डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा’
उस घर की देहलीज़ पर कदम रखते ही उसका नाम किसी पुराने सिक्के की तरह चलन से बाहर हो गया, जिसे रिश्तों के बैंक ने ब्लैकलिस्ट कर दिया था। वह ससुराल की उस प्रयोगशाला का हिस्सा बन गई जहाँ औरत को ‘अमुक की बहू’ नामक एसिड में घोलकर उसका अस्तित्व जला दिया जाता है। वह उस लोकतंत्र की मूक मतदाता थी जहाँ उसका एकमात्र अधिकार रसोई के चूल्हे को बहुमत से जिताना था। वह ‘वर्मा जी की श्रीमती’ नामक टाइटल के पीछे ऐसे छिप गई थी जैसे सरकारी फाइलों के पीछे सच और भ्रष्टाचार छिप जाता है। मोहल्ले के लोग उसे एक सचल संपत्ति मानते थे, जिसकी अपनी कोई आवाज़ नहीं थी, बस बर्तनों की खनक ही उसकी एकमात्र अभिव्यक्ति थी। उसकी पूरी ज़िंदगी प्रेशर कुकर की सीटी और सास के बीपी के बीच एक ऐसा संतुलन थी, जिसे साधते-साधते उसका अपना संतुलन ही बिगड़ चुका था।
“सुनो, पनीर में नमक तुम्हारे मायके जैसा है,” पतिदेव ने ऐसा तंज कसा कि उसकी स्वाभिमान की पसलियाँ चटख गईं। वह नायिका की तरह सपने तो देखती थी, पर उन सपनों को सुबह की चाय की पत्ती के साथ डस्टबिन में सिझा देती थी। उसके पास डिग्रियाँ तो बहुत थीं, पर उनका उपयोग केवल अलमारी के शेल्फ पर बिछाने वाले कागज़ के तौर पर हो रहा था। उसे ‘चिंटू की मम्मी’ का ऐसा सॉफ्टवेयर पहना दिया गया था कि वह खुद को इंसान नहीं, बल्कि एक ‘ऑपरेटिंग सिस्टम’ समझने लगी थी। घर की नेमप्लेट पर उसका नाम न होना इस बात का पुख्ता सबूत था कि वह उस घर की मालकिन नहीं, बल्कि एक लॉन्ग-टर्म लीज़ पर आई हुई मशीन थी। हर सालगिरह पर उसे साड़ी तोहफे में दी जाती, ताकि उसके पुराने पड़ते अस्तित्व पर एक नया पर्दा डाला जा सके।read more:https://worldtrustednews.in/public-awareness-is-essential-for-cancer-prevention-vice-president/अचानक एक दिन घर में मातम छा गया, जब वह कोमा में चली गई और अस्पताल के फॉर्म पर मरीज़ का नाम लिखने की बारी आई। साहब ने अपनी याददाश्त की पुरानी दराजें खंगालीं, पर वहाँ केवल ‘अजी सुनती हो’ और ‘ओ भाग्यवान’ के खाली लिफाफे ही मिले। बच्चों ने माँ को हमेशा ‘मम्मी’ के टैग में देखा था, इसलिए उनके लिए वह किसी गूगल मैप जैसी थी जिसका अपना कोई घर नहीं होता। पूरे खानदान की इज्ज़त दांव पर थी, क्योंकि बिना नाम के बीमा का पैसा और वसीयत की मलाई मिलना नामुमकिन था। डॉक्टर ने चेतावनी दी कि अगर अगले दस मिनट में उसका नाम नहीं पुकारा गया, तो वह विस्मृति के अंधेरे में हमेशा के लिए खो जाएगी। साहब पागलों की तरह शादी की एल्बम ढूंढने लगे, पर वहाँ भी वह सिर्फ़ ‘दुल्हन’ नामक एक जेनेरिक शब्द के नीचे दबी हुई मिली। जब मौत की हिचकी पास आई, तो साहब ने उसके कान में चीखकर कहा, “अपना नाम बता दो, वरना लोग मुझे विदुर किस नाम की पत्नी का कहेंगे?” उसने धीरे से अपनी आँखें खोलीं, उसकी पुतलियों में पच्चीस सालों का सघन अंधेरा और उपेक्षा का व्यंग्य नाच रहा था। उसने पास पड़ी एक छोटी सी पानी की बोतल उठाई और फर्श पर अपनी उंगली से कुछ लिखना शुरू किया, जिसे देखने पूरा परिवार टूट पड़ा। उसने कोई नाम नहीं लिखा, बल्कि एक कीमत लिख दी, जो उस घर ने उसे कभी चुकाई नहीं थी। अंततः उसने अंतिम सांस ली और साहब के हाथ में अपनी पुरानी कॉलेज आईडी थमा दी, जिसे उन्होंने कभी देखने की ज़हमत नहीं की थी। साहब ने कांपते हाथों से उसे पलटा, तो वहां उसकी फोटो की जगह एक आईना लगा था, जिसमें साहब को अपना ही डरावना चेहरा दिखाई दिया—नीचे नाम की जगह लिखा था, रिक्त स्थान भरें। वह मरकर भी उन्हें एक ऐसा अधूरा फॉर्म थमा गई थी, जिसे भरने की औकात उस पूरे खानदान की नहीं थी।