ ज्ञानी और तपस्वी सन्या सी पूज्य स्वामी रामदेव जी जैसा सनातन धर्म के लिए एकत्र होकर ज्ञानमय विमर्श का आव्हान करता है तो कैसे सभी महत्वपूर्ण पंर्थों और सम्प्रदाय के शीर्ष आचार्य और पूज्य संत सहज ही उमड पडते है और आत्मीय संवाद करते है यह हम दो दिन से देख ही रहे है। यह केवल हिन्दू धर्म की, सनातन धर्म की विशेषता है। इसे जानना चाहिए। इसके स्थान पर ज्ञानात्मक विमर्श में उभरी दृष्टियों की विभिन्नता को कोई चिंता योग्य मतभेद मान बैठना विश्वि के विषय में गैर जानकारी का परिणाम है।read more:https://pahaltoday.com/manveer-singh-arrested-near-nepal-border-sent-to-punjab-under-tight-security/संसार के समक्ष हिन्दू समाज आज भी सर्वाधिक संगठित और एकात्म समाज है। इसमें परस्पर दृष्टिभेद और अभिव्यक्ति भेद मानवीय लक्षण है। मनुष्यों में ये भिन्नताएं स्वाभाविक है। उन्हें अतिरंजित करके देखना सही नहीं है। यह हम पर चर्च के प्रोपेगडा का प्रभाव है जो हम लोग इन स्वाभाविक भिन्नताओं को कोई गंभीर मतभेद मान बैठते है। हिन्दू धर्म से अधिक आध्यात्मिक और समतामूलक संसार में कोई भी रिलीजन या मजहब नहीं है। धर्म तो सनातन धर्म के अतिरिक्त और कुछ होता ही नहीं। वस्तुतः हमारी मुख्य समस्या कुछ और ही है। 15 अगस्त, 1947 के बाद यह पहली बार हुआ है कि भारत के शासकों ने सनातन धर्म को संरक्षण देने को अपना परम धर्म घोषित नहीं किया है। 15 अगस्त 1947 तक जितने भी हिन्दू राज्य थे जो लगभग 500 थे उन सब में सनातन धर्म का संरक्षण ही राज धर्म रहा है। 90 वर्षों तक लगभग आधे भारत में अंग्रेजों का प्रभाव रहा परन्तु वहां भी हिन्दू धर्म को संरक्षण देने की घोषणा ब्रिटिश शासन करता रहा। यह अवश्य हुआ कि उसने साथ ही मुसलमानों के संदर्भ में इस्लाम को भी संरक्षण देने की तथा ईसाइयों के संदर्भ में ईसाइयत को भी राज्याश्रय देने को अपना कर्तव्य बताया। परन्तु हिन्दुओं के लिए अंग्रेज भी हिन्दू धर्म का ही पालन स्वाभाविक मानते थे और उसको विचिक स्थान प्राप्त था। परन्तु 1947 के बाद के हमारे शासकों ने बिना राष्ट्र की अनुमति लिये हिन्दू धर्म का विधिक अस्तित्व विलुप्त कर दिया। हिन्दू समाज नामक किसी समाज की पहचान संविधान में की ही नहीं गई है। इससे उलट इस्लाम और ईसाइयत आदि को अल्पसंख्यक कहकर उनकी विधिक पहचान सुनिश्चित कर दी गई है और उनकी मजहबी किताबों की शिक्षा भी सरकारी खर्चें पर दी जाती है तथा उसे विधिक मान्यता प्राप्त है। जबकि हिन्दुओं को केवल व्यक्ति के रूप में नागरिक अधिकार दिये गये है। हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज के लिए कोई विधिक महत्व और स्थान स्पष्ट रूप से चिन्हित और सुरक्षित नहीं किया गया है। हिन्दू व्यक्तियों को ईसाइयों के एंग्लो-सेक्सन कानून व्यवस्था के अंतर्गत ले आया गया है। उसे ही भारतीय विधि व्यवस्था के रूप में अपना लिया गया है। इस प्रकार हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म का स्पष्ट और घोषित विधिक अस्तित्व चुपके से विलुप्त कर दिया गया है बिना किसी स्पष्ट घोषणा के। यह बहुत ही दुख और चिंता की बात है कि हमारे किसी भी बडे आचार्य ने या किसी बडे प्रसिद्ध बौद्धिक ने इस भयंकर स्थिति की कभी चर्चा तक नहीं की। सम्पूर्ण भारतीय इतिहास में शासकों का काम सनातन धर्म शास्त्रों के अनुरूप राज्य व्यवस्था संचालित करना और लोक व्यवस्था तथा लोक व्यवहार सुनिश्चित करना रहा है। परन्तु विगत 80 वर्षों से यह कार्य नहीं हो रहा है। यह हमारे समय की सबसे बडी समस्या है। अपने-अपने समाज की आस्थाओं और मान्यताओं को ही संसार भर में विधि ‘’लॉ” का मूल स्रोत (सोर्स) और आधार माना जाता है। परन्तु भारत में 80 वर्षों से यह अमान्य है। शास्त्रों के अनुसार शासन का कार्य सनातन धर्म का पालन सुनिश्चित करना है। यूरोप में पिछले 150 वर्षों से पहली बार समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र और वित्त शास्त्र व्यवस्थित रूप से विकसित हुए है। इन 150 वर्षों में विकसित विविध मतवादों – कम्युनिज्म, सोशलिज्म, नेशनलिज्म आदि में आस्था रखने वाले राजनैतिक समूह अपने मन से मनमाने कानून बनाये, यह शास्त्रों के अनुसार धर्ममय नहीं हैं अपितु अधर्ममय है। हमारे पूज्य आचार्यों को ये सब प्रश्न लोक में उपस्थित और उपदेशित करना चाहिए, यह मेरा पूज्य चरणों में विनम्र निवेदन है।हमारे लोग यह तथ्य तक नही जानते कि यूरोप में ईसाइयत के दौर में 17वीं शताब्दी तक कोई व्यवस्थित ज्यूरिस्प्रुडेंस नहीं रहा है। 18वीं शताब्दी ईस्वी में कतिपय जर्मन विद्वान मनु स्मृति की एक पांडुलिपि ले गये। उसके आठवे अध्याय में व्यवहार पदों का जो वर्गीकरण है, उसके आधार पर ही पहले जर्मनी में फिर उनसे चुरा कर इंग्लैण्ड और फ्रांस आदि में उसी के अनुसरण में ज्यूरिस्प्रुडेंस विकसित हुआ। लोक व्यवहार में जितने प्रकार के वाद संभव है, उनका सबका निरूपण मनु स्मृति के व्यवहार पदों में है। कौटिल्य यांज्ञवल्क्य आदि ने भी उन्हीं व्यवहार पदों का प्रतिपादन किया है। उन पर टीकाएं 19वीं सदी ईस्वी तक भारत में होती रही है। आचार्य नीलकंठ शास्त्री ,कमलाकर भट्ट, काशीनाथ उपाध्याय, आचार्य बालम्भट्ट आदि आचार्यों की 17वीं से 19वीं शताब्दी ईस्वी तक की गई टीकाएं राज्य के द्वारा संरक्षण पाती रही है। उन्हीं के अनुसार न्याय व्यवस्था चलती रही है। परन्तु वर्तमान शासन हिन्दुओं के जीवन को एंग्लों सेक्सन लॉ से अनुशासित रखता है और धर्म शास्त्रों की केन्द्रीय विधिक स्थिति नहीं है। चर्च की शिक्षा से प्रभावित हमारे विधिक अधिकारी कभी किसी संदर्भ में भले उनका संदर्भ भी ले ले। यह हिन्दू जीवन के इतिहास में अपवाद स्थिति है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। हमारे पूज्य आचार्यों तथा विद्वानों को यह तथ्य लोक के समक्ष उपस्थित करना चाहिए। विरोधियों द्वारा प्रचारित बातों को अपनी केन्द्रीय चिंता का विषय नहीं बनाना चाहिए। अगर कालक्रम में कभी किसी ने टीका या भाष्य के रूप में अथवा श्लोक आदि के रूप में श्रुति और स्मृति के प्रतिपादनों के विरूद्ध कोई बात कही कह दी हो तो उसे हटाना या उसे महत्वहीन घोषित करना बहुत कम समय में ही हो जाने वाला काम है। वह कोई केन्द्रीय समस्या नहीं है। इतना ही निवेदन है।