जिसने ‘दुर्बल’ नाम को बनाया शक्ति का पर्याय

Share

भारतीय संत परंपरा केवल आध्यात्मिक साधना की परंपरा नहीं रही है। यहां संतों ने मंदिरों और मठों की सीमाओं से बाहर निकलकर समाज के अंधेरे कोनों में प्रकाश पहुंचाया है। उन्होंने मनुष्य को केवल ईश्वर से जोड़ने का काम नहीं किया, बल्कि मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की कोशिश भी की। ऐसी ही संत परंपरा के तेजस्वी व्यक्तित्व हैं संत शिरोमणि दुर्बलनाथ महाराज, जिनका नाम खटीक समाज की आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक जागरण और आत्मसम्मान के इतिहास में विशेष श्रद्धा के साथ लिया जाता है।संत दुर्बलनाथ का जीवन इस अर्थ में भी असाधारण है कि उन्होंने अभावों और सामाजिक सीमाओं के बीच से उठकर अपने तप, अनुभव और लोकभाषा में कही गई वाणी के माध्यम से हजारों लोगों को जीवन का नया अर्थ समझाया। उनके जीवन और जन्म-विवरण के संबंध में विभिन्न परंपराओं में कुछ अंतर मिलता है, लेकिन अनेक उपलब्ध स्रोत उन्हें राजस्थान के अलवर क्षेत्र के बिचगाँव से जोड़ते हैं। शोध-सामग्री में उनका जन्म 1861 में बताया गया है। उनका बाल्य नाम कल्याण अथवा कल्या बताया जाता है।कहते हैं कि बाल्यकाल से ही उनका मन सांसारिक आकर्षणों से अधिक साधना और ईश्वर-चिंतन की ओर आकृष्ट था। गाय चराने के दौरान भी वे एकांत में ध्यानमग्न हो जाते थे। परिवार ने उनका विवाह कराया, लेकिन उनका अंतर्मन वैराग्य की ओर बढ़ता रहा। आगे चलकर वे गरीबनाथ जी की शरण में पहुंचे। गुरु से दीक्षा प्राप्त करने के बाद कल्याण का जीवन एक नए अध्याय में प्रवेश करता है और वे दुर्बलनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए। उपलब्ध जीवन-वृत्तांतों के अनुसार उन्होंने राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में वर्षों तक तपस्या और लोकजागरण किया तथा अंततः बांदीकुई क्षेत्र में अपनी जीवन-यात्रा पूर्ण की।लेकिन दुर्बलनाथ की सबसे बड़ी पहचान केवल एक तपस्वी संत की नहीं थी। वे समाज के भीतर आत्मसम्मान जगाने वाले लोकसंत थे। उनकी वाणी में उस समय के समाज की पीड़ा भी दिखाई देती है और उसके परिवर्तन की आकांक्षा भी। उन्होंने जन्म के आधार पर मनुष्य को ऊंचा-नीचा मानने वाली मानसिकता पर प्रश्न उठाया और कर्म तथा आचरण को मनुष्य की वास्तविक पहचान माना। उनके साहित्य पर हुए शोध में जाति-व्यवस्था, असमानता और छुआछूत जैसी सामाजिक विसंगतियों पर उनके प्रखर विचारों का उल्लेख मिलता है।उनका संदेश सीधा था—मनुष्य की श्रेष्ठता उसके जन्म से नहीं, उसके कर्म और चरित्र से होती है। यही कारण है कि उनकी साधना केवल व्यक्तिगत मोक्ष की साधना नहीं थी। उसमें सामाजिक मुक्ति की आकांक्षा भी थी।संत दुर्बलनाथ ने छुआछूत, जातिगत भेदभाव, अंधविश्वास, पाखंड और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जनजागरण किया। उनके संदेशों में सदाचार, सत्य, संयम, दया और परिश्रम को विशेष महत्व मिलता है। एक स्रोत में उनके संदेशों को नशे से दूर रहने, जीवों के प्रति दया रखने, शिक्षा ग्रहण करने और धर्म के सार को समझने से जोड़ा गया है।उनकी दृष्टि में समाज का उत्थान केवल पुरुषों के उत्थान से संभव नहीं था। वे नारी की गरिमा और शिक्षा के समर्थक बताए जाते हैं। बाल-विवाह जैसी कुरीतियों के विरोध तथा महिलाओं की शिक्षा पर उनके विचारों का उल्लेख मिलता है। यह विचार उस समय के सामाजिक वातावरण को देखते हुए विशेष महत्व रखता है।दुर्बलनाथ की एक महत्वपूर्ण विशेषता उनकी लोकभाषा थी। उन्होंने कठिन दार्शनिक बातों को आम आदमी की समझ में आने वाली भाषा में कहा। शोध में उनकी विभिन्न प्रकार की वाणियों—सबद, चेतावनी, हेली, बन्दड़ा, चुन्दरिया, मंगला आदि—का उल्लेख मिलता है। उनकी रचनाओं में लोकजीवन, श्रम, सामाजिक विषमता और सामान्य मनुष्य की संवेदनाएं दिखाई देती हैं।read more:https://pahaltoday.com/mobile-court-visits-ballia-to-hear-grievances-of-persons-with-disabilities-state-commissioner-issues-strict-directives/

उनकी वाणी का एक उल्लेखनीय पक्ष कर्म की प्रतिष्ठा है—

“संत भला गुरु नाम रटे, विप्र भला तिहुं वेद पढ़े।
राज भला प्रजा सुख पावत, शूर भला रण खेत लड़े।
वैश्य भला सत व्यापार करे…”

इसमें छिपा दर्शन अत्यंत सहज है—हर व्यक्ति अपने दायित्व को ईमानदारी से निभाए। समाज की प्रतिष्ठा पद से नहीं, कर्तव्य की गुणवत्ता से होती है।

संत दुर्बलनाथ की शिक्षाओं का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष शायद यही है कि उन्होंने खटीक समाज को केवल धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि शिक्षा, संगठन, आत्मसम्मान और सामाजिक चेतना से जोड़ने का प्रयास किया। आज समाज शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, सेना, चिकित्सा, पत्रकारिता, उद्योग और अनेक क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है तो ऐसे संतों की स्मृति केवल गौरव का विषय नहीं, बल्कि दिशा का विषय भी बनती है।आज संत दुर्बलनाथ की जयंती मनाते हुए यदि हम केवल शोभायात्रा निकालें, माल्यार्पण करें और भंडारे तक सीमित रहें तो उनकी विरासत का एक छोटा-सा हिस्सा ही याद कर पाएंगे। उनकी सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी जब हर खटीक परिवार अपने बच्चों की शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देगा, बेटियों की शिक्षा को उतना ही महत्व देगा, नशे और सामाजिक कुरीतियों से दूरी बनाएगा तथा समाज के कमजोर व्यक्ति को आगे बढ़ाने में सहयोग करेगा।आज के समय में उनकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता समरसता में है। जाति के नाम पर ऊंच-नीच, सामाजिक दूरी और आपसी विभाजन किसी भी समाज को मजबूत नहीं बनाते। दुर्बलनाथ की वाणी हमें याद दिलाती है कि समाज की वास्तविक शक्ति उसके सबसे कमजोर व्यक्ति के सम्मान में निहित होती है।इसीलिए संत दुर्बलनाथ को केवल खटीक समाज की सीमाओं में बांधना उनके व्यापक संदेश को छोटा करना होगा। हाल में उनके जन्मोत्सव के अवसर पर भी यह बात सार्वजनिक रूप से कही गई कि वे केवल खटीक समाज के नहीं, बल्कि व्यापक भारतीय समाज के संत थे।उनका जीवन मानो कहता है—अभाव तुम्हें रोक नहीं सकता, यदि भीतर संकल्प का दीपक जल रहा हो। सामाजिक परिस्थितियां तुम्हारी पहचान तय नहीं करतीं, यदि तुम्हारे कर्म में प्रकाश हो।संत दुर्बलनाथ ने अपने नाम में जुड़े ‘दुर्बल’ शब्द को ही शक्ति का संदेश बना दिया। उन्होंने दिखाया कि जिसे समाज कमजोर समझता है, वही तप, ज्ञान और चरित्र के बल पर युग का मार्गदर्शक बन सकता है।आज उनकी जयंती पर यही संकल्प सबसे सार्थक होगा कि शिक्षा हमारा साधन बने, संगठन हमारी शक्ति बने, समता हमारा संस्कार बने और सेवा हमारा धर्म। तब संत दुर्बलनाथ की स्मृति केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं रहेगी, बल्कि समाज के जीवन में जलता हुआ वह दीपक बनेगी जिसकी लौ पीढ़ियों तक रास्ता दिखाती रहेगी जौनपुर में संत दुर्बलनाथ महाराज की जयंती शुक्रवार को मनाई जा रही है। यह खुशी का विषय है। कम से कम इसी बहाने लोग आपस में एक हो रहे हैं। मगर अफसोस है कि मुख्य अतिथि और अध्यक्ष बनकर बैठे लोग अपने पार्टी के कार्यक्रमों में लाखों रुपए खर्च करते हैं लेकिन जिस समाज के बल पर लोकप्रिय हो रहे हैं उस समाज के आयोजन में चंदे की जरूरत पड़ रही है। ग्रुप में चंदा को लेकर नोकझोंक हो रही है लोग एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। समाज के ऐसे लोगों के कृति से उनकी आत्मा को कष्ट के सिवा और क्या मिलेगा? जब श्रद्धा का भाव मन में ना हो तो राजनीतिक लाभ के लिए या व्यक्ति विशेष को खुश करने के लिए इस तरह की जयंती मनाने का उचित है क्या है इसी कारण हमारा समाज पिछड़ा जा रहा है और राजनीतिक रूप से कही कद्र नहीं हो रही है। ऐसे लोग न समाज में न ही पार्टी में ही अपनी स्थान अपने बल पर बना पा रहे है।

डॉ. सुनील कुमार असिस्टेंट
प्रोफेसर जनसंचार विभाग एवं पत्रकारिता विभाग वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *