या हुसैन की सदाओं से गूंजा जमानियां, तीसरी के मातमी जुलूस में दिखी अखाड़े की पारंपरिक विरासत

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गाजीपुर जमानियां। मोहर्रम के महीने में तीसरी के अवसर पर नगर कस्बा बाजार में निकाले गए मातमी जुलूस और पारंपरिक अखाड़े ने पूरे क्षेत्र को गम, अकीदत और धार्मिक उत्साह के माहौल से भर दिया। हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) और कर्बला के शहीदों की याद में निकले इस जुलूस में अजादारों ने सीना-जनी कर मातम किया, नौहाख्वानी की और “या हुसैन” की सदाओं से फिजा गूंज उठी।मातमी जुलूस के दौरान पारंपरिक अखाड़ों के खिलाड़ियों ने लाठी, ढाल और डंडों के साथ हैरतअंगेज करतबों का प्रदर्शन किया। अखाड़े के खलीफा निशात खान वारसी, अमन खान गांधी सहित अन्य हुनरमंद खिलाड़ियों ने अपनी कला का प्रदर्शन कर लोगों की खूब सराहना बटोरी। स्थानीय लोगों के अनुसार यह पारंपरिक कला कई पीढ़ियों से चली आ रही विरासत है, जो आज भी युवाओं के माध्यम से जीवंत बनी हुई है।हाफिज तौहीद रजा ने बताया कि कर्बला का संदेश अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध सत्य की लड़ाई का प्रतीक है। मोहर्रम के मातमी कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को हजरत इमाम हुसैन की कुर्बानी और उनके आदर्शों को याद दिलाया जाता है।शाही जामा मस्जिद के सचिव मौलाना तनवीर रजा ने मोहर्रम और कर्बला के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जमानियां में ताजेदारी की परंपरा लगभग छह दशकों से चली आ रही है।read more:https://pahaltoday.com/consumers-booked-for-gas-refill-booking/
मोहर्रम के दौरान बनाए जाने वाले ताजिए इमाम हुसैन और उनके साथियों की याद में निकाले जाते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी अखाड़े में हिस्सा लेते हैं और बचपन से ही इस पारंपरिक कला को सीखते हुए उसमें महारत हासिल कर लेते हैं।नूरी मस्जिद लोदीपुर के इमाम अशरफ करीम कादरी ने बताया कि मोहर्रम के दौरान अखाड़े केवल प्रदर्शन नहीं बल्कि शहादत-ए-कर्बला को याद करने का माध्यम होते हैं। खिलाड़ियों को लगातार सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है ताकि करतबों के दौरान किसी को चोट न पहुंचे।हाजी एडवोकेट इमरान नियाजी ने कहा कि मोहर्रम खुशी का पर्व नहीं, बल्कि पैगंबर हजरत मुहम्मद (स.) के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की कर्बला में हुई शहादत को याद कर गम और संवेदना व्यक्त करने का अवसर है। सदियों पुरानी मातम, नौहाख्वानी और ताजियादारी की परंपराएं आज भी लोगों को कर्बला के संदेश से जोड़ती हैं।तीसरी के मातमी जुलूस में बड़ी संख्या में बच्चे, युवा, बुजुर्ग और महिलाएं शामिल रहीं। अखाड़े के करतबों और मातमी रस्मों को देखने के लिए नगर तथा आसपास के क्षेत्रों से भी लोगों की भारी भीड़ उमड़ी रही।

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