लिंगराज मंदिर के शिखर पर दिखता धनुष : इतिहास, आस्था और लोककथा का अद्भुत संगम

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भुवनेश्वर की प्राचीन गलियों से गुजरते हुए जब दृष्टि अचानक लिंगराज मंदिर के 108 फीट ऊंचे विराट शिखर पर पड़ती है, तो मन सहसा हजार वर्षों की यात्रा पर निकल पड़ता है। पत्थरों में गढ़ी गई भक्ति, शिखर पर लहराती ध्वजा और आकाश को स्पर्श करती मंदिर की आकृति श्रद्धा से भर देती है। मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अलावा अनेक छोटे-बड़े देवालय हैं जो इसे एक जीवंत धार्मिक सांस्कृतिक केंद्र बनाते हैं। मंदिर चार प्रमुख भागों में विभाजित है गर्भगृह (देउल), जगमोहन (सभा मंडप ), नाट्य मंडप भोग मंडप। मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियां, देवी देवताओं की आकृतियां, नर्तक-नर्तकियों की मुद्राएं तथा पुष्प अलंकरण उस समय की कला कौशल और सांस्कृतिक समृद्धि का परिचय देते है।किंतु मंदिर की इस भव्यता के बीच एक प्रश्न वर्षों से लोगों को आकर्षित करता रहा है—क्या शिखर पर दिखाई देने वाला धनुषाकार प्रतीक वही टूटा हुआ धनुष है जिसे भगवान राम ने सीता स्वयंवर में तोड़ा था?इस प्रश्न का उत्तर इतिहास और लोकविश्वास के बीच हिलोरे मार रहा है।लोककथाएँ कहती हैं कि मिथिला में राजा जनक के दरबार में रखा भगवान शिव का दिव्य धनुष इतना भारी और शक्तिशाली था कि कोई भी राजा उसे उठा नहीं सका। जब अयोध्या के राजकुमार राम ने उसे उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया तो वह धनुष भयंकर गर्जना के साथ टूट गया। उस दिव्य घटना की स्मृति युगों तक जीवित रही। ओडिशा की कुछ जनश्रुतियों और लोककथाओं में कहा जाता है कि उसी धनुष का प्रतीक लिंगराज मंदिर के शिखर पर स्थापित है। श्रद्धालु जब उसे देखते हैं तो उन्हें रामायण की वह अमर कथा स्मरण हो आती है जिसमें धर्म, मर्यादा और शक्ति का अद्भुत संगम दिखाई देता है।किन्तु इतिहासकारों और पुरातत्त्वविदों का मत इससे भिन्न है। उनके अनुसार लिंगराज मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में हुआ था और मंदिर के अभिलेखों या ऐतिहासिक स्रोतों में कहीं भी यह उल्लेख नहीं मिलता कि शिखर पर लगा कोई चिह्न वास्तव में रामायण काल के धनुष का अवशेष है। इसलिए इसे ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि लोकआस्था का हिस्सा माना जाता है।फिर भी प्रश्न उठता है कि ऐसी कथाएँ जन्म क्यों लेती हैं?दरअसल भारत की सांस्कृतिक परंपरा केवल शिलालेखों और ग्रंथों से नहीं चलती, बल्कि लोकस्मृति से भी चलती है। गाँवों की चौपालों, मंदिरों के प्रांगणों और तीर्थयात्रियों की कथाओं ने अनेक स्थानों को रामायण और महाभारत की घटनाओं से जोड़ दिया।read more:https://pahaltoday.com/barabanki-festival-will-be-inaugurated-from-april-10/यही कारण है कि लिंगराज मंदिर का शिखर भी श्रद्धालुओं की कल्पना में रामकथा का एक जीवंत प्रतीक बन गया।मंदिर के शिखर की अपनी एक अलग विशेषता है। इसके शीर्ष पर स्थापित ध्वजा प्रतिदिन बदली जाती है। स्थानीय मान्यता है कि जब तक ध्वजा लहराती रहती है, तब तक भगवान लिंगराज की कृपा नगर पर बनी रहती है। शिखर के शीर्ष पर स्थित कलश और उसके ऊपर स्थापित प्रतीक शक्ति, संरक्षण और दिव्यता के चिह्न माने जाते हैं। दूर से देखने पर यही संरचना कई लोगों को धनुष जैसी प्रतीत होती है, जिससे यह लोककथा और अधिक लोकप्रिय हो गई।शायद यही भारत की सांस्कृतिक शक्ति है कि यहाँ इतिहास और आस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बनकर चलते हैं। इतिहास प्रमाण खोजता है, जबकि आस्था अर्थ खोजती है। इतिहास कहता है कि धनुष होने का कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन लोकविश्वास कहता है कि यह हमें रामायण की स्मृति से जोड़ता है और कभी-कभी स्मृतियाँ प्रमाणों से भी अधिक लंबे समय तक जीवित रहती हैं।लिंगराज मंदिर के शिखर को निहारते समय इसलिए केवल पत्थर, धातु और स्थापत्य नहीं दिखाई देता; वहाँ हजार वर्षों की श्रद्धा, लोककथाओं की मधुर गूँज और भारतीय संस्कृति की वह अद्भुत परंपरा दिखाई देती है, जहाँ हर शिखर एक कहानी कहता है और हर कहानी में इतिहास से अधिक हृदय बसता है।”हो सकता है शिखर पर दिखने वाला धनुष राम द्वारा तोड़े गए शिवधनुष का वास्तविक अवशेष न हो, परन्तु यह निश्चित है कि वह आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं को राम, शिव और भारतीय संस्कृति की अमर गाथा से जोड़ता है।”

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