शीर्षक – अब वो प्रिशा कहाँ है हमको वापस मिलने वाली?
पिता संजीव के कंधों पर, हर वक्त थी वो चढ़ने वाली।
मां प्रीति के आंचल में, छिपने और खिलने वाली।
दादा संतोष के जीवन का, एकमात्र संतोष थी जो।
अब वो प्रिशा कहां है, हमको वापस मिलने वाली?
उसकी मां की करुण पुकार,
है हृदय को चीरने वाली।
रोते पिता की बेबस आंखे, उसकी राह निहारने वाली।
दादा पर तो शब्द नहीं है, कौन सुनेगा उनकी पीड़ा?
अब वह प्रिशा कहां है, हमको वापस मिलने वाली?
कुदरत ले जाती उसको, तो हमको भी इतना गम ना होता। अस्पताल की पूरी व्यवस्था है, उस मासूम की हत्या करने वाली।
नाम रखा गोपाल के नाम पर,
प्रणाली है इनकी कंस वाली।
अब वो प्रिशा कहां है, हमको वापस मिलने वाली?
लाड प्यार से सींचा जिसको, नाजो से लाडो को पाला।
कितना निष्टूर वैध है तू, जिसने इस मासूम को मारा।
मां बाप के सारे सपने, तोड़कर चली गई वो जाने वाली।
अब वो प्रिशा कहां है, हमको वापस मिलने वाली?
डोली उठाने के सपने, बुनने वाले बाप की पीड़ा।
अर्थी बेटी की उठा रहा है, तड़प रही है माँ भी उसकी।
गहने दूंगी- साड़ी दूंगी, लाल चुनरिया दूंगी फेरों वाली।
अब वो प्रिशा कहां है, हमको वापस मिलने वाली?
सूख जाएंगे मां-बाप के आंसू, न्याय नहीं है मिलने वाला।
पैसों के बल पर कहीं, बिक ना जाए व्यवस्था सारी।
ऐसे ही तड़प कर मर जाएंगे, ना जाने कितने लाल और लाली।
अब वो प्रिशा कहां है हमको, वापस मिलने वाली।