प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा था कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके लोगों की सामाजिक चेतना और भागीदारी में निहित होती है।
जब कोई राष्ट्र आर्थिक, सामाजिक, ऊर्जा अथवा सामरिक विषमताओं से गुजरता है, तब केवल सरकार या सेना ही नहीं, बल्कि देश का प्रत्येक नागरिक उस चुनौती का हिस्सा बन जाता है। इतिहास सदैव गवाह है कि जिन देशों के नागरिकों ने कठिन समय में संयम, अनुशासन और त्याग का परिचय दिया, वे राष्ट्र अधिक मजबूत होकर उभरे। राष्ट्र केवल सीमाओं, संसदों और संस्थाओं से नहीं बनता, बल्कि करोड़ों नागरिकों की चेतना, जिम्मेदारी और व्यवहार से निर्मित होता है। इसलिए विपरीत परिस्थितियों के समय देश के हित को सबसे ऊपर रखना प्रत्येक नागरिक का पहला दायित्व बन जाता है। भारत के लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने कहा था कि
हर नागरिक को यह अनुभव होना चाहिए कि उसका देश स्वतंत्र है और उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करना उसका कर्तव्य है। आज विश्व अनेक प्रकार के संकटों से गुजर रहा है। कहीं युद्ध की विभीषिका है, कहीं ऊर्जा संकट, कहीं महंगाई और आर्थिक अस्थिरता। विश्व की अनेक घटनाओं का प्रभाव भारत जैसे विशाल विकासशील देश पर भी पड़ता है। ऐसे समय में यदि देश का मुखिया जनता से ऊर्जा बचाने, आवश्यक वस्तुओं के विवेकपूर्ण उपयोग या आर्थिक संयम का आह्वान करते हैं, तो उसे केवल सरकारी निर्देश मानकर नहीं, बल्कि अपना स्वयं का काम समझकर स्वीकार करना चाहिए। महात्मा गांधी जी ने कहा था कि पृथ्वी प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन प्रत्येक मनुष्य के लालच को नहीं। यह कथन आज के उपभोक्तावादी दौर में और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। आवश्यकता और अंधाधुंध उपभोग के बीच का अंतर समझना ही सच्ची राष्ट्रसेवा है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स का मानना था कि आर्थिक स्थिरता केवल सरकारी नीतियों से नहीं आती, बल्कि उपभोक्ताओं और नागरिकों के व्यवहार से भी निर्मित होती है। यदि जनता विवेकपूर्ण आचरण करे तो बड़े आर्थिक संकटों का प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है। ऊर्जा संकट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यदि देश ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भर हो और विश्व की परिस्थितियों के कारण तेल एवं गैस की कीमतें बढ़ जाएँ, तो उसका सीधा प्रभाव देश की आर्थिक सामाजिक स्थिति पर पड़ता है। ऐसे समय में यदि नागरिक बिजली, ईंधन और संसाधनों का संयमित उपयोग करें, सार्वजनिक परिवहन अपनाएँ, अनावश्यक उपभोग कम करें, तो यह समाज की आर्थिक शक्ति को मजबूत करने वाला कदम बन जाता है। छोटी-छोटी सावधानियाँ भी बड़े परिणाम देती हैं।read more:https://pahaltoday.com/two-people-were-accused-of-felling-dozens-of-teak-trees-under-the-guise-of-a-permit-a-case-has-been-filed-against-them/
भारत के पूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक ए. पी. जे. अब्दुल कलाम कहा करते थे किसी देश को भ्रष्टाचार मुक्त और सुंदर मन वाले लोगों का राष्ट्र बनाना है, तो उसमें तीन लोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं — माता, पिता और शिक्षक। इस कथन का व्यापक अर्थ यह है कि राष्ट्रनिर्माण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की नैतिक भागीदारी से संभव होता है। आर्थिक संकट के समय समझदारी से खरीदारी करना भी देश हित का हिस्सा है। आवश्यक वस्तुओं का अनावश्यक संग्रह, कालाबाजारी को बढ़ावा देना, अफवाहों में आकर जरूरत से अधिक खरीदारी करना, यह सब देश की व्यवस्था को कमजोर करता है। कोविड महामारी के समय हमने देखा कि कैसे कुछ लोगों ने दवाइयों, ऑक्सीजन और खाद्य सामग्री का अनावश्यक भंडारण किया, जबकि अनेक नागरिकों ने सेवा, सहयोग और संयम का परिचय देकर मानवता की मिसाल प्रस्तुत की थी। विषम परिस्थिति यह तय करती है कि कि समाज स्वार्थ से चलेगा या संवेदनशीलता से। यहां यह बात समझ में आती है कि आर्थिक नीतियाँ तभी सफल होती हैं जब आमजन सहयोग की भावना से जुड़ें। सामरिक संकट के समय तो नागरिकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, वे देश के भीतर अनुशासन, धैर्य और एकता से भी जीते जाते हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अनेक देशों के नागरिकों ने राशन व्यवस्था अपनाई, ईंधन की बचत की और राष्ट्रीय हित में व्यक्तिगत सुविधाओं का त्याग किया। भारत में भी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर स्वदेशी को अपनाया। वह केवल आर्थिक आंदोलन नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान का प्रतीक था। यह रक्षा केवल हथियारों से नहीं, बल्कि आर्थिक अनुशासन, सामाजिक समरसता और निष्ठा से भी होती है। आज सोशल मीडिया और त्वरित सूचना के युग में एक नई जिम्मेदारी भी नागरिकों के सामने है। संकट के समय अफवाहें फैलाना, भ्रामक सूचनाओं को साझा करना या समाज में भय और विभाजन पैदा करना भी देश के विरुद्ध कार्य है। जागरूक नागरिक वही है जो सही-सही जानकारी पर भरोसा करे और समाज में सकारात्मक सहयोग का वातावरण बनाए। वास्तव में राष्ट्रहित कोई कठोर नारा नहीं कोई भाषण या जुमलेबाजी नहीं बल्कि जीवन का व्यावहारिक ज्ञान और व्यवहार है। सड़क पर नियम पालन करना, पानी और बिजली बचाना, करों का ईमानदारी से भुगतान करना, स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहित करना, सामाजिक सौहार्द बनाए रखना और संकट के समय संयम रखना यही आधुनिक सामाजिक दायित्व के वास्तविक रूप हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि नागरिक अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें। लोकतंत्र केवल सरकार से अपेक्षाएँ रखने का नाम नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की भी व्यवस्था है। यदि हर नागरिक यह सोच ले कि उसका छोटा-सा प्रयास भी देश को मजबूत बना सकता है, तो कोई भी आर्थिक, सामाजिक या सामरिक संकट भारत की प्रगति को रोक नहीं सकता। राष्ट्र वही सही बनता है, जहाँ नागरिक अपने निजी हितों से ऊपर उठकर सामूहिक हित को महत्व देते हैं। समाज और देश के हित में किया गया छोटा-सा कार्य भी भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षा, स्थिरता और समृद्धि का आधार बन जाता है। इसलिए सामाजिक विषम परिस्थितियों में सामाजिक हित निभाने में कोताही नहीं, बल्कि सजग सहभागिता ही सच्ची देश सेवा का प्रमाण है।