मंच हुए साहित्य के, गठजोड़ी सरकार,
सभी बाँटकर ले रहे, पुरस्कार हर बार॥
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कला नहीं अब माप है, संबंधों का जाल,
योग्यता पीछे खड़ी, आगे हुए दलाल।
सत्य हुआ उपेक्षित वहाँ, झूठों का दरबार—
मंच हुए साहित्य के, गठजोड़ी सरकार॥
शब्दों की इस भीड़ में, खोई सच्ची धार,
लेखन का सम्मान भी, होता अब व्यापार।
आपस में अब बाँटते, जुगाड़ू पुरस्कार —
मंच हुए साहित्य के, गठजोड़ी सरकार॥
पुरस्कार की होड़ में, बिकती हर पहचान,
ईमानों की लाज भी, चढ़ती रोज दुकान।
कुर्सी के इस खेल में, गिरता हर व्यवहार—
मंच हुए साहित्य के, गठजोड़ी सरकार॥
जागो साहित्यकार अब, तोड़ो यह दीवार,
सत्य-लेखनी से करो, झूठों पर प्रहार।
तभी बचेगी अस्मिता, होगा सच्चा सार—
मंच हुए साहित्य के, गठजोड़ी सरकार॥