पटरी पर दौड़ने को तैयार देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन

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हैदराबाद । भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन जल्द ही पटरी पर दौड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है। रेलवे बोर्ड ने उत्तरी रेलवे के जींद- नीपत खंड पर हाइड्रोजन फ्यूल सेल से चलने वाली 10 डिब्बों की इस विशेष ट्रेन को मंजूरी दे दी है। रेल मंत्रालय द्वारा जारी एक आधिकारिक परिपत्र के अनुसार, 1200 किलोवॉट हाइड्रोजन फ्यूल सेल प्रणोदन प्रणाली से लैस यह ट्रेन अधिकतम 75 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलेगी। इस अनूठी पहल के साथ ही भारत अब जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका जैसे उन चुनिंदा देशों के क्लब में शामिल हो गया है जो स्वच्छ रेल परिवहन के लिए हाइड्रोजन तकनीक पर काम कर रहे हैं। चूंकि यह तकनीक अभी शुरुआती दौर में है, इसलिए दुनिया के गिने-चुने देशों में ही इसका परीक्षण या संचालन किया जा रहा है। देश में इस पर्यावरण-अनुकूल ट्रेन का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है। सरकार इसे तेल आयात पर निर्भरता कम करने और ऊर्जा के नए विकल्प के रूप में देख रही है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत सरकार ने शुरुआती चरण में ऐसी 35 ट्रेनों के विकास के लिए लगभग 2,800 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। अधिकारियों के मुताबिक, इन ट्रेनों को मुख्य रूप से उन ऐतिहासिक और पहाड़ी मार्गों पर चलाया जाएगा जहाँ अभी तक बिजली की लाइनें (विद्युतीकरण) नहीं बिछ पाई हैं। इसके पायलट प्रोजेक्ट के लिए जींद-सोनीपत मार्ग को चुना गया है, क्योंकि जींद में ईंधन भरने और हाइड्रोजन भंडारण की सुविधा उपलब्ध है। इस ट्रेन को मौजूदा डीजल इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (डीईएमयू) रेक में हाइड्रोजन फ्यूल सेल लगाकर तैयार किया गया है। यह तकनीक हाइड्रोजन की रासायनिक प्रतिक्रिया से बिजली बनाती है और इससे धुएं के बजाय सिर्फ जल वाष्प (पानी की भाप) उत्सर्जित होती है, जो इसे पारंपरिक ईंधन का सबसे स्वच्छ विकल्प बनाती है। परियोजना की सुरक्षा को लेकर भी कड़े इंतजाम किए जा रहे हैं।read more:https://pahaltoday.com/a-boat-capsized-in-the-ganges-river-due-to-a-strong-storm-killing-two-and-leaving-five-missing/ पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पेसो) ने साइट पर संपीड़ित हाइड्रोजन गैस के भंडारण और वितरण के लिए जरूरी लाइसेंस जारी कर दिया है। सुरक्षा के लिहाज से हाइड्रोजन संयंत्र और ईंधन भरने वाले पूरे परिसर में अनधिकृत प्रवेश रोकने के पुख्ता इंतजाम किए जाएंगे। साथ ही, हाइड्रोजन रिसाव (लीकेज) और ज्वाला (फायर) डिटेक्टर जैसे सुरक्षा सेंसरों का नियमित निरीक्षण और सफाई की जाएगी ताकि धूल जमा न हो। इस ट्रेन का रख-रखाव दिल्ली के शकूरबस्ती शेड में किया जाएगा और वहाँ ले जाने के लिए इसे किसी अन्य इंजन (लोकोमोटिव) की मदद से निष्क्रिय अवस्था में खींचा जाएगा। सुरक्षित परिचालन के लिए रेलवे ने बेहद सख्त नियम-कायदे तय किए हैं। इसके तहत ईंधन भरने की प्रणाली की चौबीसों घंटे निगरानी होगी और केवल प्रशिक्षित और प्रमाणित कर्मचारी ही तैनात किए जाएंगे। शुरुआती तीन महीनों तक ट्रेन के सफर के दौरान भी तकनीकी विशेषज्ञ साथ रहेंगे ताकि रास्ते में आने वाली किसी भी समस्या का तुरंत निपटारा किया जा सके। दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञ इस तकनीक को लेकर अभी सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं क्योंकि बड़े पैमाने पर इसका सफल परीक्षण होना अभी बाकी है और इसमें लागत भी अधिक आती है। पूर्व-मध्य रेलवे के पूर्व महाप्रबंधक एलसी त्रिवेदी का मानना है कि भारतीय रेलवे जब लगभग 100 प्रतिशत ब्रॉड गेज विद्युतीकरण का लक्ष्य हासिल कर रहा है, तो नवीकरणीय ऊर्जा (सोलर या विंड एनर्जी) को सीधे विशेष विद्युत प्रणाली (ट्रैक्शन नेटवर्क) से जोड़ना ज्यादा कुशल और किफायती रास्ता साबित हो सकता है। ऐसे में भारत को बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की योजना पर बेहद सावधानी से विचार करना चाहिए।

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