राजेंद्र विश्वविद्यालय, बलांगीर, ओडिशा मनुष्य ने सभ्यता के आरंभ से ही अपने भीतर एक प्रश्न संजोकर रखा है—मैं कौन हूँ? वह अपना नाम, परिवार, पेशा, पद, संपत्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा जानता है, लेकिन क्या वह स्वयं को भी जानता है? क्या वह उस आंतरिक चेतना से परिचित है, जो सुख-दुःख, सफलता-असफलता, सम्मान-अपमान और जन्म-मृत्यु के बीच जीवन को अर्थ प्रदान करती है? यही प्रश्न मनुष्य को आत्मबोध की ओर ले जाता है।विज्ञान ने अंतरिक्ष की सीमाएँ विस्तृत की हैं, चिकित्सा ने जीवन की अवधि बढ़ाई है और तकनीक ने मानवीय क्षमताओं का विस्तार किया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में सूचनाओं और सुविधाओं की कमी नहीं है, लेकिन जीवन के वास्तविक अर्थ की तलाश आज भी बनी हुई है।…