आर्थिक मितव्ययता एक दिन नहीं, नियमित आदत बनाने की आवश्यकता।

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प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स का कथन था कि “संकट के समय विवेकपूर्ण उपभोग ही अर्थव्यवस्था को संतुलित रख सकता है।”
विश्व अर्थव्यवस्था आज ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ युद्ध, ऊर्जा संकट और वैश्विक अस्थिरता ने आम जनजीवन को सीधे प्रभावित करना प्रारंभ कर दिया है। मध्य पूर्व एशिया में बढ़ते तनाव, अमेरिका इजरायल की सामरिक नीतियों तथा तेल उत्पादक क्षेत्रों में अस्थिरता ने पेट्रोल, डीज़ल, रसोई गैस और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तीव्र वृद्धि कर दी है। इसका प्रभाव केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले विकासशील देशों की घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है। ऐसी परिस्थिति में आर्थिक मितव्ययता केवल एक सलाह नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता बन चुकी है। भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा भाग आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ते ही परिवहन महँगा हो जाता है, जिससे खाद्यान्न, सब्जियाँ, दवाइयाँ, निर्माण सामग्री तथा दैनिक उपयोग की वस्तुओं तक की कीमतें बढ़ जाती हैं। यह स्थिति सामान्य परिवारों की आय और व्यय के बीच असंतुलन उत्पन्न करती है। मध्यमवर्ग और निम्नवर्ग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं क्योंकि उनकी आय सीमित होती है, जबकि आवश्यकताओं की सूची लगातार बढ़ती जाती है।यदि व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के बीच अंतर समझ ले, तो वह अनावश्यक खर्चों को नियंत्रित कर सकता है। मितव्ययता का अर्थ कंजूसी नहीं होता, बल्कि संसाधनों का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग करना होता है।भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी कई अवसरों पर यह कह चुके हैं कि भारत जैसे देशों में घरेलू बचत आर्थिक स्थिरता की रीढ़ होती है। जब परिवार बचत करते हैं, तब बैंकिंग व्यवस्था मजबूत होती है, निवेश बढ़ता है और भविष्य के संकटों से लड़ने की क्षमता विकसित होती है। यदि करोड़ों भारतीय परिवार प्रतिदिन केवल थोड़ी-सी भी बचत करना प्रारंभ कर दें, तो उसका राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर अत्यंत सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उपभोक्तावाद ने जीवन शैली को प्रभावित कर दिया है। लोग आवश्यकता से अधिक खर्च को प्रतिष्ठा का प्रतीक मानने लगे हैं। मोबाइल, फैशन, दिखावा, अनियोजित यात्राएँ और अनावश्यक विद्युत उपभोग धीरे-धीरे घरेलू बजट को कमजोर कर देते हैं। आर्थिक संकट के समय यही आदतें परिवारों को कर्ज और मानसिक तनाव की ओर धकेलती हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि बचत को किसी विशेष अवसर या अभियान तक सीमित न रखकर दैनिक व्यवहार का हिस्सा बनाया जाए।नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा था कि “सच्चा विकास वही है जिसमें व्यक्ति भविष्य की असुरक्षाओं से स्वयं को सुरक्षित रखने में सक्षम हो।” बचत व्यक्ति को वही सुरक्षा प्रदान करती है। छोटी बचतें भविष्य में बड़े सहारे बनती हैं। भारतीय संस्कृति में भी बूंद-बूंद से घड़ा भरता है की परंपरा रही है। पहले घरों में अनाज, धन और संसाधनों को सहेज कर रखने की परंपरा थी। आधुनिक जीवनशैली ने उस सोच को कमजोर किया है, किंतु वर्तमान वैश्विक परिस्थितियाँ पुनः उसी अनुशासन की ओर लौटने का संकेत दे रही हैं।read more:https://pahaltoday.com/global-health-care-hospital-is-equipped-with-all-modern-facilities/यदि पेट्रोल और डीज़ल की बढ़ती कीमतों को देखें तो स्पष्ट होता है कि ईंधन की बचत भी राष्ट्रीय बचत है। छोटी दूरी के लिए पैदल चलना, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, वाहन का सीमित प्रयोग तथा ऊर्जा संरक्षण जैसी आदतें केवल व्यक्तिगत खर्च कम नहीं करतीं, बल्कि देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ने वाले दबाव को भी कम करती हैं। इसी प्रकार बिजली, पानी और गैस की बचत भी आर्थिक मितव्ययता का महत्वपूर्ण भाग है।भारत जैसे देश में जहाँ जनसंख्या विशाल है, वहाँ छोटी-छोटी बचतें बड़े परिणाम उत्पन्न कर सकती हैं। यदि प्रत्येक परिवार प्रतिमाह थोड़ी राशि भी सुरक्षित रखे, तो आपातकालीन परिस्थितियों में आर्थिक अस्थिरता कम होगी। कोविड महामारी के दौरान यह स्पष्ट देखा गया कि जिन परिवारों के पास कुछ बचत थी, वे कठिन समय में अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित रहे।प्रख्यात उद्योगपति और विचारक नारायण मूर्ति ने एक बार कहा था कि “आर्थिक अनुशासन व्यक्तिगत समृद्धि का प्रथम सूत्र है।” वास्तव में अनुशासनहीन खर्च व्यक्ति को क्षणिक सुख तो दे सकता है, लेकिन भविष्य की सुरक्षा नहीं दे सकता। बचत केवल बैंक खाते में जमा धन नहीं होती, बल्कि वह आत्मविश्वास और स्थिरता का आधार भी होती है।सरकारें अपनी नीतियों के माध्यम से महँगाई को नियंत्रित करने का प्रयास करती हैं, किंतु केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होते। नागरिकों को भी अपनी आर्थिक जिम्मेदारी समझनी होगी। स्थानीय उत्पादों को अपनाना, अनावश्यक उपभोग कम करना, घरेलू बजट बनाना तथा बच्चों को बचत की शिक्षा देना समय की मांग है। परिवार यदि बच्चों को छोटी आयु से ही मितव्ययता का संस्कार देंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ आर्थिक रूप से अधिक मजबूत बन सकेंगी।आज आवश्यकता इस बात की है कि बचत को केवल महीने के अंत में बची राशि न माना जाए, बल्कि उसे जीवन दर्शन बनाया जाए। मितव्ययता व्यक्ति को संयम सिखाती है और समाज को स्थिरता प्रदान करती है। वैश्विक युद्ध और आर्थिक संकट कब समाप्त होंगे, यह निश्चित नहीं है, किंतु यदि समाज आर्थिक अनुशासन अपना ले, तो वह किसी भी संकट का सामना अधिक मजबूती से कर सकता है।इन परिस्थितियों में यही कहा जा सकता है कि आर्थिक मितव्ययता एक दिन का संकल्प नहीं, बल्कि जीवनभर की आदत होनी चाहिए। भारत जैसे विशाल राष्ट्र में प्रत्येक नागरिक की छोटी बचत भी राष्ट्रीय शक्ति बन सकती है। जब व्यक्ति बचत करेगा, परिवार सुरक्षित होगा; परिवार सुरक्षित होगा, तब राष्ट्र की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। यही वर्तमान समय का सबसे बड़ा आर्थिक और सामाजिक संदेश है।

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