जय गुरुबन्दे स्वर योग साधना के तत्वावधान में जय गुरुबन्दे आश्रम छितौना, जाल्हुपुर, वाराणसी में गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर परम संत *स्वामी जय गुरुबन्दे जी महाराज* द्वारा स्वरचित आध्यात्मिक ग्रंथ *”उलट भेदनी”* का विमोचन किया गया। जय गुरुबन्दे स्वर योग साधना के मीडिया प्रभारी शशि दास ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करके बताया कि “उलट भेदनी” अपने आप में अनूठी और रहस्यमयी पुस्तिका है, जो विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक है। स्वामी जी द्वारा गहन साधना में लीन होने पर प्राप्त हुई रुहानी वाणियों को ही इस पुस्तिका में संकलित किया गया है। इस प्रकार के आत्मज्ञान से परिपूर्ण प्रवचन वर्तमान समय में संसार में अन्यत्र दुर्लभ हैं। पुस्तक में स्वामी जय गुरुबन्दे जी ने “उल्टी वाणी” का प्रयोग प्रतीकों के माध्यम से किया है।read more:https://khabarentertainment.in/prof-dr-rajendra-rajput-receives-guru-shree-2026-award-at-national-level-brings-honour-to-ghazipur/ यह शैली भक्ति काल के संतों कबीरदास और दरिया की काव्य परंपरा की याद दिलाती है, जो कई सौ वर्षों से विलुप्तप्राय थी। यह दार्शनिक और गूढ़ आत्मबोध की अनुपम अभिव्यक्ति है।स्वामी जी ने प्रवचन में कहा कि शाब्दिक अर्थ में यह संसार के नियमों के विपरीत प्रतीत होती है, परंतु वास्तव में यह मानव शरीर के भीतर घटित होने वाली आध्यात्मिक घटनाओं का वर्णन है। इसमें आत्मा-परमात्मा, काल और माया के रहस्यों को प्रतीकों द्वारा दर्शाया गया है। यह कोई शब्द-क्रीड़ा नहीं, बल्कि समाधि में प्राप्त अनुभव की अभिव्यक्ति है।स्वामी जी ने कहा कि संसार में लोग बाहर के व्यक्ति को ही शत्रु-मित्र मानते हैं। लेकिन जब कोई आत्म-तत्व को जानने वाला संत मिलता है तो वह शरीर के भीतर बैठे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसे शत्रुओं और दया, क्षमा, भक्ति, सेवा, सत्संग जैसे मित्रों की पहचान कराता है। इन्हीं विकारों के कारण जीव युगों से मझधार में फंसा है। बिना संत-सद्गुरु के इसका बोध संभव नहीं है। कार्यक्रम का समापन नामदान, भंडारे और “जय गुरुबन्दे” के जयकारों के साथ हुआ।