वन स्वराज की चुनाव : जीते हुए जोश में, हारे हुए निराशा में, मतदाता फिर मेहनत में

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वीरेंद्र बहादुर सिंह 
सिंह ने गुप्त बैठक में कछुआ को समझाया, “मेरे उम्मीदवारों से नाराज मतदाता खरगोश की तरफ न चले जाएं, इसके लिए मेहनत करो। प्रचार का सारा खर्च मैं दे दूंगा।” जंगल के छोटे-छोटे इलाकों के संचालन के लिए ‘वन स्वराज’ का चुनाव आयोजित किया जाता था। राजा चुनने के लिए ‘जंगल स्वराज’ का चुनाव होता और जंगल के बड़े विभागों के संचालन के लिए मुख्यमंत्रियों की ‘अरण्य स्वराज’ का चुनाव होता, उनके बीच ‘वन स्वराज’ का चुनाव आता था। वन स्वराज के चुनाव में राजा सिंह और रीछ भले खुद प्रचार में नहीं उतरते, लेकिन उनकी रणनीति के अनुसार ही सारी व्यवस्था पूरी होती थी।read more:https://pahaltoday.com/a-young-man-jumped-from-the-saryu-bridge-rescued-by-boatmen-troubled-by-family-feud-and-demanded-a-fencing-on-the-bridge/
चुनाव में सिंह की पार्टी के उम्मीदवार, विपक्ष के नेता खरगोश के उम्मीदवार और मुख्यमंत्री कछुआ ककलाटिया के उम्मीदवारों के बीच त्रिकोणीय मुकाबला था। डेढ़ महीने की कवायद के बाद आखिरकार चुनाव समाप्त हो गया। जंगल के नियमों के अनुसार सभी चुनाव कराने की जिम्मेदारी बाज समाज पर थी। जंगल के सभी समुदायों ने वर्षों पहले ही बाज की निष्पक्षता को स्वीकार कर उसे मध्यस्थ की भूमिका सौंपी थी। हालांकि पिछले कुछ समय से बाज समाज की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहे थे, फिर भी उसने चुनाव कराना जारी रखा। वन स्वराज के चुनाव भी बाजों की निगरानी में हुए और उन्होंने अपेक्षित परिणाम घोषित किए।
वन स्वराज के चुनाव में राजा सिंह के उम्मीदवारों का दबदबा पहले से ही रहा था और इस बार भी वही देखने को मिला। चुनाव से पहले मतदाताओं में भारी आक्रोश था। लोग शिकायत कर रहे थे कि सिंह के उम्मीदवार जीतने के बाद काम करने नहीं आते। इन शिकायतों को सुनकर खरगोश के उम्मीदवार उत्साहित थे और उन्हें विश्वास था कि इस बार सत्ता उनके पास आएगी। लेकिन राजा सिंह ने गुप्त रूप से कछुआ के साथ बैठक कर ली। सिंह ने कहा, “मेरे उम्मीदवारों से नाराज मतदाता कहीं खरगोश की ओर न चले जाएं, इसके लिए मेहनत करो। प्रचार का खर्च मैं दूंगा।” चालाक कछुआ ने शर्त रखी, “सिर्फ खर्च से काम नहीं चलेगा, मेरे उम्मीदवारों को भी एक-दो छोटे विभागों का संचालन देना होगा।”  सिंह ने यह शर्त मान ली। चुनाव परिणामों में जगह-जगह सिंह की पार्टी के उम्मीदवार जीत गए। परिणाम आने के बाद विजेता उम्मीदवारों में जबरदस्त उत्साह था। वे नाचते-गाते पूरे जंगल में घूमने लगे, “राजा सिंह की जय हो। रीछ भाई की जय हो। वंदे जंगलम्, जंगल माता की जय।”
ये दृश्य ‘जंगल न्यूज’ पर लाइव दिखाए जा रहे थे, जिन्हें देखकर खरगोश की पार्टी के हारे हुए उम्मीदवार निराश हो गए। उन्होंने इतना प्रचार किया था और लोगों ने जीत का भरोसा भी दिया था, फिर भी हार कैसे हुई, यह उन्हें समझ नहीं आ रहा था। विजेताओं ने नारा लगाया, “जीत गए भाई जीत गए, राजा सिंह के आशीर्वाद से जीत गए।” और हारे हुए बोले, “हार गए भाई हार गए, पता नहीं कैसे हार गए।” ‘जंगल न्यूज’ के संवाददाता लकड़खोद लपलप ने राजा सिंह से जीत का कारण पूछा। सिंह ने कहा, “मेरे विकसित जंगल के संकल्पों की वजह से यह जीत मिली है।” खरगोश से हार का कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा, “हमारी पार्टी के अध्यक्ष लंगूर भाई समीक्षा बैठक करेंगे, उसके बाद बताएंगे।” कछुआ ने कहा, “हमें हमारी मेहनत और समझदारी का फल मिला है।” राजा सिंह के समर्थक कार्यकर्ताओं भेड़, हठीला, कौआ, पाड़ और बकुला ने सोशल मीडिया पर सिंह की खूब प्रशंसा की। जब उनसे पूछा गया कि इस जीत से उन्हें क्या फायदा, तो उन्होंने कहा, “हम पार्टी के कार्यकर्ता हैं, निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि जंगल के विकास के लिए काम करते हैं।”   चुनाव परिणामों के बाद एक ओर विजेता खुशी मना रहे थे, दूसरी ओर हारे हुए निराश होकर बहाने ढूंढ रहे थे और तीसरी ओर मतदाता फिर से अपने काम में लग गए थे। मतदाताओं को अच्छी तरह पता था कि चुनाव आते-जाते रहते हैं, लेकिन उनकी स्थिति में ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। इसलिए थोड़ा देर तमाशा देखने के बाद वे फिर अपने पेट पालने के लिए मेहनत में जुट गए। चौथी ओर राजा सिंह और रीछ महंगे गिफ्ट पैक तैयार करवा रहे थे। एक गिफ्ट पर लिखा था, “प्रिय श्री कछुआ ककलाटिया।” और दूसरे पर लिखा था

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