कस्बे के सबसे पुराने सिद्ध हनुमान मंदिर के मुख्य सिंहद्वार की सीढ़ियों के किनारे पत्थर के भारी खंभे के पास लोहे का एक पुराना और घिसा हुआ दाव पिछले बीस सालों से जमीन में गड़ा हुआ था। उसका भारी मुड़ा हुआ फल बरसों की रगड़ और बारिश की मार से मटमैला हो चुका था पर उसकी धार पर आज भी नारियल की सूखी जटाओं के रेशे लिपटे रहते थे। मंदिर के ट्रस्टियों ने उस लोहे के औजार के चारों तरफ पीले गेंदे के फूलों की एक ताज़ा माला लपेट दी थी। उस खंभे के ठीक बगल में फटी बोरी बिछाकर हर सुबह सात बजते ही सोमेश्वर काका अपनी लकड़ी की लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का धोती-कुर्ता पहने और आँखों पर गोल पीतल की कमानी का चश्मा चढ़ाए सोमेश्वर काका दिन भर उस लोहे के दाव को अपनी कांपती उँगलियों से सहलाते रहते थे। मंदिर में सुबह से ही दर्शनार्थियों की लंबी कतारें लग रही थीं, बड़े-बड़े सेठ सवा सौ नारियल फोड़ने की मन्नतें पूरी कर रहे थे और पुजारियों के मंत्रोच्चार से पूरा परिसर गूँज रहा था। उन नए श्रद्धालुओं और नारियल की मिठाई बाँटते व्यापारियों को उस कोने में गड़े लोहे के पुराने औजार से कोई सरोकार नहीं था। मंदिर का पुराना पानीवाला सुखिया जब भी पीतल की बाल्टी लेकर सीढ़ियाँ धोता तो काका की उस शांत मूरत को देखकर सहम जाता था। काका बहुत ही कांपती आवाज में उससे पूछते “क्यों रे सुखिया आज नारियल दिवस के इस बड़े मेले में इस पुराने दाव से किसी किसान का सूखा जटादार नारियल छिला क्या या आज भी सिर्फ वीआईपी भक्तों की गाड़ियों पर ही प्रसाद चढ़ाया जा रहा है?” सुखिया बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।मंदिर प्रबंधन में हाल ही में राजधानी के बड़े धार्मिक न्यास बोर्ड से नए मुख्य प्रशासक के रूप में नियुक्त होकर आए साहब राघवेंद्र शर्मा बहुत ही कड़क, आधुनिक प्रबंधन के विशेषज्ञ और मंदिर के अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। राघवेंद्र साहब जब भी अपनी चमकती हुई फाइलों के साथ वीआईपी दर्शन गैलरी का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी सीढ़ी के किनारे बैठे सोमेश्वर काका पर जाकर अटक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस लोहे के दाव पर टिकी रहती थीं। राघवेंद्र साहब को विश्व नारियल दिवस के इतने बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव के बीच किसी बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक पुराने औजार के आगे हाथ जोड़ना अंधविश्वास और मंदिर की भव्यता को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय महाभोग का मुख्य सत्र समाप्त हुआ और बड़े यजमान वातानुकूलित अतिथि कक्ष में भोजन के लिए चले गए तो राघवेंद्र साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे सोमेश्वर काका के पास पहुँच गए। राघवेंद्र साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य द्वार की सुंदरता क्यों बिगाड़ रहे हैं, अगर आपको कोई अन्नक्षेत्र का टोकन या बुढ़ापा पेंशन की सिफारिश चाहिए तो भीतर दफ्तर में जाकर बाबू से मिलिए, इस तरह बाहर बैठकर जमीन में गड़े एक पुराने कबाड़ लोहे को घूरने से भगवान आपको मोक्ष नहीं दे देंगे।” सोमेश्वर काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “प्रशासक बाबू मैं किसी मुफ़्त के भोजन या पेंशन के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस लोहे के दाव पर वह खोया हुआ संकल्प लौटेगा जो किसी जमाने में इसी मंदिर की चौखट पर मुझसे छीना गया था।”राघवेंद्र साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोए हुए संकल्प की बात कर रहे हैं, मंदिर ट्रस्ट तो हर साल लाखों रुपए के नारियल खरीदकर गरीबों में प्रसाद बाँटता है, फिर आपके इस पुराने लोहे के औजार का क्या रहस्य है?”read more:https://pahaltoday.com/villagers-upset-over-garbage-dumping-staged-a-protest-at-the-district-collectorate/ पास खड़े वयोवृद्ध ज्योतिषी पंडित विद्याधर जी जो पिछले चालीस सालों से उस मंदिर के हर उतार-चढ़ाव और इतिहास के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “प्रशासक साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस कस्बे में पहली बार विशाल नारियल बागवानी मिशन की शुरुआत हुई थी तब काका के इकलौते बेटे दामोदर ने इसी चबूतरे पर खड़े होकर एक बहुत बड़ा कीर्तिमान रचा था।” राघवेंद्र साहब ने उत्सुक होकर पूछा “दामोदर ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस लोहे के दाव से जुड़ा हुआ है?” पंडित विद्याधर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब दामोदर उस समय पूरे जिले का सबसे बहादुर और परिश्रमी किसान नौजवान था, उसने मंदिर के आसपास की बंजर जमीनों पर नारियल के हजारों पौधे लगाकर गरीब किसानों की सहकारी समिति बनाई थी, उसने अपने हाथों से यह लोहे का दाव बनाकर यहाँ गाड़ा था और कसम खाई थी कि जब तक इस इलाके के अंतिम गरीब किसान को उसके नारियल की पूरी कीमत नहीं मिल जाएगी तब तक वह किसी बिचौलिए या व्यापारी को मंदिर के किसानों का शोषण नहीं करने देगा।”सोमेश्वर काका ने पंडित जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस दाव के नुकीले सिरे को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे दामोदर ने उस दिन इस खंभे के पास खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह दाव केवल लोहा नहीं बल्कि इस माटी के पसीने का स्वाभिमान है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से राष्ट्रीय नारियल बोर्ड का सबसे बड़ा किसान अधिकार पत्र लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस दाव से पहला श्रीफल छीलकर भगवान को चढ़ाएगा और अपने हाथों से मुझे अपनी नई सहकारी मिल की गद्दी पर बैठाएगा।” राघवेंद्र साहब ने बहुत ही भावुक होकर पूछा “तो क्या बीस सालों में दामोदर वह अधिकार पत्र लेकर वापस नहीं लौटा, क्या वह शहर जाकर किसी बड़े पद के अहंकार में अपने इस बूढ़े बाप और इस छोटे से कस्बे के किसानों को हमेशा के लिए भूल गया?” काका की आँखों में आँसू छलक आए और उन्होंने कहा “नहीं साहब मेरा दामोदर बहुत सच्चा लड़का था, उसने मुझे अपने पहले पत्र में लिखा था कि बापू तुम इस दाव की धार को संभाल कर रखना, जिस दिन देश में नारियल दिवस की असली सार्थकता साबित होगी उस दिन मैं अपनी सबसे बड़ी कामयाबी लेकर तुम्हारे चरणों में आऊँगा।” राघवेंद्र साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने ठान लिया कि वे खुद मंदिर के पुराने गोपनीय अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी पहली सहकारी फाइल और दामोदर की असलियत का पता लगाएंगे।राघवेंद्र साहब तुरंत मंदिर न्यास के रिकॉर्ड रूम में पहुँचे और उन्होंने चपरासी को उस बीस साल पुराने नारियल किसान संघ के पंजीकरण और दामोदर के प्रोजेक्ट की फाइल खोजने का हुक्म दिया। लगभग दो घंटे की कड़ी मशक्कत और धूल भरे बस्तों को खंगालने के बाद आखिरकार वह लाल कपड़े में बंधी पुरानी फाइल मिल गई। जैसे ही राघवेंद्र साहब ने उस फाइल के आखिरी पन्नों को खोला और उसमें लगे सरकारी दस्तावेजों, व्यापारिक समझौतों और अंतिम जांच रिपोर्टों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई और उनके हाथ बुरी तरह थरथराने लगे। उस फाइल में एक बहुत ही चौंकाने वाला कानूनी दस्तावेज लगा था जिसमें लिखा था कि बीस साल पहले जब दामोदर दिल्ली गया था तो बड़े बहुराष्ट्रीय पैकेज्ड कोकोनट ऑयल और कॉयर सिंडिकेट के दलालों ने स्थानीय किसानों की सहकारी समिति को हड़पने की साजिश रची थी। दामोदर ने जब किसानों के हक के लिए आवाज उठाई तो उसे भारी-भरकम रकम और दक्षिण भारत की सबसे बड़ी निजी कोकोनट प्रोसेसिंग कंपनी की पूरी हिस्सेदारी और प्रबंध निदेशक का पद देकर चुप करा दिया गया। दामोदर ने अपनी सारी कसमें और उस लोहे के दाव का वास्ता ताक पर रखकर उस सौदे को स्वीकार कर लिया और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा पैकेज्ड नारियल निर्यातक बन गया। राघवेंद्र साहब ने जब उस फाइल के सबसे अंतिम पन्ने पर आज के इस भव्य विश्व नारियल दिवस समारोह के मुख्य अंतरराष्ट्रीय प्रायोजक और अरबपति उद्योगपति का नाम पढ़ा तो उनका पूरा शरीर पसीने से भीग गया क्योंकि वह नाम किसी और का नहीं बल्कि उसी दामोदर का था जिसके ब्रांडेड डिब्बाबंद नारियल पानी के कार्टन आज पूरे मंदिर परिसर में वीआईपी मेहमानों को बांटे जा रहे थे।राघवेंद्र साहब कांपते कदमों से दौड़ते हुए बाहर सीढ़ियों पर आए जहाँ सोमेश्वर काका अपनी लाठी के सहारे उस लोहे के दाव से अपना माथा टिकाए खड़े थे। राघवेंद्र साहब ने बहुत ही रुँधे गले से काका के कांपते हाथों को पकड़ा और बिलखते हुए बोले “काका आप जिस दामोदर के लौटने और किसानों को हक दिलाने की राह देख रहे हैं, वह तो बीस साल पहले ही किसानों के पसीने का ईमान बेचकर बहुत बड़ा उद्योगपति बन चुका है और आज उसी की कंपनी के पैसों से यह पूरा विश्व नारियल दिवस मनाया जा रहा है, फिर आप बीस सालों से इस पुराने दाव के आगे बैठकर किसका मातम मना रहे हैं?” काका ने अपनी धुंधली आँखों से प्रशासक साहब को देखा और उनके चेहरे पर एक ऐसी दिल दहला देने वाली कड़वी मुस्कान तैर गई जिसने पूरे धार्मिक तंत्र और समाज के झूठे दावों की धज्जियाँ उड़ा दीं। काका ने अपनी जेब से एक पुराना मुड़ा हुआ विदेशी पत्र निकाला और रोते हुए बोले “प्रशासक बाबू मुझे सब पता था कि वह सौदा हो चुका है और मेरा बेटा बहुत बड़ा धनकुबेर बन चुका है।” राघवेंद्र साहब ने स्तब्ध होकर पूछा “तो फिर काका आप रोज यहाँ क्यों आते हैं?” काका ने बिलखते हुए भरे गले से कहा “बेटा मैं बीस सालों से यहाँ किसी अमीर बेटे का इंतजार नहीं कर रहा बल्कि रोज यहाँ आकर यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंदिर में नारियल फोड़कर ईश्वर से अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही बाप के पसीने के छिलकों को विदेशी मुनाफे के आगे उतारकर फेंक देते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई आस्था के खोल से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” राघवेंद्र साहब सुन्न होकर उस लोहे के दाव को ताकते रह गए और पूरा मंदिर परिसर उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।